अरब इस्लाम का उदय तथा भारत में तुर्की का आक्रमण

इस्लाम धर्म के प्रवर्तक हजरत मुहम्मद साहब का जन्म अरव देश में क युग में हुआ वह अत्यन्त पतनोन्मुखी था। अरब के निवासी अज्ञानता के अन्धकार ग्रस्त थे। ऐसी भीषण प्रतिकूल परिस्थितियों में सातवीं शताब्दी में अरब देश में रहीं। धर्म का उदय हुआ।

इस्लाम धर्म के संस्थापक हजरत मोहम्मद साहब थे। इनका जन्म 570 कासिम ने अप मक्का नामक शहर में हुआ था। 40 वर्ष की अवस्था में उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ। सबसे और इस्ल पिता की मृत्यु उनके जन्म से पूर्व हो गयी थी तथा माता की मृत्यु उस समय हुई उनकी आयु 6 वर्ष थी। उनका पालन-पोषण उनके चाचा अबू तालिब ने किया। बाल्यकाल निर्धनता में व्यतीत हुआ । उन्होंने अपने चाचा के यहाँ भेड़ों के समूहों के देखभाल की तथा व्यापार में अपने चाचा का हाथ बँटाया।

अरब इस्लाम का उदय तथा भारत में तुर्की का आक्रमण-

पैगम्बर मोहम्मद साहब ने 25 वर्ष की आयु में एक धनी विधवा खदीजा के स निकाह किया । वह उम्र में उनसे 15 वर्ष अधिक आयु की थी। विवाह के उपरान्त में मोहम्मद साहब धार्मिक खोजों में लीन रहे । 40 वर्ष की आयु में फरिश्ता जिबराइल उन्हें ईश्वर का सन्देश दिया कि संसार में उन्हें अल्लाह का प्रचार करने के लिए भेजा है। भक्ति भाव इस घटना के उपरान्त पैगम्बर मोहम्मद ने अपना शेष जीवन अल्लाह के सन्देश को संसार में प्रचारित करने में लगाया । उन्होंने अरब लोगों में प्रचलित अंधविश्वास तथा मूर्ति पूजा की घोर निन्दा की । उनके कुल कुरेश का काबा पर अधिकार था । वहाँ 360 मूर्तिय थीं । मूर्ति पूजकों की आय से मुहम्मद साहब के सम्बन्धियों का निर्वाह होता था। मूह पूजा के विरोध से उनको हानि होने लगी। उन्होंने मोहम्मद साहब को भला-बुरा कहा, उन पर ईंट-पत्थर फेंके तथा उनको जान से मारने की योजना बनायी ।

मक्का निवासी मोहम्मद साहब के नये धर्म को स्वीकार नहीं कर रहे थे । अतः वे उनके विरुद्ध अनेक प्रकार के षडयंत्र रचने लगे । अतः मोहम्मद साहब 622 ई. में मक्का से मदीना चले गये । उनके इस प्रकार जाने को हिजरत कहते हैं। जुलाई 622 ई. से हिजरी सम्वत् का आरम्भ हुआ । इस्लाम धर्म के मानने वाले अपने पंचांग में इसे पहला वर्ष मानते हैं । मोहम्मद साहब के मक्का में रहते हुए बहुत से लोग उसी समय से उनके अनु मन में पवित्र कुरान की रचना हुई तथा उनके अनुयाइयों ने इस्लाम धर्म को स कार कर लिया।

भारत में इस्लाम धर्म

भारत में इस्लाम धर्म भारत में इस्लाम धर्म विभिन्न साधनों द्वारा आया और सम्पूर्ण भारत में फैल गया –

(1) अरब व्यापारियों द्वारा – अरब व्यापारी भारत के पश्चिमी तट पर व्यापार करने आते थे तथा इस्लाम धर्म मानते थे। पश्चिमी तट के बन्दरगाहों तक उन्होंने अपनी छोटी-छोटी बस्तियाँ बसायों और राजाओं ने उन्हें घर, गोदाम, मस्जिद बनाने के लिए जमीन दी । इन व्यापारियों के प्रभाव में आकर आस-पास के लोग मुसलमान बने और भारत में लोगों ने इस्लाम धर्म अपनाया किन्तु उनकी पुरानी रीति-रिवाज और रस्में बनी रही ।

(2) मोहम्मद बिन कासिम द्वारा -भारत के पश्चिम में सिन्ध पर मोहम्मद बिन कासिम ने अपना राज्य बनाया तो उसके साथ बहुत से लोग सिन्ध और मुल्तान में आकर बसे और इस्लाम धर्म की जानकारी मिली ।

(3) ईरानी शरणार्थियों द्वारा-सन् 900 ई. में लगभग ईरान देश पर तुर्क कबीले हमले कर रहे थे । इन हमलों से बचने के लिए भारत के उत्तरी हिस्सों में ईरानी की शरणार्थियों लोग आये । इनमें से कुछ लोग कारीगर व सन्त थे । कुछ सिपाही भी आये जो गाओं की सेनाओं में शामिल हो गये। ये ईरानी लोग मुसलमान थे। इनके सम्पर्क में आकर लोगों को इस्लाम धर्म की जानकारी मिली।

(4) तुर्कों द्वारा— सन् 1190 ई. से 1500 ई. के बीच कबीर, नानक, तुकाराम तथा रामानन्द जैसे सन्त हुए। उन्होंने साधारण भाषा में दोहे और गीत गाये जो ईश्वर के प्रति भक्ति भाव से भरे थे । इन्हीं की तरह मुस्लिम सन्त भी थे जो सूफी सन्त कहलाये । इनमें अजमेर के ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती, पंजाब के बाबा फरीद, दिल्ली के निजामुद्दीन ओलिया प्रमुख सूफी सन्त थे ।

सूफी-सन्तों के विचार भक्त सन्तों के विचारों से आपस में मिलते-जुलते थे उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सच्चे दिल से अल्लाह को प्रेम करना तथा बुरे कामों का पश्चाताप करना अल्लाह को पाने का सही तरीका है। इन सूफी सन्तों के विचारों की मदद से हिन्दू और मुसलमानों ने एक-दूसरे धर्म को जाना तथा उन्होंने समझा कि ईश्वर एक है किन्तु उसे अल्लाह, परमेश्वर, भगवान (राम, शिव, विष्णु) आदि कई नामों से अलग-अलग पुकारा जाता है ।

भारत में तुर्क आक्रमण

तुकों के आक्रमण के समय उत्तर भारत में कई छोटे-बड़े राजा और सामन्त करते थे। उनमें से चौहान, तोमर, गहड़वाल, चन्देल, चालुक्य वंश के शासक प्रमुख थे। भारत में तुका का आक्रमण लगभग 974 ई. 977 ई. के मध्य होने प्रारम्भ हो गये थे इनमें महमूद गजनवी व मोहम्मद गौरी द्वारा किये गये आक्रमण प्रमुख थे।

महमूद गजनबी का आक्रमण – महमूद गजनवी तुर्क सरदार, जिसने पश्चिम एशिया के छोटी-सी रियासत गजनी राज्य की स्थापना की थी, का एक उत्तराधिकारी था । वह बहुत ही महत्वाकांक्षी शासक था। उसने भारत की धन सम्पदा के बारे गाथाएँ सुन रखी थीं। अतः अपने राज्य को समृद्ध राज्य बनाने के लिए सन् 1000 से 1025 ई. तक भारत पर 17 बार आक्रमण किये। महमूद गजनवी का इरादा भारत पर आकमण कर धन-दौलत लूटकर इकट्ठा करना था । उसके पंजाब, मुल्तान, भाटिण्डा, नगरकोट, नारायणपुर, कश्मीर, थानेश्वर, मथुरा, कन्नौज, कालिन्जर, सोमनाथ मुख्य आक्रमण के केन्द्र थे । महमूद गजनवी का भारत में सबसे प्रसिद्ध आक्रमण सोमनाथ के मन्दिर पर हुआ। वहाँ से उसने बहुत सा धन, सोना, चाँदी लूटा और गजनी ले गया।

महमूद गजनवी की विनाश लीला के सम्बन्ध में मध्य एशिया के प्रसिद्ध विद्वान अल्बरूनी, जो कि महमूद गजनवी के साथ भारत आया था, लिखा है कि, “महमूद ने भारत की समृद्धि को बर्बादी में बदल डाला। उसके आक्रमण से देश को सांस्कृतिक व आर्थिक हानि हुई । ” समकालीन हिन्दू राजाओं ने महमूद गजनवी का सामना किया किन राजनीतिक एकता के अभाव में वे असफल रहे। लगभग 1030 ई. में महमूद गजनवी क मृत्यु हो गयी ।

महमूद गौरी का आक्रमण – महमूद गजनवी के लगभग 150 वर्ष अफगानिस्तान की एक छोटी-सी रियासत गौर का तुर्क शासक मुहम्मद गौरी भारत पर आक्रमण आक्रमण करने आया था । मुहम्मद गौरी ने भारत में सबसे पहले 1175 ई. में पंजाब के मुल्तान शहर पर आक्रमण किया तथा सिन्ध और सुल्तान पर अधिकार कर लिया। भारतीय राजाओं के आपसी संघर्ष का लाभ उठाते हुए गौरी ने मुल्तान शहर के के बाद गुजरात के चालुक्य वंश के राजा भीम पर आक्रमण किया लेकिन इस युद्ध में गौरी हार गया । मुहम्मद गौरी के भारत पर आक्रमण का उद्देश्य धन प्राप्ति व इस्लाम धर्म का प्रचार करना था । गुजरात की हार से निराश होकर गौरी ने हिम्मत नहीं हारी और उसने पंजाब पर कब्जा करने की योजना बनायी । 1190 ई. में उसने पंजाब पर कब्जा कर लिया और भटिण्डा को अपनी राजधानी बनाया। इस समय भारत में हिन्दू राज्यों में अजमेर और दिल्ली का चौहान राज्य, गुजरात में सोलंकी राज्य, कन्नौज में गहड़वाल राज्य, बंगाल बिहार में सेन राज्य तथा बुन्देलखण्ड में चन्देल राज्य थे । दक्षिण भारत में देवगिरी, वारंगल तथा होयसल प्रमुख राज्य थे ।

पृथ्वीराज चौहान का तुर्कों से संघर्ष

तुर्क राजाओं की तरह राजपूत राजा भी आपस में लड़ते रहते थे और उनका आपसी ल अच्छा नहीं था। जिन दिनों मुहम्मद गौरी भारत पर आक्रमण कर रहा था उन अजमेर के चौहान वश के राजा अपने साम्राज्य का विस्तार करते हुए शासन कर रहे पध्वीराज चौहान दिल्ली और अजमेर के योग्य वीर, प्रतिभावान, शक्तिशाली सम्राट औ। उनके पास उत्तम सेना व सेनापति थे। पृथ्वीराज चौहान ने अपने साम्राज्य का विस्तार के लिए स्वप्रथम कन्नज के राजा जयचन्द्र से लड़ना चाहा किन्तु वह शक्तिशाली था, अत; उससे न लड़कर वह गुजरात की तरफ बढ़ा । लेकिन वहाँ के शासक भीम ने उसे हरा दिया । इसके बाद वह पंजाब की ओर अपना राज्य बढ़ाने के लिए सोचने लगा, अतःतालम दिना वहाँ के शासक मुहम्मद गौरी से उसका युद्ध निश्चित हो गया ।

तराइन का प्रथम युद्धर- सन् 1191 ई. में पृथ्वीराज और मुहम्मद गौरी में तराइन नामक स्थान पर युद्ध हुआ । इस युद्ध में मुहम्मद गौरी हार गया और पृथ्वीराज ने पंजाब को अपने राज्य में मिला लिया।

तराइन का द्वितीय युद्ध— सन् 1192 ई. में मुहम्मद गौरी ने दूसरी बार आक्रमण किया । पृथ्वीराज की सेना में 3 लाख से अधिक सैनिक थे और गौरी की सेना में 1 लाख 20 हजार सैनिक थे मगर गौरी की सेना में घोड़े और घुड़सवार दोनों ही बहुत मजबूत इस्पात के कवच से लेस थे, अतः इस युद्ध में पृथ्वीराज की हार हुई । सन् 1192 का तराइन का द्वितीय युद्ध निर्णायक सिद्ध हुआ । इस जीत ने तुर्कों के लिए भारत के द्वार खोल दिये और भारत में सल्तनत काल की शुरुआत हुई ।

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