कोशिका (Cell) का अर्थ और उसकी रचनाओं का वर्णन

मानव शरीर असंख्य छोटी-छोटी जीवित इकाइयों से मिलकर बना है। इकाइयों को कोशिका (Cell) कहते हैं। कोशिकाएँ निर्जीव नहीं हैं बल्कि ये शरीर की जीवित इकाइयाँ हैं। ये गति करती हैं, श्वास लेती हैं, अपना पोषण कर वृद्धि करती हैं, व्यर्थ पदार्थों का त्याग करती हैं तथा जनन भी करती हैं, अतः मानव शरीर असंख्य जीवित इकाइयों का समूह है। ये मानव शरीर की निर्माणक इकाइयाँ हैं। शरीर निर्माण में यह ठीक उसी प्रकार कार्य करती हैं जैसे एक भवन निर्माण में ईंटें। ईंटों का आपस में जोड़ने हेतु सीमेण्ट का प्रयोग किया जाता है जबकि कोशिकाएँ शरीर में कोलोजन नामक तत्व से जुड़ी रहती हैं। यद्यपि ये कोशिकाएँ आपस में जुड़ी रहती हैं फिर भी शरीर में पायी जाने वाली प्रत्येक कोशिका का एक अलग अस्तित्व होता है। प्रत्येक कोशिका एक पतली झिल्ली से ढँकी रहती है और दूसरी कोशिका से अलग रहती है।

कोशिकाएँ जीव जीवधारियों में पायी जाती हैं जिनमें से ये अधिकांश जीवधारी बहुकोशिकीय (असंख्य कोशिकाओं से निर्मित) होते हैं। लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो एक कोशिकीय (केवल एक ही कोशिका से निर्मित) होते हैं; जैसे-अमीबा आदि।

एक कोशीय जीवों को एककोशीय (Unicellular) तथा बहुकोशीय जीवों को बहुकोशीय (Multicellular) कहते हैं।

कोशिकाओं का वर्गीकरण 

प्रत्येक कोशिका की आन्तरिक संरचना समाप्त होती है लेकिन उनका बाह्य आकार तथा कार्य पृथक्-पृथक् होते हैं। कार्यों और आकार के आधार पर कोशिकाओं को कई भागों में बाँटा गया है-

(1) रक्त कोशिकाएँ (Blood Cells) – रक्त में दो प्रकार की कोशिकाएँ पायी जाती हैं—श्वेत रक्त कोशिकाएँ और लाल रक्त कोशिकाएँ। लाल रक्त कोशिकाएँ गोल

तथा तश्तरी के समान उभरी हुई होती हैं। श्वेत कोशिकाएँ अनियमित आकार की होती हैं तथा लाल रक्त कोशिकाओं की तुलना में इनका आकार भी कुछ बड़ा होता है तथा ये रंगहीन होती हैं।

(2) पेशीय कोशिकाएँ (Muscular Cells) – पेशीय कोशिकाएँ पतली, लम्बी और दोनों सिरों पर नुकीली होती हैं। ये आपस में मिलकर पेशीय ऊतकों का निर्माण करती हैं जिनके द्वारा शरीर के समस्त आन्तरिक, बाह्य और ऐच्छिक तथा अनैच्छिक अंग क्रियाशील रहते हैं। पेशीय कोशिकाओं में कुछ कोशिकाएँ धारीदार भी होती हैं जो ऐच्छिक माँसपेशियों में पायी जाती हैं।

(3) अस्थि कोशिकाएँ (Bone Cells) – अस्थि निर्माणक कोशिकाओं को अस्थि कोशिकाएँ कहते हैं। ये बेलनाकार होती हैं तथा चारों ओर महीन छोटे-छोटे रेशे निकले रहते हैं। इनमें केन्द्रक अन्य कोशिकाओं की तुलना में अपेक्षाकृत बड़ा होता है।

(4) तन्त्रिका कोशिकाएँ (Nervous Cells) – तन्त्रिका कोशिका की संरचना शरीर की अन्य कोशिकाओं से काफी अलग होती है प्रत्येक तन्त्रिका कोशिका के दो भाग होते हैं। ऊपरी भाग चौड़ा तथा असमान आकार का होता है जिसे कोशिका पिण्ड कहते हैं। इसमें केन्द्रक होता है। चारों ओर महीन बालों जैसी संरचनाएँ होती हैं। इसके नीचे की ओर दूसरा भाग बारीक दुम के समान होता है जिसे अक्ष तन्तु कहते हैं। सम्पूर्ण की फैली रहती हैं और अंगों का सम्बन्ध मस्तिष्क से बनाये रखती हैं। शरीर की अन्य कोशिकाओं से तन्त्रिका कोशिका में एक अन्तर होता है। शरा क्योंकि ये कोशिकाएँ अन्य कोशिकाओं की भाँति पुनः निर्मित नहीं होती हैं। आयु-वृद्धि के साथ-साथ ये केवल आकार में बढ़ती है संख्या में नहीं।

(5) संयोजी कोशिकाएँ (Connective Cells) – संयोजी कोशिकाएँ आपस में मिलकर संयोजी ऊतकों का निर्माण करती हैं जो शरीर के सभी अंगों को एक-दूसरे से जोड़ने का कार्य करते हैं। अंगों के अनुसार यह लम्बे, गोल, अण्डाकार और असमान आकार के होते हैं।

(6) त्वचा या आच्छादक कोशिकाएँ (Epithelium Cells)—आच्छादक कोशिकाएँ पतली झिल्ली के आकार की होती हैं। ये आपस में मिलकर आच्छादक ऊतकों का निर्माण करती हैं। सम्पूर्ण शरीर की आन्तरिक और बाह्य त्वचा का निर्माण इन्हीं कोशिकाओं से होता है जो सुरक्षात्मक झिल्ली के रूप में प्रत्येक अंग को ढँके रहती है।

कोशिका की रचना

प्रत्येक कोशिका के तीन अंग होते हैं- 

(1) कोशिका भित्ति (Cell Wall), 

(2) कोशिका द्रव्य (Protoplasm), 

(3) केन्द्रक (Nucleus) ।

(1) कोशिका भित्ति (Cell Wall) – कोशिका के ऊपर एक पतली दोहरी झिल्ली चढी रहती है जो कोशिका के आन्तरिक भाग की रक्षा करती है। इस भित्ति के कारण ही प्रत्येक कोशिका दूसरी कोशिका से अलग रहती है और अपना अलग अस्तित्व है। कोशिका के भीतरी भाग जो जीवद्रव्य में पाया जाता है उसी का कुछ भाग गाढ़ कठोर होकर कोशिका भित्ति का निर्माण करता है।

(2) कोशिका द्रव्य (Cytoplasm ) – कोशिका भित्ति के अन्दर एक गाढ़ा चिपचिप तरल, रंगहीन और अर्द्धपारदर्शक पदार्थ भरा रहता है जिसे जीवद्रव्य (Protoplasm) कहते हैं। जीवद्रव्य ही कोशिका और मानव का जीवन है। यदि कोशिका से जीवद्रव्य को समाप्त कर दिया जाये तो वे मृत हो जाती हैं इसी से कोशिका जीवित रहती है और अपना पोषण करती है। जीवद्रव्य में जल, प्रोटीन, वसा और कार्बोहाइड्रेट विद्यमान रहते हैं।

जीवद्रव्य कोशिका के दो भागों में होता है। केन्द्रक के अन्दर और केन्द्रक के बाहर । कोशिका भित्ति के अन्दर और केन्द्रक के बाहर वाले जीवद्रव्य को साइटोप्लाज्म (Cytoplasm) तथा केन्द्रक के अन्दर जीवद्रव्य को न्यूक्लिओप्लाज्म (Nucleplasm) कहते हैं।

साइटोप्लाज्म एक-सा अन्तःकोशिका रस (Cytoplasm ) – साइटोप्लाज्म कोशिका में सभी स्थानों में गाढ़ा सा नहीं होता। यह अर्द्ध-तरल होता है और कहीं कम गाढ़ा और कहीं अधिक गाढ़ा दिखायी देता है। अधिक गाढ़े भाग में कुछ पिण्ड (Bodies) दिखायी देते हैं जिसमें सबसे महत्वपूर्ण पिण्ड केन्द्रक है। केन्द्रक के अतिरिक्त कई अन्य पिण्ड भी पाये जाते हैं, निम्नलिखित हैं-

(अ) सेण्ट्रोसोम (Centrosome), 

(ब) माइटोकॉण्ड्रिया (Mitochondria),(स) गॉल्गी बॉडी (Golgi Bodies), 

(द) रसधानी (Vacuoles)। 

(अ) सेण्ट्रोसोम (Centrosome ) –यह सितारे के आकार का नन्हा-सा पिण्ड होता है और बाहर केन्द्रक के पास होता है। कोशिका विभाजन की क्रिया में यह महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह केवल जंतु कोशिका मे पाया जाता है ।

(ब) माइटोकॉण्ड्रिया (Mitochondria)- ये गतिशील पिण्ड हैं तथा अपना स्थान बदलने के साथ-साथ आकृति भी बदलते रहते हैं। कोशिका में ये लाखों की संख्या में रहते हैं । यह कुछ ऐसे स्रावों (ATP) को उत्पन्न करते हैं जो कोशिका की उपापचय क्रिया में सहायक होते हैं।

(स) गॉल्गी बॉडीज (Golgi Bodies) – यह नली के समान सूक्ष्म संरचनाएँ हैं। इनके कार्य का ज्ञान भली प्रकार नहीं हो पाया है। ये भी केन्द्रक के पास स्थित रहती है। 

(द) रसधा नयाँ (Vacuoles) – कोशिका में यह नन्हें-नन्हें छेद के रूप में दिखाये देते हैं। कोशिका वृद्धि के समय कोशिका रस (Cytoplasm) के फैलने से कोशिका रस में रिक्त स्थान शेष रह जाती हैं इन्हीं को रसधानियाँ (Vacuoles) कहते हैं। इनमें एक तरल पदार्थ भरा रहता है जिसमें कई पदार्थ घुले रहते हैं इससे कोशिका में जल का सन्तुलन बना रहता है। इनकी सहायता से कोशिका भोजन ग्रहण करती है।

(3) केन्द्रक (Nucleus) – केन्द्रक कोशिका का सबसे महत्वपूर्ण अंग है। यह कोशिका के मध्य में स्थित होता है और कोशिका रस (Cytoplasm) का ही सघन पिण्ड है। यह अधिक गहरे रंग का होता है, अत: इसे कोशिका में आसानी से पहचाना जा सकता है। केन्द्रक ही कोशिका का जीवन है। केन्द्रक के द्वारा ही कोशिका वृद्धि तथा जनन करती है। कोशिका के बाह्य भाग के समान ही केन्द्रक भी एक पतली झिल्ली स आवृत रहता है, जिसे केन्द्रक कला कहते हैं। केन्द्रक के अन्दर भी गाढ़ा तरल चिपचिपा पदार्थ भरा रहता है जो कोशिका रस से अधिक गाढ़ा होता है इसे केन्द्रक जीवद्रव्य (Nucleoplasm) कहते हैं इसके अतिरिक्त क्रोमोसोम्स व जीन भी पाये जाते हैं।

केन्द्रक जीवद्रव्य(Nucleoplasm)-केन्द्रक के अन्दर के गाढ़े तरल तथा चिपचिपा पदार्थ को केन्द्रक जीवद्रव्य कहते हैं। यह कोशिका की क्रियाओं को संचालित करता है।

क्रोमोसोम्स (Chromosomes)-केन्द्र के अन्दर धागे के समान प्रोटीन की बनी संरचनाएँ होती हैं जो महीन कणों के रूप में केन्द्रक द्रव्य में फैली रहती हैं इस समय इन्हें क्रोमेटिन कण (Chromatin Granules) कहते हैं। कोशिका विभाजन के समय यह लम्बे सूत्रों का रूप धारण कर लेते हैं जब इन्हें क्रोमोसोम्स का गुणसूत्र कहते हैं। प्रत्येक कोशिका में 23 जोड़े क्रोमोसोम होते हैं ये ही नये जीव का स्वास्थ्य व विकास निर्धारित करते हैं। क्रोमोसोम्स के अन्दर ही अत्यन्त महीन संरचनाएँ पायी जाती हैं, जिन्हें जीन्स कहते हैं। माता और पिता के आनुवंशिक गुण इन्हीं सूत्रों द्वारा बच्चे में हस्तान्तरित होते हैं इसलिए जीन्स को “आनुवंशिकता के वाहक” भी कहा जाता है।

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