ड्यूवी के शैक्षिक विचारों का परिचय-Dewey Ke Shaikshik Vicharon ka Parichay in Hindi

ड्यूवी के शैक्षिक विचार ड्यवी कहता है कि शिक्षा कोई जड़ वस्तु नहीं है जो किसी को वस्तु के रूप में दी जा सके। शिक्षा कोई स्थिर क्रिया भी नहीं है। यह प्रगति की ओर सदैव क्रियाशील रहती है । इससे मनुष्य दिन व दिन विकास करता जाता है । चूँकि शिक्षा से जीवन की प्रगति होती है, अतः उसे गतिशील क्रिया कहा जाता है । शिक्षा से बालक के व्यक्तित्व का विकास होता है । ड्यवी के विभिन्न शैक्षिक विचार इस प्रकार हैं-

ड्यूवी के शैक्षिक विचारों का परिचय-Dewey Ke Shaikshik Vicharon ka Parichay

(1) शिक्षा का अर्थ – ड्यूवी के अनुसार शिक्षा का अर्थ इस प्रकार है- 

(i) शिक्षा विकास की प्रक्रिया है (Education is the Process of Development)—ड्यवी शिक्षा को विकास की प्रक्रिया मानता है । मानव जीवन की विशेषता विकास है और विकास का सम्बन्ध शिक्षा से है । मनुष्य की आन्तरिक शक्तियों का सदैव विकास होता रहता है । इस प्रकार शिक्षक का कार्य बालक के विकास में है सहायता पहुँचाना है ।

(ii) शिक्षा सामाजिक प्रक्रिया है (Education is a Social Process)— ड्यूवी | ड्यूवी के अनुसार, (Dewey) शिक्षा को सामाजिक प्रक्रिया मानता है। बालक की शिक्षा के लिए विद्यालय आवश्यक होता है । ड्यूवी इसे सामाजिक वातावरण कहता बालक को सामाजिक वातावरण में ही रखकर शिक्षित किया जा सकता है। ड्यूवी रूसो (Rousseau) के इस विचार से सहमत नहीं है कि बालक के विकास के लिए वातावरण की आवश्यकता नहीं होगी। ड्यूवी के अनुसार, बालक को सामाजिक कार्यों में भाग लेना चाहिए। ड्यूवी कहता भाग लेने से आगे बढ़ती है ।” 

(iii) शिक्षा पुनर्निर्माण की प्रक्रिया है (Education is a Process of Reconstruction)—ड्यूवी शिक्षा को पुनर्निर्माण की प्रक्रिया मानता है । व्यक्ति का जीवन अनुभव से पूर्ण रहता है। शिक्षा व्यक्ति के इन्हीं अनुभवों के पुनर्निर्माण की प्रक्रिया है ।

(iv) शिक्षा जीवन की आवश्यकता है (Education is a Necessity of Life)—– ड्यूवी के अनुसार, “शिक्षा स्वयं जीवन है ।” ड्यूवी का इससे आशय है कि बालक अपने वर्तमान से रुचि रखता है । इस प्रकार शिक्षा का सम्बन्ध बालक की वर्तमान आवश्यकताओं से होता है । शिक्षा बालक की मूल प्रवृत्तियों का उदात्तीकरण (Sublimation) करती है। शिक्षा ही उन पर नियन्त्रण रखती है। स्पष्ट है कि जीवन की प्रगति के लिए शिक्षा आवश्यक है। ड्यूवी यह नहीं मानता कि शिक्षा बालक के भावी जीवन की तैयारी है।

(2) शिक्षा के उद्देश्य – ड्यूवी के अनुसार शिक्षा के उद्देश्य इस प्रकार हैं-

(i) सामाजिक कुशलता प्राप्त करना (To Acquire Social Efficiency)— ड्यूवी के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य सामाजिक कुशलता प्राप्त करना परन्तु सामाजिक कुशलता का क्या अभिप्राय है ? ड्यूवी का सामाजिक कुशलता से अभिप्राय है-व्यक्ति में समाज के समस्त कार्यों में भाग लेने की कुशलता । सामाजिक कुशलता व्यक्ति ही सामाजिक उत्तरदायित्वों को भली प्रकार निभा सकता है। इस प्रकार शिक्षा का यह उद्देश्य अत्यन्त व्यापक है ।

(ii) अनुभवों का पुनर्निर्माण गतिशील (Reconstruction of Experiences)—– ड्यूवी यह नहीं मानता कि शिक्षा के उद्देश्य होते हैं इस कारण शिक्षा के उद्देश्य पहले से निश्चित नहीं किये जा सकते। वह शिक्षा के तात्कालिक उद्देश्यों में विश्वास करता है। परन्तु क्या कोई क्रिया उद्देश्य रहित हो सकती है ? नहीं। इसी कारण ड्यूवी शिक्षा का उद्देश्य अनुभवों को पुनः निर्माण मानता है।

(iii) गतिशील अनुकूलन योग्य मस्तिष्क का विकास (Cultivation of Dynamic Adaptable Mind) — हम बता चुके हैं कि ड्यूवी शिक्षा के पूर्व निश्चित उद्देश्यों का विरोधी था । इसी कारण उसने शिक्षा का तात्कालिक उद्देश्य गतिशील अनुकूलन योग्य मस्तिष्क का विकास बताया है।

(iv) वातावरण के साथ अनुकूलन (Adaptation of Environment)—शिक्षा का एक उद्देश्य वातावरण के साथ अनुकूलन करना भी है। इस सम्बन्ध में ड्यूवी कहता है, “शिक्षा की प्रक्रिया अनुकूलन की एक निरन्तर प्रक्रिया है जिसका प्रत्येक अवस्था में उद्देश्य विकास की बढ़ती हुई क्षमता प्रदान करना होता है ।”

(3) पाठ्यक्रम — ड्यूवी उस समय के प्रचलित पाठ्यक्रम को अनुपयुक्त समझता था । इसी कारण उसने उस पाठ्यक्रम की कड़ी आलोचना की है । उसके अनुसार पाठ्यक्रम निर्माण के समय कुछ सिद्धान्तों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। वे सिद्धान्त इस प्रकार हैं-

(i) रुचि का सिद्धान्त (Principles of Interest)— पाठ्यक्रम का निर्माण बालक की रुचियों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। इसी आधार पर उसने पाठ्यक्रम में अधोलिखित विषयों को सम्मिलित किया है—भाषा, गणित, इतिहास, भूगोल, कला, संगीत तथा गृह विज्ञान ।

(ii) उपयोगिता का सिद्धान्त (Principle of Utility) – पाठ्यक्रम निर्माण में इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि उसमें सम्मिलित किये हुए विषयों की जीवन में उपयोगिता हो । ड्यूवी ने जीवन की अनेक आवश्यकताओं का उल्लेख किया है। उसके अनुसार पाठ्यक्रम में ऐसे विषयों को स्थान दिया जाना चाहिए जो इन आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायक हो सकें। इस आधार पर उसने पाठ्यक्रम में अर्थशास्त्र, गृहविज्ञान, इतिहास, भूगोल, गणित तथा विज्ञान आदि विषयों का स्थान दिया है ।

(iii) एकीकरण का सिद्धान्त (Principle of Integration)— ड्यूवी का विश्वास है कि बालकों को विभिन्न विषयों से सह-सम्बन्ध स्थापित करके पढ़ाया जाना चाहिए । यदि इस प्रकार के पाठ्यक्रम के विषयों को सम्मिलित किया जायेगा तो इस प्रकार से प्राप्त ज्ञान स्थायी होगा । ड्यूवी ने पाठ्यक्रम के निर्माण में एकीकरण पर विशेष बल दिया है।

(iv) लचीलेपन का सिद्धान्त (Principle of Flexibility) — पाठ्यक्रम बनाते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि आवश्यकता पड़ने पर उसमें परिवर्तन किया जा सके । यदि पाठ्यक्रम में कठोरता होगी तो बालक की रुचियों और आवश्यकताओं के अनुसार उसमें परिवर्तन नहीं किया जा सकेगा । इसी को पाठ्यक्रम का नम्यता का सिद्धान्त कहते हैं ।

(v) क्रियाशीलता का सिद्धान्त (Principle of Activity) — ड्यूवी ने पाठ्यक्रम निर्माण में क्रियाशीलता के सिद्धान्त को अपनाने का समर्थन किया है। वह पुस्तकीय ज्ञान को अव्यावहारिक मानता था । उसने लिखा है, “यहाँ पर समस्या यह है कि बालक के व्यवसाय, रचना, अभिव्यक्ति तथा प्रयोग की व्यक्तिगत क्रियाओं को पर्याप्त मात्रा में स्थान प्रदान किया जाए जिससे उसके नैतिक बौद्धिक विकास का जिसका परिचय उसे पुस्तकों द्वारा कराया जाता है— हनन न हो।”

(vi) बाल केन्द्रित पाठ्यक्रम (Child Centred Curriculum)—ड्यवी कहता है। कि पाठ्यक्रम का निर्माण बालक की रुचियों तथा आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए । इसी को बाल-केन्द्रित पाठ्यक्रम कहते हैं ।

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