निष्यदन सिद्धान्त क्या है ? मैकाले के इस सिद्धान्त का मूल्यांकन in Hindi

इस सिद्धान्त का प्रतिपादन सर्वप्रथम मैकाले ने किया था। इस सिद्धान्त का विकास इस अर्थ में हुआ है कि कुछ लोगों को अंग्रेजी में अच्छी शिक्षा दी जाये ताकि वे अन्नतः जन साधारण को भारतीय भाषाओं के माध्यम से शिक्षित कर सके।

प्राच्य पाश्चात्य शिक्षा विवाद के साथ-साथ इसी काल में जन शिक्षा एवं उच्च शिक्षा का संघर्ष भी सतत रूप से चला । भारत में शिक्षा के विस्तार के विषय में एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह भी था कि जनता को शिक्षित किया जाये अथवा किसी वर्ग विशेष को उच्च शिक्षित किया जाये । व्यापारियों की कम्पनी होने के कारण ईस्ट इण्डिया कम्पनी भारतीयों की शिक्षा पर कम-से-कम धन व्यय करना चाहती थी। 

लार्ड मैकाले जन साधारण को शिक्षा देने के पक्ष में नहीं था उसका विचार था कि उच्च वर्ग का निर्माण अति आवश्यक है जो शिक्षा पाने के बाद हमारे बीच दुभाषिए का कार्य कर सके। 1837 में उसने लिखा है “कि” वर्तमान समय में हमारा उद्देश्य निम्न वर्ग के लोगों को प्रत्यक्ष रूप से शिक्षा देना नहीं है, बल्कि हमारा उद्देश्य ऐसे वर्ग का निर्माण करना है जो अपने देशवासियों में उस शिक्षा का कुछ अंश वितरित कर सके जो हमने उसे दी है। “

इसलिए वह उच्च वर्ग के सम्पन्न लोगों का शिक्षा प्रदान करना चाहता था । उसने यह सिद्धान्त प्रतिपादित किया कि शिक्षा की व्यवस्था केवल उच्च वर्ग के व्यक्तियों के लिए की जाये, जहाँ से वह स्वतः ही धीरे-धीरे छनकर निम्न वर्ग तक पहुँच जायेगी । इस सिद्धान्त को अधोगामी निस्यन्दन सिद्धान्त अथवा निम्नवत् छन्नीकरण का सिद्धान्त (Down Word Filteration Theory) कहा जाता है। छनाई से तात्पर्य किसी द्रव का छन-छनकर नीचे जाने से है। शिक्षा के क्षेत्र में निस्यन्दन या छनाई से तात्पर्य समाज के उच्च वर्ग को दी गयी शिक्षा का कालान्तर में निम्न वर्ग तक पहुँचने से है । निस्यन्दन सिद्धान्त मानने वालों का मानना था कि समाज का निम्न वर्ग उच्च वर्ग के व्यवहार का अनुसरण करता है । अतः यदि समाज के उच्च वर्ग को अंग्रेजी साहित्य, विज्ञान तथा रीति-रिवाजों में शिक्षित कर दिया जाये तो कालान्तर में उसके आचरण तथा व्यवहार का अनुसरण करके निम्न वर्ग शिक्षा के प्रकाश से आलोकित हो जायेगा । बम्बई के गवर्नर काउंसिल के सदस्य फ्रांसिस वार्डन ने 1823 में इस सिद्धान्त का समर्थन करते हुए विचार व्यक्त किया कि, बहुत-से व्यक्तियों को थोड़ा-सा ज्ञान देने की अपेक्षा थोड़े से व्यक्तियों को बहुत-सा ज्ञान देना अधिक उत्तम तथा निरापद होगा। सन् 1830 में अपने एक परिपत्र में कम्पनी के संचालकों ने इस सिद्धान्त का यह कहते हुए समर्थन किया कि शिक्षा की प्रगति तभी सम्भव है जब उच्च वर्ग के उन लोगों को शिक्षा दी जाएँ जिनके पास अवकाश है और जिनका अपने देश के निवासियों पर प्रभाव है । ईसाई मिशनरियों ने भी इस सिद्धान्त का समर्थन यह कहते हुए किया कि यदि भारत के उच्च वर्ग के हिन्दुओं को अंग्रेजी शिक्षा देकर ईसाई धर्म का अनुयायी बना लिया जाये तब निम्नवर्ग के व्यक्ति उन उदाहरण से प्रभावित होकर स्वयं ही ईसाई धर्म अपना लेंगे ।

मैकाले के द्वारा इस सिद्धान्त को प्रतिपादित करने के निम्नलिखित कारण प्रती होते हैं-

1. कम्पनी के पास जनसाधारण की शिक्षा के लिए आवश्यक धन नहीं था। 

2. उच्च वर्ग को शिक्षित करके उन्हें जनसाधारण की शिक्षा का उत्तरदायित्व दिया ज सकता है 

3. ऐसे उच्च शिक्षित व्यक्तियों की आवश्यकता थी जिन्हें उच्च पदों पर आसीन करके शासन को सुदृढ़ बनाया जा सके ।

4. उच्च वर्ग को पाश्चात्य आचार-विचारों की शिक्षा देकर जनसाधारण को प्रभावित किया जा सके इस सिद्धान्त की व्याख्या करते हुए आर्थर पेहयू ने अपनी पुस्तक ‘एजूकेशन ऑफ इण्डिया’ में लिखा है, “जनसमूह में शिक्षा को ऊपर से नीचे को छन-छनकर पहुँचना है । बूँद-बूँद कर भारतीय जीवन के हिमालय से उपयोगी शिक्षा नीचे की ओर बहती हुई कुछ समय में चौड़ी तथा विशाल धारा में बदलकर शुष्क मैदानों में सिंचाई करे ।”

लार्ड मैकाले ने अपने विवरण- पत्र (1835 ई.) में लिखा था कि हमें इस समय ऐसे वर्ग का निर्माण करना चाहिए, जो हमारे आगे उन लाखों व्यक्तियों के मध्य जिन पर हम शासन करते है, दो भाषाओं का कार्य करे। हमें इसी वर्ग पर देश की भाषाओं को निश्चित करने का कार्य छोड़ देना चाहिए। अन्त में लार्ड ऑकलैण्ड ने इस सिद्धान्त को स्वीकृति प्रदान की और लिखा, “सरकार को समाज के उच्च वर्गों में उच्च शिक्षा का प्रसार करना चाहिए, जिनके पास अध्ययन हेतु अवकाश है और जिनकी संस्कृति जनता में छनकर पहुँचनी है । “

“Attempts of Government should be restricted to the extension of higher education to the upper classes who have be leisure for study and whose culture would filter down to the masses.” –Auckland’s Minute 1839 

लार्ड आकलैण्ड ने इस सिद्धान्त को सरकारी नीति के रूप में घोषित किया । इस घोषणा के समर्थन में उसने अग्रलिखित चार तर्क उपस्थित किये –

(1) सरकार को अपने साम्राज्य की नींव मजबूत बनाने के लिए ऐसे लोगों की आवश्यकता है, जो राजकीय पदों पर कार्य कर सकें। इसके लिए उच्च वर्ग ही सबसे अच्छा हैं।

(2) सरकार के पास इतने साधन नहीं है कि जनसाधारण की शिक्षा का भार अपने ऊपर ले सके ।

(3) उच्च वर्ग के लोगों को शिक्षित करके जनसाधारण की शिक्षा का उत्तरदायित्व उनको सौंपा जा सकता है ।

(4) उच्च वर्ग के लोगों को अंग्रेजी माध्यम से अंग्रेजी साहित्य तथा विद्वानों को शिक्षा देकर उनके रहन-सहन और विचारों को परिवर्तित किया जा सकता है और इस प्रकार निम्न वर्ग के लोगों को प्रभावित किया जा सकता है ।

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