गुप्तकाल की प्रमुख विशेषताएँ और साहित्यिक प्रगति का उल्लेख

शासकों ने भारत को राजनीतिक एकता, सुरक्षा व भावना प्रदान की। गुप्तकाल शान्ति समृद्धि, नगर संस्कृति तथा परिमार्जन, धार्मिक पुनरुथान तथा बौद्धिक प्रयास, उत्कृष्ट साहित्य तथा कला की उन्नति का युग था। आत्म-विश्वास के साथ भारतीय संस्कृति दरबार के आचार-व्यवहार, मुद्रा, विज्ञान तथा कला के क्षेत्र में विदेशों में बहुत-सी ब अंगीकार कर लीं, परन्तु विदेशों से सीखते समय भी यह ध्यान रखा कि इससे उसकी भारतीय नष्ट न हो। भारत की मूलभूत भारतीयता को पूर्णतः समझा गया, पुष्ट किया गया है तथा उसे परिमार्जित एवं चिरस्थायी रूप में व्यक्त किया गया ताकि आगे आने वाली पीढ़ी के समक्ष एक आदर्श प्रस्तुत किया जा सके। 

डॉ. आर. एस. त्रिपाठी ने भी गुप्त युग को स्वर्ण युग मानते हुए लिखा है, “गुप्त सम्राटों का काल भारतीय इतिहास में स्वर्ण युग कहा जाता है। इस काल के अनेक उदात्त, मेधावी और शक्तिशाली राजाओं ने उत्तर भारत को एक छत्र के नीचे संगठित कर शासन में सुव्यवस्था तथा देश में समृद्धि व शक्ति की स्थापना की।” स्मिथ ने भी भारतीय इतिहास में गुप्त युग की सर्वश्रेष्ठ माना है। उनके शब्दों में, “हिन्दू इतिहास में अन्य सभी गुणों की तुलना में महान गुप्त शासकों का काल सर्वाधिक अभिमत व सन्तोषजक है। इस युग में साहित्य, कला और विज्ञान की असाधारण प्रगति हुई तथा बिना किसी अत्याचारः के क्रमिक धार्मिक प्रगति हुई।”

गुप्तकाल को न केवल स्वर्ण-युग कहा जाता है, वरन् उसकी तुलना अन्य विश्व-प्रसिद्ध युगों से की जाती है। एल. डी. बारनेट ने गुप्त युग को भारत का ‘पैरीक्लीअन-युग’ कहा है। इसके अतिरिक्त कुछ अन्य इतिहासकारों ने गुप्तकाल को इंग्लैण्ड के एलिजाबेथ के शासनकाल (जिसे इंग्लैण्ड का स्वर्ण-युग कहा जाता है) के समान माना है। गुप्तकाल को ‘क्लासिकल एज’ (Classical Age) की भी संज्ञा दी जाती है।

गुप्तकाल को स्वर्ण युग कहा जाने के लिए इस युग में हुई चतुर्दिक उन्नति उत्तरदायी है। इस काल में राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक तथा कला आदि प्रत्येक क्षेत्र में असीमित उन्नति हुई।

 साहित्यिक उन्नति

गुप्तकाल साहित्यिक उन्नति का युग था। डॉ. त्रिपाठी में लिखा था “यह स्वाभाविक ही था कि इस सुरक्षा और साम्पत्तिक समुन्नति की में धर्म, साहित्य, कला तथा विज्ञान के क्षेत्रों में सक्रियता बढ़े और उन्नति हो।” वास्तव में इन प्रत्येक क्षेत्रों में, गुप्तों के शासनकाल में अभूतपूर्व उन्नति हुई। दशा गुप्तवंशीय शासक तलवार के धनी होने के साथ-साथ स्वयं भी विद्वान थे तथा विद्वानों को आश्रय व प्रोत्साहन भी देते थे। उनकी इस प्रेरणा के कारण गुप्तकाल साहित्य की दृष्टि से चरमोन्नति पर पहुँच गया।

गुप्त गुप्त शासकों ने राष्ट्रीय भाषा के रूप में संस्कृत को गौरवान्वित किया। गुप्तों के संरक्षण में संस्कृत भाषा और उसका साहित्य जिस रूप से विकसित और उन्नत हुआ वह अद्वितीय था। गुप्त युग के अभिलेखों से पता चलता है कि गुप्त युग के पण्डित व साहित्यसेवी संस्कृत पद्य और दोनों के रचना शिल्प के सिद्धहस्त और कुशल काव्यकार थे। काव्य के इस कौशल को अनुप्रेरित, अनुप्राणित और उत्थित करने का श्रेय विद्यानुरागी गुप्त सम्राटों को ही है जिनके प्रश्नय और संरक्षण में लक्ष्मी ने सरस्वती से अपना परम्परागत विरोध त्याग दिया।

गुप्त युग की काव्य-रचना की शैली अत्यन्त सुघड़, सुन्दर और ललित थी और भाषा सुरम्य एवं अलंकारपूर्ण थी। गुप्त शासकों के राजदरबार में अनेक कवि और विद्वान रहते थे। गुप्तकालीन प्रमुख विद्वान हरिषेण (प्रयाग प्रशस्ति का रचयिता ), विशाखदत्त (मुद्राराक्षस का लेखक), विष्णु शर्मा (पंचतंत्र), वसुबन्ध, वराहमिहिर, भास, भारवि, शूद्रक, दण्डिन, अमर, चान्द्र व जैनेन्द्र हैं, जिन्होंने अनेक ग्रन्थों की रचना कर गुप्तकाल को साहित्यिक उन्नति की ओर अग्रसर किया। गुप्तकालीन विद्वानों में सर्वोपरि स्थान कालिदास का है जो सम्भवतः चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल में हुआ था। कालिदास ने ‘शकुन्तला’, ‘मालविकाग्निमित्र’ और ‘विक्रमोर्वशीयम्’ नामक तीन नाटक; ‘कुमारसम्भव’ व ‘रघुवंश’ नामक काव्य, ‘ऋतुसंहार’ नामक गीतिकाव्य तथा ‘मेघदूत’ नामक खण्ड काव्य की रचना की। कालिदास निश्चित रूप से भारतीय काव्यात्मक शैली का सर्वोच्च विद्वान था। डॉ. आर. सी. मजूमदार ने उसकी प्रशंसा करते हुए लिखा है, “कालिदास गुप्त युग के साहित्य आकाश का सबसे चमकदार नक्षत्र है जिसने सम्पूर्ण संस्कृत साहित्य पर प्रकाश डाला है। वह सर्वसम्मति से महानतम् कवि और नाटककार था तथा उसकी कृतियाँ सभी युगों में अत्यन्त प्रसिद्ध व लोकप्रिय रही हैं।”

गुप्तकाल में ही अनेक पुराणों की रचना हुई तथा अनेक स्मृतियों को नवीन रूप प्रदान किया गया। इसी युग में अनेक दार्शनिकों का भी आविर्भाव हुआ जिनमें दिग्नाग, वात्स्यायन व स्वामिन प्रमुख हैं। वात्स्यायन के ‘कामसूत्र’ की रचना में इसी युग में हुई।

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