पृथ्वी और आकाश का संक्षिप्त विवरण-Prithvi aur Aakash Ka Sankshipt Bitrad in Hindi

पृथ्वी अपनी उत्पत्ति के समय सम्भवत: अत्यधिक गर्म, लचीली एवं आग जैसे रही होगी।धीरे-धीरे करोड़ों वर्षों में इसके ठण्डा एवं (अथवा) संगठित होने मवाथ-साथ इसको ऊपरो परत ठोस बनती गई। इसी ठोस परत को पृथ्वी का धरातल हैं। प्रारम्भ में लगभग 300 करोड़ पूर्व तक अर्थात् पृथ्वी के आधे से अधिक लम्बे जीवनकाल तक औधिक उष्णता या अन्य कारणों से धरातल पर जल एवं सागरों का अभाव रहा। Prithvi aur Aakash Ka Sankshipt Bitrad in Hindi  पृथ्वीं अति उष्ण, शुष्क, किसी भी प्रकार के जल, वनस्पति या प्राणी रहित अजैव स्थिति में रही। आज से ।50 से 200 करोड़ वर्ष पूर्व पृथ्वी के धरातल के ठण्डा होने से वायुमण्डल अनुकूल बनने, वाष्पीकरण, घनीभवन एवं वर्षा की क्रिया पूरी होने के साथ-साथ महासागरो का निर्माण हुआ। प्रारम्भ में क्या महासागर इतने ही ठण्डे, खारे या ऐसी ही स्थिति में थे ? यह एक विवाद का विषय है। इस पर विद्वान एकमत भी नहीं 6 U) हैं। धीरे-धीरे सागर स्थायी होते गये, उनका खारीपन आज से 50 करोड़ वर्ष पूर्व तक आधुनिक स्थिति में पहुँच गया। यही काल अजैव पृथ्वी से जैव पृथ्वी के विकास की गुरुआत का काल माना जाता है। आज से 50-60 करोड़ वर्ष पूर्व महासागरों एवं वायुमण्डल में अवश्य ऐसी अनुकूल गैस, वाष्प, खनिज लवण, जैव, रसायनों आदि की है।

पृथ्वी और आकाश का संक्षिप्त विवरण-Prithvi aur Aakash Ka Sankshipt Bitrad in Hindi

तभी महासागरों में जीवों के विकास की प्रथम कड़ी अमीबा के नाम से विकसित हुई। इस एककोशीय जीव में जो कि यद्यपि बिना हड्डी, माँस, खून या अन्य विकसित तन्त्र का था, फिर भी उसमें अपने जैसे या समरूपी एककोष्ठीय जीवों की संख्या में निरन्तर बढ़ोत्तरी की क्षमता रही। सागर के किस भाग में या किन अक्षांशों में ऐसा सब कुछ चमत्कार प्रारम्भ हुआ, यह वर्तमान में भी मात्र शोध का ही विषय है। धीरे-धीरे इसी एककोशीय जीव के पश्चात् घोंघे व प्राथमिक रचना वाले  जीवों का विकास तथा पृथ्वी तल पर आर्द्र व उष्ण भागों में आज से भिन्न प्रकार की वनस्पति का विकास प्रारम्भ हुआ। धीरे-धीरे सागर में मछली (मत्स्यावतार) एवं भूमि पर वनस्पति च) (बिना पत्ती व फूलों के वृक्ष व घास) विकसित हुई। अत: सभी प्रकार के प्राणियों के विकास की शुरुआत समुद्र से ही हुई। प्राचीन भारतीय परम्परा भी जीवों के विकास को मत्स्यावतार से नृसिंहावतार तक कड़ीबद्ध ले जाती है। इसे मात्र संयोग नहीं माना जा सकता है। धीरे-धीरे जल-थल पर रहने वाले कछुआ, मगर, आदि विकसित हुए। बाद मैं छोटे पशु व पक्षी बनते गये प्राथमिक पेड़ों से पौधे पक्षियों फूल विकास हुआ।

सौर परिवार (सौरमण्डल)

सूर्य के परिवार को सौरमण्डल कहते हैं। इसमें सूर्य एक तारा है जो प्रका ऊष्मा प्रदान करता है। सूर्य से ही निकले हुए आठ ग्रह है, जिनके नाम-बुध पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति, शनि, अरुण और वरुण हैं। ये सभी ग्रह सूर्य के चारों अण्डाकार मार्ग द्वारा चक्कर लगाते हैं। इन ग्रहों से टूटे हुए पिण्डों को उपग्रह कहते हैं। ये सभी अपने-अपने ग्रहों के चारों ओर चक्कर लगाते हैं और सूर्य से प्रकाशित होते हैं। सूर्य सौर परिवार का जन्मदाता है। इसका व्यास 13.93.000 किलोमीटर है और पृथ्वों में 109 गुना बड़ा है। इसका भार 2.19 × 1027 टन है। इसके तल का तापमान 6000 है। यह पृथ्वी से 15 करोड़ किमी. दूर है। सूर्य के प्रकाश को पृथ्वी तक आने में लगभ 8 मिनट लगते हैं। सूर्य के काले धब्बे 1500° से. से कम गर्म (ठण्डे) क्षेत्र हैं। अब इन धब्बों की संख्या बढ़ती जा रही है। सौरमण्डल के ग्रह तथा उपग्रह निम्नलिखित प्रकार है- सौरमण्डल का सबसे बड़ा ग्रह बृहस्पति और सबसे छोटा ग्रह बुध है। सर्वाधिक उपग्रह बृहस्पति के 64 हैं। बुध सूर्य के सबसे निकट दूरी पर स्थित ग्रह है वरुण सर्वाधिक दूरी पर स्थित ग्रह है। सूर्य की परिक्रमा बुध 88 दिन में और कार 164.8 वर्ष में पूरी करता है। अपनी धुरी पर घूमने में बृहस्पति 9 घण्टा, 50 मि. और 30 सेकण्ड का समय लेता है। पृथ्वी अपनी धुरी पर पश्चिम से पूर्व को घूमती हुई 23 घण्ट 56 मिनट और 4 सेकण्ड (24 घण्टे में एक पूरा चक्कर करती है। इस गति को पृष्ठों का घूर्णन या परिक्रमण (Rotation) कहते हैं। घूर्णन के साथ-साथ पृथ्वी अपने अण्डाकार 90 से 9 मार्ग पर सूर्य का एक चक्कर (Revolution) 365.26 दिन में पूरा करती है। इस गति को आकार परिभ्रमण कहते हैं। पृथ्वी की परिक्रमण गति से दिन व सत तथा परिभ्रमण गति से ऋतु परिवर्तन होता है।

सौरमण्डल के ग्रह

1.बुध (Mercury) – यह सूर्य का सबसे निकटतम ग्रह है। इसका व्यास 4878 किमी. और सूर्य से दूरी 5.7 करोड़ किमी. है। यह 88 दिन सूर्य की प्रदक्षिणा कर लेता है। बुध अपने दीर्घवृत्तीय कक्ष में 1,76,000 किमी. प्रतिघण्टे की गति से घूमता है। यह गति इसे सूर्य की गुरुत्वाकर्षण शक्ति की पकड़ से सुरक्षित रखती है। बुध पर वायुमण्डल नहीं है। यहाँ दिन अति गर्म और रातें बर्फीली होती हैं। बुध का एकदिन पृथ्वी के 90 दिनों के बराबर अवधि का और इतने ही समय की एक रात होती है। परिमाण में यह पृथ्वी का 18वाँ भाग है तथा इसका गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी का 3/8 भाग है। इसका द्रव्यमान पृथ्वी का 5.5% है। बुध ग्रह पर जीवन सम्भव नहीं है क्योंकि यह अत्यधिक गर्म है।

2.शुक्र (Venus) – बुध के बाद यह सूर्य का निकटतम ग्रह है और लगभग पृथ्वी के बराबर आकार तथा भार का है। इसका व्यास 12,102 किमी और सूर्य से दूरी 10.82 करोड़ किमी है। यह सूर्य की प्रदक्षिणा 225 दिन में पूरी करता है। शुक्र गर्म और तपता हुआ ग्रह है तथा इसके चारों ओर सल्फ्यूरिक एसिड के जमे हुए बादल हैं। खोजों और रडार मैपिंग से इसके बादलों को भेद करने से पता चला है कि शुक्र की सतह चट्टानों और की है। यह पृथ्वी के अति निकट है और सूर्य व चन्द्रमा को छोड़कर सबसे चमकीला दिखाई पड़ता है। चन्द्रमा की भाँति इसकी भी कलाएँ हैं। प्रातः पूर्व में और सायं पश्चिम में दिखाई पड़ने के कारण इसे भोर का तारा (Morning Star) और सांझ का तारा (Evening Star) भी कहते हैं। शुक्र के वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड 90 से 95% होती है तथा थोड़ी मात्रा में नाइट्रोजन, जल वाष्प और अन्य तत्व होते हैं। आकार और द्रव्यमान में पृथ्वी से थोड़ा छोटा होने के कारण कुछ खगोलशास्त्री इसे ‘पृथ्वी की बहिन’ भी कहते हैं। शुक्र का वायुमण्डलीय दाब पृथ्वी से 100 गुना है। शुक्र ग्रह पर जीवन सम्भव नहीं है क्योंकि ये अत्यधिक गर्म ग्रह है।

3.पृथ्वी (Earth) – पृथ्वी शुक्र व मंगल के मध्य स्थित ग्रह है। यहाँ मध्य तापमान ऑक्सीजन और प्रचुर मात्रा में जल की उपस्थिति के कारण पृथ्वी सौरमण्डल का अकेला ग्रह है जहाँ जीवन है। इसका व्यास 12,756 किमी और सूर्य से औसत दूरी 14.96 करोड़ किमी है। यह सूर्य की प्रदक्षिणा 365 दिन में पूरी करता है। इसके ऊपर वायुमण्डल का आवरण है। पृथ्वी का एकमात्र उपग्रह चन्द्रमा है।

4.मंगल (Mars) – यह सूर्य से चौथा ग्रह है। वायकिंग की खोज से ज्ञात हुआ है कि यहाँ जीवन की कोई सम्भावना नहीं है। मंगल की बंजर भूमि का रंग गुलाबी है, अतः इसे लाल ग्रह (Red Planet) भी कहते हैं। यहाँ चट्टाने व शिलाखण्ड हैं। यहाँ का वायुमण्डल अत्यन्त विरल है, जिसमें कार्बन डाइऑक्साइड पायी जाती है एवं कुछ मात्रा में जलवाष्प अमोनिया एवं मीथेन भी है। मंगल ग्रह में पृथ्वी के समान दो ध्रुव (Poles) हैं तथा इसका कक्षा तल पृथ्वी से 25° के कोण पर झुका है जिससे यहाँ पृथ्वी के समान ऋतु परिवर्तन होता है। मंगल का सबसे ऊँचा पर्वत निक्स ओलम्पिया (Nix Olympia) है जो एवरेस्ट से तीन गुना ऊँचा है । मगल के दो उपग्रह हैं जिनके नाम फो डीमोस हैं।

5.बहस्पति (Jupiter)- यह सूर्य से पचिवों ग्रह हैं और सौरमण्डल के ग्रहों में स बड़ा है। इसका व्यास 1,38,08। किमी और सूर्य से औसत दूरी 77.83 करोट है। यह सूर्य की प्रदक्षिणा में 11.9 वर्ष लगाता है। बृहस्पति का द्रव्यमान सौरमण्डल सभी ग्रहों का 71% एवं आयतन डेढ़ गुना है।

6.शनि (Saturm)-सूर्य से छठा ग्रह शनि आकार में सौरमण्डल का दूसरा बड़ा गरह है। इसका व्यास 1,20,500 किरमी. है और यह सू्ये से 142.7 करोड़ किमी. दूर है। यह। सूर्य की परक्रमा 30 वर्ष में पूरी करता है। शनि की यह सबसे बड़ी विशेषता है कि इसके चतुद्रिक वलय हैं जो अनन्त छोटे-छोटे कणों से बने हैं। आकाश में यह ग्रह पीले तारे के समान दृष्टिगत होता है।

7.अरुण (Uranus)– यह सूर्य से सातवॉं और आकार में तृतीय ग्रह है। इस ग्रह की खोज सन् 1781 ई. में सर विलियम हारशल ने की। दूरदर्शी से देखने पर यह हरे रंग का दृष्टिगत होता है। इसकी सूर्य से दूरी 287 करोड़ किमी. और व्यास 51,400 किमी. है। यह ग्रह सूर्य की प्रदक्षिणा में 84 वर्ष का समय लगाता है।

8.वरुण (Neptune)-यह सूर्य से 8वाँ ग्रह है जिसकी खोज सन् 1846 ई. में जर्मन खगोलज्ञ जोहान गाले ने अरुण की कक्षा में विसंगति के फलस्वरूप की। इसका व्यास 48.600 किमी. है और यह सूर्य से 497.0 करोड़ किसी. दर है। यह सूर्य की प्रदक्षिणा 164.8 वर्षों में पूरी करता है और अपनी ध्री पर 16 घण्टे में पूरा चक्कर लगाता है यह ग्रह हल्का पीला दिखाई देता है।

आकाशीय पिण्ड एवं तारामण्डल

आकाश गंगा या मंदाकिनी (Galaxy)—ब्रह्माण्ड में खरबों तारे हैं जो बड़े पेड समूहों में पाये जाते हैं। तारों के ऐसे किसी समूह को आकाशगंगा या मंदाकिनी कहते हैं। ‘तारामण्डल (Constellation)—कुछ तारे सुन्दर आकृतियों के रूप में व्यवस्थित होते हैं। इन आकृतियों को तारामण्डल कहते हैं। तारों का निर्माण हाइड्रोजन तथा हीलियम गैसों के संघनन से हुआ है।

आकाश गंगा के तारामण्डलों के नाम-

(i) वृश्चिक,

(ii) ओरियोन,

(iii) सप्तर्षि,

(iv) कृत्तिका ।

(i) वृश्चिक (Scorpius)—आकाश की दक्षिण-पश्चिम दिशा में यह ग्रीष्मकाल में दिखाई देता है।

(ii) व्याघ्र (Orion)—यह आकाश के उत्तरी भाग में शीतकाल में दिखाई देता है। 

(iii) सप्तर्षि (Ursa Major or Great Bear)—यह उत्तरी आकाश में शीतकाल में सितम्बर माह में दिखाई देता है।

(iv) ध्रुवतारा (Polestar) – यह आकाश में तारों के स्थिर घूर्णन अक्ष पर सदैव दिखाई देता है । यह घूर्णन अक्ष पर स्थित होने के कारण गतिहीन होता है । शेष सभी तारे पृथ्वी -कुछ आकाशीय पिण्ड इस प्रकार होते हैं जिनमें क्री गति के दिशा के अनुरूप पूर्व से पश्चिम की ओर गति करते दिखाई देते हैं ।

(a).धूमकेतु या पुच्छल तारा (Comet)- कुछ आकाशीय पिण्ड इस प्रकार होते हैं जिनमें  सूर्य से दूरी की और गति करती हुई एक दीप्त धारीधार पूँछ होती है । इन्हें धूमकेतु या पुच्छल तारा कहते हैं । धूमकेतु आकाश में कभी-कभी दिखाई देते हैं । प्रसिद्ध धूमकेतु का नाम हेली है ।

(b).लाल दानव चरण (Red Giant Phase) – जब तारे के आन्तरिक भाग में संलयन की क्रिया होती है तब उसमें उपस्थित हाइड्रोजन संलयित होकर हीलियम मैं बदल जाती है। अब इसके क्रोड में केवल हीलियम शेष रहती है। संलयन की ब्रिया रुक जाती है । बाह्यय आवरण में सलयन की क्रिया होती रहती हैं। आावरण का आकार बढ़ता जाता है। तारे की सतह का क्षेत्रफल बढ़ता जाता है इससे विकरित ऊर्जा की तीव्रता घटती जाती है। इस अवस्था में इसका वर्ण (रंग) बदल कर लाल दिखाई देने लगता है। इस अवस्था को “लाल दानव चरण” कहते हैं। 

(c).श्वेत वामन तारे (White Dwarf)- जब तारे का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान के बराबर होता है तब लाल दानव चरण में तारे के अन्दर हीलियम गैस संलयन की प्रक्रिया द्वारा ऊर्जा विमोचित करती है तथा उच्च द्रव्यमान वाले नाभिक में बदल जाती है। इस प्रक्रिया में अपार ऊर्जा विमोचित होने से तारा श्वेत वामन के रूप में दीप्त होता है। इस अवस्था को श्वेत वामन तारा कहते हैं। जब सम्पूर्ण हीलियम उच्न द्रव्यमान वाले नाभिकों में बदल जाती है तब | श्वेत वामन तारा घने द्रव्य के टुकड़े के रूप में लुप्त हो जाता है।

(d).अधिनव तारा (Supernova) – जब लाल दानव अवस्था में तारे का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान से अधिक होता है तब तारे का अन्त अत्यन्त रोचक एवं विस्मयकारी होता है। सिकुड़ने के दौरान उत्पन्न हुई ऊर्जा बाह्य कवच को विस्फोट के साथ नष्ट कर देती है। अत्यधिक मात्रा में ऊर्जा मुक्त होती है । इस विस्फोट के साथ अत्यन्त दीप्त चमक उत्पन्न होती है। आवरण का यह विस्फोट इतना शक्तिशाली हो सकता है कि इससे एक सेकण्ड में उतनी ही ऊर्जा विमोचित हो सकती है जितनी सूर्य लगभग एक सौ वर्ष में करता है। इसके कारण आकाश बहुत दिनों तक जगमगा उठता है। ऐसे विस्फोटक तारे को अधिनव तारा या सुपरनोवा कहते हैं।

(e).न्यूट्रॉन तारा (Nutron Star) – सुपरनोवा विज़ोट के पास्टा केव क्लॉट बचा रह जा। यह क्रोड निरंतर सिकुड़्ता चाला जाबा है। विशाल गुरत्वर्तण बल क्रॉड की संपेडित कर उसके पदांत का औनांत्व असीमित परिमाण में बढा देता है। अतिधिक संधिधिधि का यह पिण्ड न्यूट्रॉन तारा कहलाता है। Prithvi aur Aakash Ka Sankshipt Bitrad in Hindi

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