जीवित कोशिकाओं के लक्षण, गुण व कार्य – Jeevit Koshika Ke Lakshad, Gud, Karya in Hindi

कोशिका मानव शरीर की इकाई है। जीवित प्राणी के समान यह भी वृद्धि कर है, साँस लेती है, गति करती है, भोजन ग्रहण करती है, जनन करती है तथा संवेदनशील होती है। इन्हीं लक्षणों के कारण ही कोशिका को जीवित इकाई माना जाता है। जीवित कोशिका के निम्नलिखित लक्षण है।

जीवित कोशिकाओं के लक्षण, गुण व कार्य - Jeevit Koshika Ke Lakshad, Gud, Karya in Hindi

(1) वृद्धि (Growth)—कोशिका सजीव इकाई है। मानव शरीर की वृद्धि कोशिकाओं की वृद्धि पर ही निर्भर करती है। प्रत्येक कोशिका भोजन ग्रहण कर अपने लिए जीवद्रव्य का निर्माण करती है और वृद्धि करती रहती है लेकिन कोशिकाओं में यह वृद्धि निश्चित सीमा तक ही होती है उसके बाद में ये मृत हो जाती है। लेकिन मृत से पूर्व ये कोशिका विभाजन द्वारा नये कोशिकाओं का निर्माण कर जाती है जैसे रक्त में लाल रक्त कोशिकाओं की जीवन अवधि केवल तीन से चार माह होती है उसके बाद में नष्ट हो जाती है।

(2) गति (Locomotion ) – जीवित प्राणियों के समान कोशिकाएँ भी गति करती हैं। शरीर से यह आवश्यकतानुसार अपना स्थान बदल लेती हैं। उदाहरण के लिए जब शरीर पर किसी रोग के जीवाणुओं का आक्रमण होता है तो श्वेत कोशिकाएँ (W.B.C.) रक्त कोशिकाओं की पतली दीवारों से छनकर बाहर निकल आती हैं और रोग के जीवाणुओं को चारों ओर से घेर लेती है।

(3) श्वसन (Respiration)- श्वसन क्रिया के दौरान जीवित प्राणी ऑक्सीजन ग्रहण करता है और कार्बन डाइऑक्साइड त्यागता है। कोशिकाएँ भी श्वसन करती है। कोशिका का जीवद्रव्य रक्त से ऑक्सीजन ग्रहण करता है तथा चयापचय क्रियाओं के बाद उत्पन्न कार्बन डाइ-ऑक्साइड को रक्त में त्याग देता है जिससे कोशिकाएँ साफ रहती हैं व उनका जीवन बना रहता है।

(4) पोषण (Nutrition)—कोशिकाओं में वृद्धि का गुण होता है और वह वृद्धि पोषण के बिना असम्भव है, अत: कोशिकाएँ भी भोजन ग्रहण करती हैं। रक्त परिसंचरण क्रिया के दौरान पौष्टिक तत्वों युक्त शरीर के विभिन्न भागों में पहुँचता है तो यह कोशिकाएँ रक्त से पौष्टिक तत्वों का. ग्रहण करने के लिए जीवद्रव्य (Protoplasm) का निर्माण करती हैं और अपना पोषण करती हैं।

(5) आत्मीकरण (Assimilation) – मानव शरीर जो भोजन ग्रहण करता है उसमें विभिन्न प्रकार के पौष्टिक तत्व होते हैं। पाचन संस्थान द्वारा इन पौष्टिक तत्वों का पाचन कर उन्हें तरल अवस्था में परिवर्तित कर अवशोषण योग्य बनाया जाता है। अवशोषण क्रिया में भी ये पौष्टिक तत्व रक्त में मिल जाते हैं और रक्त परिसंचरण के दौरान शरीर के सभी भागों में पहुँचते हैं। कोशिकाएँ भी अवशोषण या आत्मीकरण का कार्य करती हैं

(6) उत्सर्जन (Excretion) – जीवित प्राणियों के समान कोशिकाएँ भी व्यर्थ पदार्थों का त्याग करती हैं। ये अपने पोषण के लिए रक्त से पौष्टिक तत्व ग्रहण करती हैं तथा विभिन्न रासायनिक क्रियाओं द्वारा जीवद्रव्य का निर्माण करती हैं जिसके फलस्वरूप कार्बन डाइ ऑक्साइड उत्पन्न होती हैं। इस कार्बन डाइ ऑक्साइड को वे त्याग देती है जो रक्त के द्वारा फेफड़ों में पहुँचाये जाते हैं और श्वास द्वारा त्यागे जाते हैं।

(7) संवेदनशीलता (Sensetivity) – कोशिकाओं में संवेदनशीलता का गुण होता है। कोशिकाओं की संवेदनशीलता के कारण ही व्यक्ति प्रतिकूल परिस्थिति में अपनी रक्षा करता है; जैसे-किसी गर्म वस्तु से हाथ लग जाने पर व्यक्ति तुरन्त अपने हाथ को हटा लेता है।

(8) प्रजनन (Reproduction)- अपनी प्रजाति की निरन्तरता को बनाये रखने के लिए कोशिकाएँ जनन भी करती हैं। कोशिकाओं के इसी गुण के कारण जीवित प्राणियों में विकास होता है। कोशिका विभाजन की क्रिया द्वारा ये एक से अनेक में परिवर्तित हो जाती हैं। नयी उत्पन्न होने वाली प्रत्येक कोशिका गुणों में अपनी मातृ कोशिका के समान ही होती है।

(9) मृत्यु (Death) – यद्यपि प्रत्येक कोशिका वृद्धि व जनन करती है। लेकिन यह वृद्धि सीमित समय के लिए ही होती है एक निश्चित समय बाद कोशिका की मृत्यु हो जाती है। प्रजनन क्रिया द्वारा यह नयी कोशिकाओं को जन्म दे जाती है जो उसकी वंश परम्परा को बनाये रखती हैं। इस प्रकार कोशिका में जीवित प्राणी समान सभी लक्षण पाये जाते हैं इसलिए कोशिका को ‘जीवित इकाई’ कहा जाता है।

Leave a Comment