आदर्शवाद की शैक्षिक विचारधाराएँ-Aadarshwaad Ki Shaikshik Vichardharayen in Hindi

 आदर्शवाद के अनुसार शैक्षिक विचारधाराएँ अग्र हैं-

(1) आत्मानुभूति (Self-realization)—– जैनटिल (Gentile) के आत्मानुभूति शिक्षा का अन्तिम उद्देश्य है। रस्क (Rusk) के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य व्यक्तित्व का उत्कर्ष है। इस प्रकार आदर्शवाद के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति का ऊँचा उठाना है। आदर्शवाद मानव-जीवन की श्रेष्ठता को सबसे अधिक महत्व देता है। आदर्शवाद यह स्वीकार करता है कि मानव व्यक्तित्व ईश्वर की महानतम रचना है। इसी कारण शिक्षा का उद्देश्य, व्यक्तित्व का पूर्ण विकास करना है। 

आदर्शवाद की शैक्षिक विचारधाराएँ-Aadarshwaad Ki Shaikshik Vichardharayen in Hindi

रॉस (Ross) ने इस सम्बन्ध में लिखा है, “आदर्शवाद से विशेष रूप से सम्बन्धित शिक्षा का उद्देश्य है- व्यक्तित्व का उत्कर्ष अथवा आत्मानुभूति — आत्मा की सर्वोच्च क्षमताओं को वास्तविक रूप प्रदान करना। 

(2) सांस्कृतिक विरासत की समृद्धि (Enrichment of Cultrual Heritage)—आदर्शवाद के अनुसार शिक्षा का दूसरा प्रमुख उद्देश्य है—–सांस्कृतिक थाती (Heritage) में वृद्धि करना है। आदर्शवाद—मनुष्य की सांस्कृतिक थाती को विशेष महत्व देता है। सांस्कृतिक वातावरण का निर्माण स्वयं मनुष्य करता है। इसमें पशु-पक्षियों का कोई योग नहीं होता है। रॉस (Ross) कहता है, “यहाँ आत्मिक या सांस्कृतिक वातावरण मनुष्य का अपना बनाया हुआ है। यह मनुष्य के क्रियाकलाप का परिणाम है।” वह आगे कहता है, “धर्म, नैतिकता, कला-साहित्य, सृजनात्मक गणित और विज्ञान युग-युगान्तर से चले आये मनुष्य के नैतिक, बौद्धिक और सौन्दर्यपरक क्रियाकलाप का परिणाम है। ये सच्चे अर्थों में मानव सम्बन्धी शास्त्र हैं संस्कृति की वृद्धि धीरे-धीरे हुई है और इसमें सभी युगों के अनेक मनुष्यों का योगदान रहा है।

इन उद्देश्यों का समर्थन करता हुए रॉस (Ross) ने लिखा है, “शिक्षा प्रत्येक व्यक्ति तथा प्रत्येक पीढ़ी को ऐसा करने में सहायता देने वाली होनी चाहिए और क्योंकि मनुष्य जाति की इस विशिष्ट थाती में भाग लेने का प्रयत्न करने पर व्यक्ति अपने मनुष्य रूप को अधिकतम निखारता है।”

(3) आध्यात्मिक आदर्शों की प्राप्ति (Attainment of Spiritual Values)- आदर्शवाद के अनुसार-शिक्षा का तीसरा उद्देश्य आध्यात्मिक आदर्शों की प्राप्ति है। रस्क (Rusk) के अनुसार ये आदर्श तीन हैं। यथा–

(i) बौद्धिक, 

(ii) भावात्मक, तथा 

(iii) सांकल्पिक। 

रस्क (Rusk) के द्वारा बताये गये उपरोक्त आदर्श मूल्य मानसिक क्रियाएँ हैं। ये मानसिक क्रियाएँ हमें सत्यं, शिवं तथा सुन्दरम (Truth, Goodness and Beauty) की प्राप्ति में सहायक होती हैं। मनुष्य स्वभाव से ही इन आदर्शों को प्राप्त करना चाहता है। व्यक्ति अपनी आत्मा के साथ विश्व की आत्मा के साथ विश्व की आत्मा का समन्वय स्थापित करता है। इसी कारण व्यक्ति को विश्व की आत्मा का ज्ञान होना आवश्यक है। सृष्टि की आत्मा चरम सत्य है। वही शिव है, वही सुन्दर है। बालक क सम्पूर्ण व्यक्तित्व के विकास के उद्देश्य यही हैं। उसे सत्यं शिवं तथ सुन्दरम् का ज्ञान दिया जाना चाहिए। इसी प्रकार वह परम सत्य का दर्शन कर सकता है।

सत्यं शिवं और सुन्दरम् की मार्ग को प्रशस्त करना शिक्षा का कार्य है। आदर्शवादी चाहते हैं कि व्यक्ति अपनी प्रवृत्ति से अभ्यास करता-करता अंत में चिर सत्य, चिर शिव तथा चिर सौन्दर्य की खोज करे। इसी खोज में वह आत्मा तथा परमात्मा पर पहुँच सकेगा।

(4) शारीरिक विकास (Physical Development)- आदर्शवादियों के अनुसार जीवन रक्षा के लिए स्वस्थ शरीर की आवश्यकता है। उनके अनुसार स्वस्थ शरीर से ही आध्यात्मिक पूर्णता प्राप्त की जा सकती है। प्लेटो (Plato) शारीरिक शिक्षा पर बल देता है। परन्तु इसे वह शिक्षा का सहायक उद्देश्य मानता है। शिक्षा का अन्तिम उद्देश्य, प्लेटो के अनुसार आत्मानुभूति ही है। आधुनिक आदर्शवादी भी इसी तथ्य को स्वीकार करते हैं। भारतीय शिक्षा शास्त्री इसी उद्देश्य को साध्य के रूप में न मानकर साधन के रूप में मानते हैं।

(5) बौद्धिक विकास (Intellectual Development )—आदर्शवादी कहते हैं कि यह बुद्धि ही है जिसने मनुष्य को अन्य प्राणियों से श्रेष्ठ बना दिया है। मनुष्य की बुद्धि उसके समस्त आदर्शों तथा मूल्यों तथा आध्यात्मिक क्रियाओं की आधार होती है। ज्ञान के लिए बुद्धि की आवश्यकता होती है। ज्ञान के आधार पर ही विवेक शक्ति का विकास होता है। ज्ञान तथा विवेक के अभाव में सत्यं, शिवम् तथा सुन्दरम् की प्राप्ति नहीं हो सकती।

(6) पवित्र जीवन के तैयार करना- (Preparation for Holy Life)— शिक्षा का एक उद्देश्य बालक को पवित्र जीवन व्यतीत करने के लिए तैयार करना है। आदर्शवादियों के अनुसार बालक में आध्यात्मिक मूल्यों के प्रति श्रद्धा उत्पन्न करने के लिए उन सभी परिस्थितियों का सृजन किया जाना चाहिए जिनमें रहकर बालक पवित्र जीवन व्यतीत कर सके। यही तथ्य फ्रॉबेल (Forebel) के शब्दों में इस प्रकार हैं- “शिक्षा का उद्देश्य है-भक्तिपूर्ण, पवित्र तथा कलंक रहित जीवन की प्राप्ति।”

(7) आध्यात्मिक विकास करना (To Ensure Spiritual Development)— आदर्शवाद के समर्थक भौतिक जगत की अपेक्षा आध्यात्मिक जगत को अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं इनके अनुसार शिक्षा का उद्देश्य बालक का आधात्मिक दृष्टि से विकास करना है। रस्क (Rusk) ने इस संदर्भ में लिखा के इस योग्य बनाना चाहिए कि वह अपनी संस्कृति की सहायता से आध्यात्मिक जगत में अधिक-से-अधिक पूर्णता सहित प्रवेश कर सके एवं आध्यात्मिक जगत की सीमाओं का विस्तार भी कर सके।”

(8) नैतिक विकास (Moral Development)— आदर्शवादियों के आत्मानुभूति के लिए बालक का नैतिक विकास आवश्यक है। हरबर्ट नैतिक विकास को ही शिक्षा का अन्तिम उद्देश्य मानता है। आदर्शवादी विचारक शिक्षा के द्वारा मनुष्य को अपनी इन्द्रियों को नियन्त्रण में रखना सिखाते हैं। इसी को वह इन्द्रिय-निग्रहः कहकर पुकारते हैं। इन्द्रिय-निग्रह के द्वारा ही बालक के चरित्र का विकास किया जा सकता है।

आदर्शवाद तथा अनुशासन

प्रकृतिवादी अनुशासन के सम्बन्ध में अनियन्त्रित स्वतंत्रता को महत्व देते हैं। वे बालक को पूर्ण स्वतंत्र छोड़ देना चाहते हैं। परन्तु इसके विपरीत आदर्शवादी (Idealists) बालक को पूर्णरूप से स्वतंत्रता देने के पक्ष में नहीं हैं। वे बालक को अनुशासन में रखना चाहते हैं उनके अनुसार, बालक के आध्यात्मिक विकास के लिए उसे अनुशासन में रखना आवश्यक है।

आदर्शवादी विचारधारा के अनुसार मानव जीवन का अन्तिम उद्देश्य आत्मानुभूति होता है। परन्तु इसकी प्राप्ति में मनुष्य की इन्द्रियाँ बाधक होती हैं। इन्द्रियाँ सांसारिक सुख-भोग करना चाहती हैं। अतः आवश्यक है कि मनुष्य की इन्द्रियों पर नियन्त्रण रखा जाए। यही कारण है कि आदर्शवादी चाहते हैं कि बालकों को इन्द्रिय-निग्रह प्रशिक्षण दिया जाए। वे विद्यालय में कठोर नियमों के पालन पर बल देते हैं। आदर्शवादी प्रभावात्मक अनुशासन (Impressionistic Dicipline) को सिफारिश करते हैं। उनके अनुसार अनुशासन के लिए दण्ड की व्यवस्था नहीं की जानी चाहिए। अतः वे प्रभाव विधि के द्वारा अनुशासन को रखने के पक्ष में हैं।

फ्रॉबेल (Froebel) अनुशासन में दण्ड को कोई स्थान नहीं देता, अपितु वह कहता है कि सहानुभूति से काम लेकर बालक की आत्मक्रिया और आत्मनियन्त्रण को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। उसी के शब्दों में, “बालक पर नियन्त्रण करते समय उसकी रुचियों का ध्यान रखा जाना चाहिए एवं प्रेम तथा सहानूभूतिपूर्ण व्यवहार किया जाना चाहिए।”

आदर्शवाद और विद्यालय 

आदर्शवादी बालक के लिए सामाजिक पर्यावरण आवश्यक मानते हैं। वह सामाजिक पर्यावरण विद्यालय में ही मिल सकता है। आदर्शवाद बालक का आध्यात्मिक विकास करना चाहता है। आध्यात्मिक विकास के लिए सत्यं शिवं, सुन्दरम् को प्राप्त करना आवश्यक है। इनकी प्राप्ति शिक्षक के द्वारा ही की जाती है। अतः आदर्शवाद विद्यालय को बालक की शिक्षा के लिए आवश्यक मानता है। आदर्शवादी बालक की मानसिक शक्तियों का सर्वोच्च विकास करना चाहते हैं। केवल विद्यालय ही ऐसी संस्था होती है जहाँ बालक की मानसिक शक्तियों का विकास किया जा सकता है। आदर्शवादी यह भी चाहते हैं कि बालक न केवल अपनी सांस्कृतिक विरासत से ही परिचित हों वरन् उसकी रक्षा भी करें। इस कार्य के लिए आदर्शवादियों के ‘अनुसार विद्यालय से और अधिक उपयुक्त स्थान कोई नहीं मिल सकता।

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