इस्लाम एवं सल्तनत कालीन भारत – ISLAM AND SULTANATE PERIOD IN INDIA IN HINDI

इस्लाम धर्म के प्रमुख सिद्धान्त (Main Principles of Islam)

मूल रूप से मुसलमानों के विश्वास के अनुसार इस्लाम धर्म के पाँच मूल स्तंभ या सिद्धांत माने जाते हैं जिन्हें हर मुसलमान अपनी जिन्दगी का मूल विचार मानता है। यह बातें मशहूर हदीस “हदीस ए जिब्रिल” मे बताई गई है –
(1) कलमा– ‘ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मद-उर-रसूल अल्लाह’ अर्थात् अल्लाह के सिवा और कोई परमेश्वर नहीं है और मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं अर्थात् अल्लाह एक है।
(2) नमाज – यह एक प्रकार की प्रार्थना है जो अरबी भाषा में एक विशेष नियम से पढ़ी जाती है। इस्लाम के अनुसार, नमाज ईश्वर के प्रति मनुष्य की कृतज्ञता दर्शाती है। यह मक्का की ओर मुँह कर के पढ़ी जाती है। प्रत्येक मुसलमान के लिए दिन में 5 बार नमाज पढ़ना अनिवार्य है।

(3) रोजा – इस के अनुसार इस्लामी कैलेण्डर के नवें महीने में सभी सक्षम मुसलमानों के लिए (फरज) सूर्योदय से (मगरिब) सूर्यास्त तक व्रत रखना अनिवार्य है। इस व्रत को रोजा भी कहते हैं। रोजे में हर प्रकार का खाना-पीना वर्जित है।

(4) जकात (दान) – यह एक वार्षिक दान है जो कि प्रत्येक आर्थिक रूप से सक्षम मुसलमान को निर्धन मुसलमानों में बाँटना अनिवार्य है। अधिकतर मुसलमान अपनी वार्षिक आय का 2.5% दान में देते हैं।
(5) हज (तीर्थ यात्रा)-हज उस धार्मिक तीर्थ यात्रा का नाम है जो इस्लामी कैलेण्डर के 12वें महीने में मक्का में जाकर की जाती है। प्रत्येक समर्पित मुसलमान (जो हज का खर्च उठा सकता हो और विवश न हो) के लिए जीवन में एक बार इसे करना अनिवार्य है।

अरबों का भारत पर आक्रमण (INVASION OF ARABS ON INDIA)

महमूद गजनवी के आक्रमण

महमूद गजनवी के आक्रमणों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है-

(1) प्रथम आक्रमण (1001 ई.)- महमूद गजनवी ने अपना पहला आक्रमण 1001 ई. में किया तथा पेशावर के कुछ भागों पर अधिकार करके अपने देश लौट गया।

(2) दूसरा आक्रमण (1001-1002 ई.) – अपने दूसरे अभियान के अन्तर्गत महमूद गजनवी ने सीमान्त प्रदेशों के शाही राजा जयपाल के विरुद्ध युद्ध किया जिसमें जयपाल की पराजय हुई और उसकी राजधानी बैहिन्द पर अधिकार कर लिया।
(3) तीसरा आक्रमण (1004 ई.)– महमूद गजनवी ने उच्छ के शासक वाजिरा को दण्डित करने के लिए आक्रमण किया। महमूद के भय के कारण वाजिरा सिन्धु नदी के किनारे जंगल में शरण लेने को भागा और अन्त में उसने आत्महत्या कर ली।

4) चौथा आक्रमण (1005 ई.)-1005 ई. में महमूद गजनवी ने मुल्तान के शासक दाऊद के विरुद्ध मार्च किया। इस आक्रमण के दौरान उसने भटिण्डा के शासक आनन्दपाल को पराजित किया और बाद में दाऊद को पराजित कर उसे अधीनता स्वीकार करने के लिए बाध्य कर दिया।

(5) पाँचवाँ आक्रमण (1007 ई.) – पंजाब में ओहिन्द पर महमूद गजनवी ने जयपाल के पौत्र सुखपाल को नियुक्त किया था। सुखपाल ने इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया था और उसे नौशाशाह कहा जाने लगा।

(6) छठा आक्रमण (1008 ई.)- महमूद गजनवी के 1008 ई. के छठे आक्रमण में नगरकोट के विरुद्ध हमले को मूर्तिवाद के विरुद्ध पहली महत्त्वपूर्ण जीत बताई जाती है।

(7) सातवाँ आक्रमण (1009 ई.)- इस आक्रमण के अन्तर्गत महमूद गजनवी ने अलवर राज्य के नारायणपुर पर विजय प्राप्त की।
(8) आठवाँ आक्रमण (1010 ई.)- महमूद का आठ्याँ आक्रमण मुल्तान पर था। यहाँ के शासक दाऊद को पराजित कर उसने मुल्तान के शासन को सदा के लिए अपने अधीन कर लिया।

(9) नौवा आक्रमण (1013 ई.)- अपने नए अभियान के अन्तर्गत महमूद गजनवी ने थानेश्वर पर आक्रमण किया।

(10) दसवाँ आक्रमण (1013 ई.)- महमूद गजनबी ने अपना दसवाँ आक्रमण मुदशाह पर किया हिन्दू, शाही शासक आनन्दपाल ने मन्दशाह को अपनी नई राजधानी बनाया।
(11) ग्यारहवाँ आक्रमण (1015 ई.)- महमूद का यह आक्रमण त्रिलोचनपाल के पुत्र भीमपाल के विरुद्ध था जो कश्मीर पर शासन कर रहा था। युद्ध में भीमपाल पराजित हुआ।

(12) बारहवाँ आक्रमण (1018 ई.)- अपने बारहवे अभियान में महमूद गजनवी ने की पर आक्रमण किया। उसने बुलन्दशहर के शासक हरदत्त को पराजित किया।
(13) तेरहवाँ आक्रमण (1020 ई.)- महमूद का तेरहवी आक्रमण 1020 ई में हुआ था। इस अभियान में उसने भारी बुन्देलखण्ड कि लोहकोट आदि को जीत लिया।
(14) चौदहवाँ आक्रमण (1021 ई.)- अपने चौदहवें आक्रमण के दौरान महमूद ने ग्वालियर तथा कालिंजर पर आक्रमण किया। कालिंजर के शासक गोण्ड ने विवश कर कर ली।
(15) पन्द्रहवाँ आक्रमण (1023 ई.)-इस अभियान में महमूद गजनवी ने लोदोगे (जैसलमेर), चिकलीदर (गुजरात) तथा अन्हिलाद (गुजरात) पर विजय स्थापित की।

(16) सोलहवाँ आक्रमण (1024 ई.)- इस 16वें अभियान में महमूद गजनवी ने सोमनाथ को अपना निशाना बनाया। उसके सभी अभियानों में यह अभियान सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण था ।
(17) सत्रहवाँ आक्रमण ( 1027 ई.) – यह महमूद गजनवी का अन्तिम आक्रमण था। यह आक्रमण सिन्ध और मुल्तान के तटवर्ती क्षेत्रों के जाटों के विरुद्ध था। इसमें जाट पराजित हुए ।

भारत पर अरबों व तुर्कों के आक्रमण का प्रभाव (Impacts of Arab and Turk Invasions on India) 

भारत में अरबों व तुर्कों के आक्रमणों के प्रभाव को दो भागों में बांटा जा सकता है

(1) तत्कालीन प्रभाव (Immediate Effects)- इन प्रभावों से हमारा अभिप्राय हैं कि मोहम्मद-बिन-कासिम, गजनवी तथा गोरी के आक्रमणों के उस समय भारत पर क्या प्रभाव पड़े। उदाहरण के लिए, इन हमलों में व्यापक जन-धन की हानि हुई, कला और साहित्य को आघात पहुँचा। संक्षेप में अरब व तुर्कों के आक्रमणों के निम्नलिखित तत्कालीन प्रभाव पड़े-
(i) इस्लाम का प्रसार 
(ii) जन-धन की हानि
(iii) भारतीय समाज की दुर्बलता का प्रदर्शन 
(iv) भारतीयों की राजनीतिक दुर्बलता
(v) कमजोर युद्ध नीति
(vi) कला एवं साहित्य को आघात 
(vii) भारत में तुर्क सत्ता की स्थापना

(2) दूरगामी प्रभाव (Far-Reaching Effects) – मुहम्मद गोरी के सफल अभियान ने भारत में तुर्क शासन की शुरुआत की। इस नए राजनीतिक तत्त्व के प्रवेश से मूलभूत ढांचे में बदलाव न होने के बावजूद भी तुर्कों के आक्रमणों ने भारतीय समाज के जीवन के सभी क्षेत्रों में नए तत्त्वों को पैदा किया।
इन नए तत्त्वों के दूरगामी प्रभाव समाज पर स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं-
(i) भारत में शक्तिशाली केन्द्रीय सत्ता की स्थापना
(ii) सामन्ती व्यवस्था का पतन
(iii) नई स्थापत्य कला का उदय
(iv) जाति प्रथा पर प्रभाव
(v) शिक्षा और भाषा का प्रभाव

सिकन्दर के आक्रमण का भारत पर प्रभाव

सिकन्दर के आक्रमण का भारत पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ा-
(1) सिकन्दर की विश्व विजय की महत्वाकांक्षा ने उसे भारत विजय के लिए प्रेरित किया। इस प्रेरणा या उसके भारत अभियान ने प्राचीन यूरोप को, प्राचीन भारत के निकट संपर्क में आने का अवसर प्रदान किया।
(2) सिकन्दर के इस अभियान का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम था, भारत और यूनान के बीच विभिन्न क्षेत्रों में सम्पर्क की स्थापना। 
(3) कला के क्षेत्र में गांधार शैली का भारत में विकास यूनानी प्रभाव का ही परिणाम है।
(4) व्यापार के क्षेत्र में पश्चिम के देशों के साथ जल मागाँ का पता चला, जिनका कालान्तर में व्यापार पर अनुकूल प्रभाव पड़ा।
(5) राय चौधरी के अनुसार सिकन्दर के आक्रमण के परिणामस्वरूप भारत की छोटी-छोटी रियासतें समाप्त हो गयीं।

सल्तनत कालीन भारत (SULTANATE PERIOD IN INDIA)

बलबन (1266-1286 ई.) रजिया के पश्चात् सन् 1266 में शासन सत्ता बलबन के हाथ में आ गई। बलबन ने सत्ता सम्भालने के बाद राजत्व के देवीय सिद्धान्त का प्रतिपादन करते हुए राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि माना। राज्य की समस्त शक्तियाँ राजा में निहित थीं। उसके समय में आरिज-ए-मुमालिक, दीवान-ए-ईशा, दीवान-ए-रसालत व वजीर के पद थे। राज्य की नीतियों का निर्धारण वह स्वयं करता था। बलबन की मृत्यु के बाद उसके अन्तिम उत्तराधिकारी कैकुबाद की अयोग्यता के कारण जून 1929 ई. में उसकी हत्या कर दी गई। अतः बलबन के पश्चात् दिल्ली सल्तनत पर गुलामवंश का शासन समाप्त हो गया।

अलाउद्दीन खिलजी (1296-1316 ई.)

अलाउद्दीन खिलजी जलालुद्दीन का भतीजा था। वह शिक्षित नहीं था। परन्तु अन्य गुणों के साथ-साथ सैनिक गुणों से परिपूर्ण था। वह बहुत अधिक महत्त्वाकांक्षी था। अलाउद्दीन इतिहास में अपने आर्थिक सुधारों के लिए प्रसिद्ध है जिनमें बाजार व्यवस्था उल्लेखनीय है। उसने 1296-1316 तक दिल्ली की गद्दी पर कुशलतापूर्वक शासन किया। उसने उत्तर भारत में उसके राज्यों गुजरात, रणथम्भौर, चित्तौड़, मालवा, दक्षिण भारत आदि पर भी विजय प्राप्त की।
अलाउद्दीन की मृत्यु के पश्चात् 1316 ई. में उसके सेनापति मलिक काफूर जिसका जन्म हिन्दू परिवार में हुआ था तथा बाद में इस्लाम स्वीकार किया ने सत्ता को हथियाने का प्रयास किया। परन्तु उसे अफगान व फारस के अमीरों का समर्थन नहीं मिला और अन्ततः वह मारा गया। अतः खिलजी वंश का अन्तिम शासक अलाउद्दीन का 18 वर्षीय पुत्र कुतुबुद्दीन मुबारक शाह था। उसने 4 वर्षों तक शासन किया एवं बाद में खुसरोशाह द्वारा मारा गया। इनका शासन कुछ महीनों में समाप्त हो गया।

सैय्यद वंश (1414-1451 ई.) (Saiyyad Dynasty) 

तैमूर के आक्रमण एवं तुगलक वंश के अयोग्य शासकों के कारण तुगलक वंश का पतन हुआ तथा एक नए राजवंश की स्थापना हुई जिसे इतिहास में सैय्यद वंश के नाम से जाना गया। इस वंश के प्रमुख शासक निम्न हैं-
(1) खिजखाँ (1414-1421 ई.) – तुगलक वंश के पतन के बाद 1414 ई. में खिज्र खाँ ने सैय्यद वंश की स्थापना की थी। खिज खाँ मलिक सुलेमान का पुत्र था।
(2) मुबारक शाह (1421-1434 ई.)– मुबारक शाह ने अपने पिता खिज्रखाँ की मृत्यु के पश्चात् राजगद्दी संभाली। इसने शाह की उपाधि धारण की व अपने नाम के सिक्के चलवाए।

(3) मुहम्मद शाह (1434-1445 ई.)- मुबारक शाह की मृत्यु के पश्चात् मुहम्मद शाह जो कि खिजखाँ का नाती था. दिल्ली का राजा बना ।
(4) अलाउद्दीन आलमशाह – यह मुहम्मद आलमशाह का पुत्र था। यह दिल्ली सल्तनत के लिए अयोग्य था और अपनी अयोग्यता के कारण ही यह दिल्ली छोड़कर बदायूं में बस गया।

सल्तनत काल की सामाजिक दशा (Social Status of Sultanate Period)

सल्तनतकालीन समाज अपनी विशेषताओं के कारण प्रसिद्ध था। सल्तनतकालीन समाज को दो भागों में विभक्त किया। गया था जो निम्नलिखित हैं-
(1) हिन्दू समाज – सल्तनत काल में हिन्दू समाज की स्थिति ठीक नहीं थी। पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों को निम्न समझा जाता था, पर्दा प्रथा, बाल विवाह, सती प्रथा जैसी प्रथाएँ प्रचलन में थी। मुस्लिमों का साम्राज्य होने से मुस्लिम अधिकारी हिन्दुओं का शोषण करते थे एवं उन्हें धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर करते थे।
(2) मुस्लिम समाज – सल्तनत काल में मुस्लिमों का आधिपत्य होने के कारण मुस्लिम समाज की स्थिति अच्छी थी। इनके रहन-सहन का स्तर उच्च था एवं यह समाज परिश्रमी, कठोर एवं उत्साह सम्पन्न था।

सल्तनत काल की चार प्रसिद्ध इमारत

सल्तनत काल की चार प्रसिद्ध इमारतों के नाम निम्नलिखित हैं-
(1) कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद
(2) कुतुब मीनार 
(3) अढ़ाई दिन का झोपड़ा
(4) जामा मस्जिद

दिल्ली सल्तनत का पतन (Downfall of Delhi Sultanate) 

दिल्ली सल्तनत के पतन के कारण निम्नलिखित हैं-
(1) साम्राज्य की विशालता– दिल्ली सल्तनत के विघटन का सबसे बड़ा कारण इसकी विशालता थी क्योंकि इतने बड़े साम्राज्य को एक शासक द्वारा इसे सम्भालना मुश्किल था।

(2) निरंकुश शासन-दिल्ली सल्तनत निरंकुशता एवं स्वेच्छाचारिता पर आधारित थी। इस प्रकार का शासन योग्य शासकों के समय ही स्थायी रहता था किन्तु अयोग्य शासकों के समय में गर्त में चला जाता था।
(3) गुलाम प्रिय शासक– दिल्ली सल्तनत का शासक गुलामों का शौकीन था। गुलामों को अपनी शक्ति मानकर उनके प्रशिक्षण के पृथक विभाग की स्थापना की।

(4) जजिया व अन्य कर लगाना-सुल्तान मुहम्मद तुगलक ने ब्राह्मणों व गैर मुसलमानों पर धार्मिक कर लगा दिया जिससे, हिन्दू व गैर मुसलमान सुल्तान के विरुद्ध हो गए।
(5) अमीरो का षडयंत्र-दिल्ली सल्तनत के जितने अयोग्य शासक थे वे अमीरों के हाथों की कठपुतली थे। अमीर व्यक्ति अपने अनुसार सुल्तान से शासन करवाते थे।
(6) केन्द्रीय दुर्बलता– दिल्ली सल्तनत के विघटन का कारण केन्द्रीय दुर्बलता थी क्योंकि सुल्तान हमेशा भोग-विलास में लिप्त रहता था। सल्तनत का संचालन उसके वजीर एवं मंत्री करते थे।

सूफीवाद एवं भक्ति आन्दोलन (SUFFISM AND BHAKTI MOVEMENT)

प्रमुख सूफी सन्त (Important Sufi Saints) 

प्रमुख सूफी सन्तों का संक्षिप्त परिचय / विवरण निम्नलिखित है-
(1) निजामुद्दीन औलिया-निजामुद्दीन औलिया बाबा फरीद के शिष्य थे। इनका जन्म 1265 ई. में बदायूँ में हुआ था। 20 वर्ष की आयु में इन्होंने बाबा फरीद को अपना पीर (गुरु) मान लिया था। मुहम्मद तुगलक निजामुद्दीन औलिया को अपना गुरु मानता था।

(2) ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती-सूफी सन्तों में ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती का नाम बड़े आदर एवं सम्मान से लिया जाता है। यह भारत के प्रथम सूफी सन्त थे। इनका जन्म पूर्वी ईरान के सिजिस्तान प्रांत में हुआ था। ये युवावस्था में ही भारत आकर अजमेर में बस गए थे। 1236 ई. में इनकी मृत्यु हो गई।
(3) हमीदुद्दीन नागोरी – ये ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती के शिष्य थे। ये युवावस्था में अत्यधिक भोग विलासी एवं इन्द्रियलोलुप थे लेकिन ख्वाजा के सम्पर्क में आने तथा शिष्य बनने के पश्चात् उच्च स्तर के सन्त बन गए।

(4) कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी – कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी का जन्म भारत के फरगना के औस नामक स्थान पर हुआ था। ये दिल्ली के पास एक खानकाह में रहते थे। ये मोईनुद्दीन चिश्ती के शिष्य थे। ये रहस्यवादी गीत गाने के बड़े प्रेमी थे।

(5) बाबा फरीद – बाबा फरीद का जन्म 1175 ई. में मुल्तान के समीप हुआ था। इन्हें लोग प्यार से गंज-ए-शकर भी कहते थे। इन्होंने अपने जीवन का अधिकांश समय झोंसी तथा अजोधन में व्यतीत किया। इनके प्रयासों से चिश्ती सम्प्रदाय ने अखिल भारतीय सम्प्रदाय का स्वरूप ग्रहण किया।

(6) ख्वाजा बाकी बिल्लाह – ख्वाजा बाकी बिल्लाह काबुल का रहने वाले थे। इन्होने नक्शबंदी सिलसिले की स्थापना की थी। ख्वाजा बाकी बिल्लाह हिन्दुओं एवं शियाओं के विरोधी थे।

भक्ति आन्दोलन के प्रमुख कारण (Main Causes of Bhakti Movement)

भक्ति आन्दोलन के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं- 
(1) ब्राह्मण धर्म की जटिलता,
(2) विदेशी आक्रान्ताओं की धर्म विध्वंसक नीति, 
(3) वर्ण व्यवस्था की कठोरता,
(4) तत्कालीन राजनीतिक वातावरण तथा 
(5) इस्लाम धर्म का प्रभाव आदि ।

भक्ति आन्दोलन की विशेषताएँ (Characteristics of Bhakti Movement)

भक्ति आन्दोलन की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं- कबीर, चैतन्य, गुरुनानक, तुलसी, रैदास, मलूकदास, नामदेव, दादू रामानुजाचार्य, रामानन्द, वल्लभाचार्य आदि भक्ति आन्दोलन के प्रवर्तकों ने इस सम्बन्ध में निम्न विचार दिए-
(1) इस आन्दोलन के प्रवर्तकों का कहना था कि सच्चे हृदय से ही ईश्वर की भक्ति की जा सकती है और मोक्ष भी प्राप्त किया जा सकता है।
(2) इन्होंने समाज में ऊँच-नीच और भेदभाव का प्रबल विरोध किया।
(3) इन्होंने जाति प्रथा का घोर विरोध किया। 
(4) भक्ति आन्दोलन के सन्तों ने कर्मकाण्डी देवी-देवताओं की मूर्तिपूजा का खण्डन किया ।
(5) इस आन्दोलन का जन्म दक्षिण भारत में हुआ था परन्तु यह आन्दोलन धीरे-धीरे समस्त भारत में फैल गया था। 
(6) इन सुधारकों ने तत्कालीन सामाजिक स्थिति में भी पर्याप्त सुधार किए।
(7) इनके द्वारा हिन्दू नारी की हीन दशा के सुधार की ओर विशेष ध्यान दिया गया था।
(8) भक्ति आन्दोलन द्वारा सामाजिक कुरीतियों को भी दूर करने का भरसक प्रयत्न किया गया था।
(9) इन्होनें व्यक्तिगत चरित्र की शुद्धता पर विशेष बल दिया।

बहमनी साम्राज्य (BAHMANI EMPIRE)

बहमनी साम्राज्य के प्रमुख सुल्तान बहमनी साम्राज्य के प्रमुख सुल्तान निम्नलिखित है-
(1) मुहम्मदशाह प्रथम
(3) मुहम्मदशाह द्वितीय
(4) अहमद शाह 
(5) अलाउद्दीन द्वितीय
(6) हुमायू 
(7) निजाम शाह
(8) मुहम्मदशाह तृतीय

बहमनी साम्राज्य के पतन के कारण (Causes of Downfall of Bahmani Dynasty) 

बहमनी साम्राज्य के पतन के निम्न कारण थे-
(1) बहमनी राज्य का विजयनगर साम्राज्य से अनवरत युद्ध ।.
(2) बहमनी साम्राज्य का अयोग्य सैनिक संगठन।
 
(3) बहमनी साम्राज्य में प्रान्तपतियों की प्रबलता ।
(4) बहमनी सुल्तान अत्यधिक असहिष्णु थे और अकसर हिन्दुओं का निर्दयतापूर्वक वध कर देते थे।
(5) हिन्दुओं के मन्दिरों को विध्वंस करना और उनको लूटना।

विजयनगर साम्राज्य (VIJAYA NAGAR EMPIRE)

प्रान्तीय प्रशासन विजयनगर साम्राज्य का विभाजन प्रान्त राज्य या मंडल में किया गया था। कृष्णदेव राय के शासनकाल में प्रान्तों की संख्या सर्वाधिक 6 थी। प्रान्तों के गवर्नर के रूप में राज परिवार के सदस्य या अनुभवी दण्डनायकों की नियुक्ति की जाती थी। इन्हें सिक्कों को प्रसारित करने, नए कर लगाने, पुराने कर माफ करने एवं भूमिदान करने आदि की स्वतन्त्रता प्राप्त थी। प्रान्त के गर्वनर को भू-राजस्व का एक निश्चित हिस्सा केन्द्र सरकार को देना होता था । प्रान्त को मंडल एवं मंडल को कोट्टम या जिले में विभाजित किया गया था। कोट्टम को ‘वलनाडु भी कहा जाता था । कोट्टम का विभाजन ‘नाडुओं में हुआ था जिसकी स्थिति आज के परगना एवं तालुका जैसी थी।
(1) प्रान्त– मंडल-कोट्टम या वलनाडु 
(2) प्रकोट्टम – नाडु मेलाग्राम उर या ग्राम।
सामान्यतः प्रान्तों में राजपरिवार के व्यक्तियों को ही नियुक्त किया जाता था। गवर्नरों को सिक्के जारी करने, नए कर लगाने, पुराने करों को माफ करने, भूमिदान देने जैसे अधिकार प्राप्त थे। संगम युग में गवर्नरों के रूप में शासन करने वाले राजकुमारों को ‘उरैयर’ की उपाधि मिली हुई थी।

विजयनगर साम्राज्य का पतन (Downfall of Vijay Nagar Empire) 

विजयनगर साम्राज्य के पतन के लिए निम्न कारण थे-
(1) विजयनगर साम्राज्य का बहमनी राज्य से अनवरत युद्ध ।
 
(2) विजयनगर साम्राज्य का अयोग्य सैनिक संगठन ।
(3) विजयनगर साम्राज्य में प्रान्तपतियों की प्रबलता । 
(4) विजयनगर साम्राज्य के पश्चिमी तट पर पुर्तगालियों का
(5) विजयनगर साम्राज्य के अन्तिम शासकों की जन विरोधी नीतियाँ ।

Leave a Comment