नवजात शिशु की देखभाल के सम्बन्ध में विस्तारपूर्वक टिप्पड़ी

 नवजात शिशु का रुदन – प्रसव के बाद शिशु तथा माँ दोनों इतने कमजोर तथा असहाय होते हैं कि अपनी देखभाल स्वयं नहीं कर सकते हैं। जिस प्रकार माँ की देखभाल नर्सों तथा दाई को करनी पड़ती है। यदि प्रसव अस्पताल में होता है तो नवजात शिशु की देखभाल भी डॉक्टर और नर्स करते हैं। यदि प्रसव घर पर होता है तो नर्स तथा दाई बच्चे की देखभाल करती है। शिशु जन्म के बाद सबसे पहली चीज यह देखना है कि शिशु जीवित है या मृत शिशु जन्म के बाद डॉक्टर हृदय या नाभिनाल की धड़कन से शिशु के जीवित या मृत होने की पहचान करता है।

नवजात शिशु की देखभाल के सम्बन्ध में विस्तारपूर्वक टिप्पड़ी

जन्म के बाद शिशु का रोना आवश्यक है। रोने से बच्चे के फेफड़ों की प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है रोने से फेफड़े फैलकर श्वास-क्रिया प्रारम्भ करते हैं। यदि बच्चा स्वयं नहीं रोता तो डॉक्टर उसे रुलाने के विभिन्न उपाय करता है; जैसे

(1) चाँटे मारकर रुलाना। 

(2) बच्चे पर पानी के छींटे मारकर रुलाना। 

(3) बच्चे के नाक, मुँह में श्लेष्मा जमा होने से भी बच्चा नहीं रो पाता है डॉक्टर रुई से नाक मुँह से श्लेष्मा साफ कर उसे रुलाता है।

बच्चे के लिए रोना आवश्यक है, रोने से उसकी श्वास प्रणाली सुचारु रूप से चलने लगती है। गर्भनाल कटने से पहले श्वास क्रिया का सुचारु रूप से चलना आवश्यक है।

शिशु को प्रथम स्नान

गर्भनाल हटाने के बाद उसके शरीर पर लगे चिपचिपे सफेद पदार्थ को अलग किया जाता है। विदेशों में यह सफेद चिपचिपा पदार्थ 3-4 दिन बाद अलग करते हैं, ताकि बच्चा बाहर के वातावरण से सामंजस्य कर ले। किन्तु भारत जैसे गर्म देश में शिशु जन्म के बाद इस मोम जैसे पदार्थ को साफ किया जाता है। इस पदार्थ को किसी नर्म कपड़े या रुई से रगड़कर साफ करना चाहिए। फिर जैतून के तेल की मालिश करके किसी Baby Soap को मलकर हल्के गुनगुने पानी से बच्चे को स्नान करवाना चाहिए। बच्चे को टब में लेटाकर स्नान नहीं करवाना चाहिए अन्यथा नाभि से जुड़ी गर्भनाल में पानी चला जाता है तथा वह घाव पक जाता है। जब तक गर्भनाल नाभि से अलग न हो जाए, घाव सूख न जाए, बच्चे को टब में लेटाकर स्नान नहीं करवाना चाहिए। प्रथम स्नान के समय बच्चे के विभिन्न अंगों की सफाई आवश्यक है।

नाक की सफाई—नाक साँस लेने का प्रमुख अंग है। शिशु जन्म के समय उसके नाक में म्यूकस (श्लेष्मा) जमा रहता है, जिसे साफ करना पहला काम है। इसे साफ करने के लिए पतले साफ कपड़े की बत्ती बनाकर या रुई की बत्ती बनाकर उसे धीरे-धीरे नाक में चारों ओर घुमना चाहिए जिससे बच्चे को छींक आ जाती है तथा नाक में जमा म्यूकस बाहर निकल आता है।

म्यूकस निकालने का दूसरा तरीका यह है कि अँगुली तथा अँगूठे से नाक को धीरे-धीरे दबाया जाना जाए जिससे म्यूकस बाहर निकल जाए। म्यूकस निकलने के बाद नाक को किसी साफ कपड़े या रुई से अच्छी प्रकार से साफ कर देना चाहिए।

कान की सफाई-कान के अंदर का मैल निकालने के लिए रुई का प्रयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि उसके रेशे कान में रह जाने का डर रहता है। इसके लिए पतले, मुलायम, साफ कपड़े की बत्ती बनाकर कान के चारों ओर घुमाने से कान का मैल निकल जाता है।

आँख की सफाई– आँख जो कि सबसे नाजुक अंग है। इसकी सफाई तथा सफाई की विधि दोनों पर विशेष ध्यान देना चाहिए जिससे आँख में जमी गंदगी बाहर निकल जाए। यदि Argyrol न हो तो बोरिक लोशन से आँखें धोयी जायें। आँखें साफ कर नहलाकर 1% वाले नाइट्रेड लोशन की 1-1 बूँद आँखों में डालनी चाहिए।

यदि बच्चे की आँख से पीला गंदा पदार्थ निकले तो साफ रुई से साफ करना चाहिए। यह पीला गंदा पदार्थ 1-2 दिन तक निकलता है। दोनों आँखों साफ करने के लिए अलग-अलग साफ रुई का प्रयोग करना चाहिए अन्यथा एक आँख से दूसरी आँख को रोग लग जाता है। यदि 2-3 दिन के बाद भी पीला पदार्थ तथा पानी आँख से निकले तो डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए।

गले की सफाई—नाक के समान ही बच्चे के गले में भी म्यूकस जमा रहता है। इसे भी मुलायम साफ कपड़े से साफ करना चाहिए। मुलायम साफ कपड़ा गीला कर अंगुली पर लपेटकर बोरिक लोशन में भिगोकर गले के चारों ओर घुमाना चाहिए जिससे म्यूकस साफ हो जायेगा। इसके बाद गले में चारों ओर बोरोग्लिसरीन लगा देना चाहिए।

शिशु को सुलाना

इन अंगों के साथ ही हाथ-पाँव के जोड़ों की जगह, मल-मूत्र के अंगों को अच्छी तरह से साफ कर मुलायम कपड़े से पोंछकर Baby Powder का प्रयोग करना चाहिए। फिर कपड़े पहनाने चाहिए। यदि गर्मी का मौसम है तो पतले मुलायम सूती वस्त्र पहनाने चाहिए। यदि ठण्ड का मौसम है तो वह भी वस्त्र को बदन को छुए, सूती ही हो, ऊपर गर्म कपड़े पहनाने चाहिए। कपड़े ढीले होने चाहिए । नेपकिन बाँध देना चाहिए।

शिशु को नहलाने के बाद कपड़े पहनाने से पहले उसका वजन कर लेना चाहिए। साधारणतया एक स्वस्थ बच्चे का वजन 6-7 पौण्ड के अंदर होता है। जन्म के बाद प्रथम सप्ताह में बच्चे का वजन घटता है। उसके बाद उसका वजन बढ़ना शुरू होता है। 1 6 माह का बच्चा अपने जन्म के वजन से दुगुना होता है तथा एक वर्ष की उम्र तक उसका वजन जन्म से तिगुना हो जाता है।

नवजात शिशु की देखभाल के सम्बन्ध में विस्तारपूर्वक टिप्पड़ी

प्रथम स्नान के बाद बच्चा सो जाता है, बच्चे को मुलायम बिस्तर पर सुलाना चाहिए। नीचे पतली मुलायम, गद्दी, उसके ऊपर मोमजामा, उसके ऊपर चादर तथा सिर के नीचे मुलायम पतला सा तकिया होना चाहिए। तकिए के स्थान पर मुलायम तौलिया भी रखा जा सकता है। मौसम के अनुसार ऊपर चादर, कम्बल का प्रयोग करें। मच्छर हों तो मच्छरदानी का प्रयोग करें। ठण्ड के मौसम में बच्चों को सुलाने से पहले गर्म पानी की थैली रकखर बिस्तर गर्म कर लेना चाहिए।

प्रारम्भ में बच्चा 24 में से 20-22 घण्टे तक सोता है। उसके स्वस्थ होने का प्रथम लक्षण यही है कि वह केवल भूख लगने पर रोयेगा। उम्र बढ़ने के साथ-साथ नींद कम होती जाती है। चौथे माह में 18-20 घण्टे तक सोता है। एक वर्ष का होते-होते 15 घण्टे तक सोता है (वर्तमान समय में व्यावहारिक रूप में बच्चे इतनी देर सोते नहीं दिखायी देते। इसका कारण वातावरण में व्याप्त शोर है जो उन्हें सोने नहीं देता है अन्यथा स्वस्थ बालक को उपरोक्त समय तक सोना चाहिए) यदि बालक पूर्णतया स्वस्थ है तो भूख लगने पर या मलमूत्र से बिस्तर गीला होने पर ही बच्चा रोता है अन्यथा सोता रहता है या यदि जगा भी हो तो चुपचाप खेलता रहता है।

नवजात शिशु का आहार 

माता का दूध बच्चे के 24 घण्टे बाद ही प्रारम्भ होता है और तभी बच्चे को मिल सकता है। तब तक बच्चे को उबला पानी पिलायें तथा शहद चटायें। इसके बाद माँ का दूध आने पर माँ के स्तनों को अच्छी तरह साफ कर बच्चों को माँ का दूध देना चाहिए। यदि किसी कारण से माँ बच्चे को दूध देने में असमर्थ होती है तो बोतल से बच्चे को दूध देना चाहिए। इस प्रकार हम देखते हैं कि बच्चे को दिया जाने वाला दूध दो प्रकार का होता है-

माँ का दूध-माँ के शरीर में दूध बनने की क्रिया गर्भावस्था से ही शुरू हो जाती है। शिशु जन्म से 24 घण्टे बाद शिशु को माँ का दूध प्राप्त होता है। प्रारम्भ में 2-3 दिन तक गाढ़ा-पीला पदार्थ निकलता है। यह गाढ़ा पदार्थ बच्चे के पेट को साफ करता है, पाचन शक्ति बढ़ाता है। यह पदार्थ प्रोटीन से युक्त होता है। 2-3 दिन बाद दूध आना प्रारम्भ हो जाता है जिसमें सभी पौष्टिक तत्व पाये जाते हैं; जैसे—प्रोटीन, चिकनाई, कार्बोज, कैल्शियम आदि। माँ का दूध बच्चे के लिए प्राकृतिक उपहार है। बच्चे का नाजुक पाचन संस्थान इसे आसानी से पचा लेता है। माँ का दूध पूर्णतया बैक्टीरिया रहित शुद्ध उचित तापक्रम पर प्राप्त होता है। प्रसव के बाद 2-3 दिन तक निकलने वाले गाढ़े पदार्थ (colostrum) के प्रयोग के बच्चे की पाचन संस्थान क्रियाशील हो जाती है, यह पदार्थ पाचन संस्थान को पाचन क्रिया के लिए तैयार करता है। माथ माँ के दूध के पौष्टिक तत्वों में भी परिवर्तन आता जाता है। प्रारम्भ में दूध पतला होता है ताकि बच्चा उसे आसानी धीरे-धीरे माँ का गाढ़ा दूध तथा अधिक पौष्टिक तत्वों से युक्त होता जाता है। माँ के पचा सके। दूध की पौष्टिकता माँ के भोजन पर निर्भर करती है। धात्रीवस्था में माँ को साधारण अवस्था की अपेक्षा 700-1000 कैलरी अधिक चाहिए। ताकि वह शिशु को पौष्टिक भोजन दे सके तथा स्वयं को भी स्वस्थ रख सके। माँ का दूध जहाँ सभी पौष्टिक तत्वों से युक्त होता है वहीं बच्चे को उचित तापक्रम तथा सफाई से प्राप्त होता है। जन्म के बाद 9 माह तक बच्चे को माँ का दूध अवश्य मिलना चाहिए। 

शिशु को स्तनपान कराना

प्रथम शिशु के समय यह अनुभव माता के लिए नया होता है। शिशु भी ठीक से दूध पीना नहीं जानता है। इसलिए डॉक्टर या अनुभवी महिला के निर्देशानुसार बालक को दूध पिलाना चाहिए। माँ को बैठकर बच्चे को गोद में लेकर उसके सिर को बाँह पर रखकर दूसरे हाथ की अँगुली तथा अँगूठे को स्तन के ऊपर तथा तीन अँगुलियों के स्तन को नीचे से सहारा देकर स्तन की निप्पल बच्चे के मुँह में देना चाहिए। बच्चे को लेटाकर दूध नहीं पिलाना चाहिए। किसी विशेष कारण होने पर भी लेटकर दूध पिलाना चाहिए।

नवजात शिशु की देखभाल के सम्बन्ध में विस्तारपूर्वक टिप्पड़ी

बच्चे को दूध पिलाने से पूर्व स्तनों को विशेषकर निप्पल को अच्छी तरह से साफ कर लेना चाहिए। स्तन निप्पल की गन्दगी से बच्चे को अपचन की शिकायत हो सकती है निप्पल दबे होने पर या उनमें घाव होने पर माँ का दूध पिलाने के लिए निप्पल शील्ड (Nipple Shield) का प्रयोग करना चाहिए ताकि बच्चा आसानी से दूध पी सके ।

डकार दिलाना

बच्चे को दोनों स्तनों से बारी-बारी दूध पिलाना चाहिए। यदि शिशु जन्म के बाद माँ बैठ सकने में असमर्थ हो तो 3-4 दिन तक बच्चे को लेटकर दूध पिलायें उसके बाद बैठकर दूध पिलायें दूध पिलाने के बाद बच्चे को सीधा कर कन्धे से लगाना चाहिए ताकि डकार आ जाये तथा अंदर की हवा निकल जाए।

बच्चे को कितने घण्टे बाद दूध दिया जाए इसके लिए पहले यह मत था कि दो बार दूध देने के समय के बीच में 3-4 घण्टे का अंतर होना चाहिए। किन्तु वर्तमान समय में डॉक्टर का मत है कि दूध देने के लिए समय का कड़ा नियम न हो। यदि बच्चा माँ के दूध पर पल रहा है तो समय की कड़ाई बिल्कुल नहीं होनी चाहिए। हाँ, यह जरूरी है कि हर आधा घण्टे बाद बच्चे को रोने पर दूध न दिया जाए। क्योंकि यदि बच्चा पूर्ण स्वस्थ है, उसकी पाचन संस्थान ठीक है और वह माँ का दूध ठीक से बराबर मात्रा में पी लेता है तो 3-4 घण्टे तक भूख नहीं लगती। पर यदि बच्चा कमजोर है दूध ठीक से पी नहीं पाता तो उसे जल्द ही भूख लग जाती है। यदि माँ यह महसूस करती है कि उसका दूध बच्चे को कम होता है, बच्चा भूखा रह जाता है तो उसे बोतल से ऊपर का दूध देना चाहिए।

यदि माँ के स्तन में दूध बच्चे की आवश्यकता से अधिक हो, तो स्तनों को दबाकर निकाल देना चाहिए। इसी प्रकार बच्चे को दूध पिलाने से पहले स्तन दबाकर थोड़ा दूध निकाल देना चाहिए। यदि माँ के स्तनों में दूध कम हो तो उसे भोजन पर ध्यान देना चाहिए। इसके लिए डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए। घरेलू इलाज में तले हुए मखानों का प्रयोग करने से दूध की मात्रा बढ़ती है।

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