पवन किसे कहते हैं ? पवन के प्रकारों का वर्णन

 पवनों को मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित किया जा सकता है 

(1) सनातनी या स्थायी पवनें, 

(2) अस्थायी या स्थानीय पवनें।

(1) सनातनी या स्थायी पवनें 

ये पवनें सदैव एक ही क्रम में वर्ष निश्चित दिशा की ओर चलती रहती हैं। यद्यपि इनका वितरण पूरे ग्लोब पर होता है तथा इनकी उत्पत्ति समस्त ग्लोब के तापक्रम तथा पृथ्वी के घूर्णन से उत्पन्न उच्च त निम्न वायुदाब से सम्बन्धित है अतः इन्हें ग्रहीय पवनें भी कहा जाता है। 

(अ) अयनवृत्तीय प्रदेशों की पवनें (Wind) – प्रदेशों में सामान्य रूप से 30° उत्तर से 30° दक्षिण अक्षाशा वाले भाग का सम्मिलित किया जाता है। समस्त अयनवृत्तीय भाग में मौसम सम्बन्धी पवनें समान होती हैं तथा भूमध्य रेखा के समीप डोलड्रम या शान्त पेटी होती है। आधुनिक खोजों से ज्ञात हुआ है कि अयनवृत्तीय पेटी में पहले के सभी गुण नहीं मिलते। उनमें कुछ परिवर्तन मिला है। व्यापारिक पवनें उष्ण कटिबन्धीय सागरों के पूर्वी भाग में अधिक चला करती है।

(ब) डोलड्रम या शान्त पेटी (Doldrum) — इसका विस्तार भूमध्य रेखा के दोनों ओर 5° उत्तर व दक्षिण तक पाया जाता है। अधिक गर्मी के फलस्वरूप वायु अधिक उष्ण होकर ऊपर को फैलती है। वायु का प्रवाह भूपृष्ठ से ऊपर आकाश की दिशा में होता है। यहाँ अधिकांश समय पवन शान्त रहती है इसलिए इसे शांत पेटी अथवा डोलड्रम कहते हैं। वायु के शान्त होने के कारण पवन के चलने की दिशा में अनिश्चितता पायी जाती है किन्तु वास्तव में शांत प्रदेश सम्पूर्ण पृथ्वी पर एकसमान पेटी में नहीं फैला हुआ है। इन का विस्तार भिन्न ऋतुओं में परिवर्तित होता रहता है। विषुवत् रेखा के निकट इसके तीन उपक्षेत्र हैं-

मला हुआ है इन का विस्तार | मन्न ऋतुओं में परतत होता रहता है। विषुवत् रेखा के निकट इसके तीन उपक्षेत्र हैं-

(i) हिन्द प्रशान्त डोलड्रम ।

(ii) भूमध्य रेखा के निकट अफ्रीका के पश्चिमी किनारे पर। 

(iii) भूमध्य रेखीय मध्य अमरीका के पश्चिमी किनारे पर।

(स) व्यापारिक पवनें (Trade Winds)— दोनों गोलाद्धों में आयनवृत्तीय उच्च वायु दाब से विषुवत्रेखीय निम्न वायुदाब की ओर चलने वाली पवनों को व्यापारिक पवनें या सन्मार्गी हवाएँ कहते हैं। उत्तरी गोलार्द्ध ने इनकी दिशा उत्तर-पूर्व में उत्तर-पश्चिम तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में दक्षिण-पूर्व में उत्तर पश्चिम होती है। नियमित दिशा के कारण प्राचीनकाल में व्यापारियों को पालयुक्त जलयानों के संचालन में पर्याप्त सुविधा मिलने के कारण उनका नाम व्यापारिक पवनें रख दिया गया था। जब ये पवनें चलती हैं तो फेरल के नियमानुसार उत्तरी गोलार्द्ध में दाईं ओर दक्षिणी गोलार्द्ध में बायीं ओर मुड़ जाती हैं। उपोषण कटिबंध में अधिक दाब के कारण पवनें धरातल पर उतरती हैं। नीचे उतरने के कारण ये पवनें शुष्क हो जाती हैं और प्रति चक्रवातीय स्थिति उत्पन्न हो जाती हैं।

(द) पछुआ पवनें (Westerlies)— अयनवृत्तीय उच्च वायुदाब की पेटी से ध्रुववृत्तीय निम्न वायुदाब की पेटी की ओर चलने वाली हवाओं को पछुआ पवनें कहते हैं। उत्तरी तथा दक्षिणी गोलार्द्ध से ये हवाएँ 35° से 40° अक्षांशों से 60° से 65° अक्षांशों तक चलती हैं। इनकी दिशा उत्तरी गोलार्द्ध में दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व की ओर होती है। सन्मार्गी पवनों की अपेक्षा पछुआ पवनों का प्रवाह क्षेत्र विस्तृत होता है। इन हवाओं को ध्रुवीय सीमा में परिवर्तन होता रहता है। जहाँ पर ये गर्म तथा आर्द्र पछुआ हवाओं से आने वाली ठण्डी हवाओं से मिलती हैं। वहाँ वाताग्र बन जाते हैं जिन्हें शीतोष्ण वाताग्र कहते हैं इन वाताग्रों से ही चक्रवात तथा प्रति चक्रवात की उत्पत्ति होती है जिससे मौसम बड़ा अनियमित हो जाता है। उत्तरी गोलार्द्ध में स्थल भाग की अधिकता के कारण पवन व्यवस्था बड़ी विचित्र हो जाती है। जबकि दक्षिणी गोलार्द्ध में जल भाग अधिक होने के कारण 40°-60° अक्षांशों में यह पवनें बिना किसी रुकावट के काफी दूर तक चली जाती हैं। इन अक्षाशों में फैले विशाल समुद्र पर पवने गीष्म और शीतकाल में समान रूप से प्रचण्ड गति से चलती हैं। 40° अक्षाशों में इस प्रचण्ड गति के कारण इन्हें गरजते चालीस तथा 50° अक्षाशों में इसे भयंकर पचास तथा 60° अक्षाशों पर चीखता साठा कहा जाता है।

(य) ध्रुवीय पवनें (Polar Winds)— ध्रुवीय पवनें वे हैं जो ध्रुवीय उच्च वायुदाब से उपध्रुवीय निम्न वायुदाब की ओर चलती हैं। उत्तरी गोलार्द्ध में इनकी दिशा उत्तर-पूर्व तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में दक्षिण-पूर्व होती है। ग्रीष्मकाल में वायुदाब पेटियों के खिसकाव के कारण इनका क्षेत्र संकुचित हो जाता है। परन्तु शीतकाल में इनका क्षेत्र विस्तृत हो जाता है। ध्रुवीय पवनें प्रायः ध्रुवों के 70° या 80° अक्षांश तक चला करती हैं। ध्रुवों पर अधिक शीत पड़ने के कारण हर समय उच्चदाब का केन्द्र बना रहता है। ये पवनें पूर्व की ओर चलती हैं। उत्तरी गोलार्द्ध में इन्हें नॉर इस्टर्स (Nor Easters) कहते हैं। ध्रुवों में भीतरी प्रदेश जहाँ उच्च वायुदाब के कारण पवनें आकार जमा होती हैं। तूफानों से प्रायः रहित होती हैं। जब कभी शीतोष्ण कटिबंध की पवनों का सम्पर्क ध्रुवीय पवनों से होता है, तो चक्रवात तथा प्रतिचक्रवात की उत्पत्ति होती हैं।

(2) स्थानीय पवनें

 धरातल पर कुछ ऐसी पवनें चलती हैं जो सदैव एक ही दिशा में ऐसी पवनें चलती हैं जो सदैव एक ही दिशा में नहीं चलती वरन् समय और ऋतु के अनुसार इसकी दिशा बदलती रहती है इन्हें सामयिक या स्थानीय पवनें हैं।

 मानसूनी पवनें (Monsoon Winds )-  मानसून शब्द मूल रूप से अरबी भाषा के ‘मौसिम’ शब्द से बना है। जिसका तात्पर्य मौसम से होता है। इसका प्रयोग सबसे पहले अरब सागर पर बहने वाली पवनों के लिए किया गया था जिसकी दिशा छः माह उत्तर पूर्व से दक्षिण-पश्चिम और शेष छः माह दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व रहती है। इन हवाओं का चलने का कारण धरातल पर जल और स्थल का पाया जाना है। तापमान की भिन्नता से इनके वायुदाब में भी भिन्नता पायी जाती है जिससे पवनों को गति मिलती है और मानसून पवनें चलती हैं लेकिन आधुनिक विचारधारा के अनुसार केवल यही तथ्य मान्य नहीं है। फ्लान नामक विद्वान ने गतिक उत्पत्ति (Dynamic Origin) सिद्धान्त पर आधारित तथ्यों से बताया गया है कि मानसून पवनों की उत्पत्ति मात्र वायुदाब तथा वायु की पेटियों के खिसकाव के कारण होती है। 

Leave a Comment