पृथ्वी और आकाश -The Earth and Space in Hindi

सौर-परिवार (Solar System) 

सूर्य, ग्रह, उपग्रह तथा अन्य खगोलीय पिण्ड जैसे- क्षुद्र ग्रह, उल्का पिण्ड एवं धूमकेतु इत्यादि को संयुक्त रूप से सौर मण्डल या सौर-परिवार कहा जाता है। सूर्य को सौर मण्डल का प्रधान कहा जाता है। ब्रह्माण्ड में वैसे तो कई सौरमण्डल हैं, लेकिन हमारा सौरमण्डल या सौर परिवार * (Solar System) सभी से अलग हैं, जिसका आकार एक तश्तरी जैसा है।

पृथ्वी और आकाश -The Earth and Space in Hindi

हमारे सौरमण्डल में सूर्य और वे सभी खगोलीय पिंड हैं जो सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाते है तथा एक दूसरे से गुरुत्वाकर्षण बल द्वारा सम्बन्धित रहते है।

सूर्य (Sun) 

सूर्य, सौरमण्डल का प्रधान है और यह एक तारा है। सूर्य का व्यास 13 लाख 92 हजार किलोमीटर है, जो पृथ्वी के व्यास का लगभग 110 गुना है। सूर्य पृथ्वी से 13 लाख गुना बड़ा है और पृथ्वी को सूर्यताप का 2 अरबवाँ भाग मिलता है। पृथ्वी से सूर्य की दूरी 14.9 लाख कि.मी. है।

पृथ्वी से दिखाई देने वाली सतह को प्रकाश मंडल कहते है। सूर्य की सतह का तापमान 6000 डिग्री सेल्सियस है। परिमंडल (Corona) सूर्य ग्रहण के समय दिखाई देने वाली ऊपरी सतह है। इसे सूर्य मुकुट भी कहते हैं। प्रकाश की गति लगभग 3 लाख किलोमीटर प्रति सेकेंड है। इतनी तीव्र गति से चलते हुए सूर्य का प्रकाश लगभग 8 मिनट में पृथ्वी पर पहुंच पाता है। सौरमण्डल के कुल द्रव्यमान का 99.85% भाग सूर्य में संचित है। सूर्य की संरचना का 75% भाग हाइड्रोजन तथा 25% हीलियम से बना है।

सूर्य से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण तथ्य

सूर्य से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण तथ्य निम्नलिखित है- 

(1) सूर्य, सौर मंडल में सबसे बड़ा पिण्ड है। सूर्य सौरमंडल के केन्द्र में स्थित एक तारा है, जिसके चारों तरफ पृथ्वी और सौरमंडल के अन्य अवयव घूमते हैं।

(2) सूर्य की उतपत्ति 4.6 बिलियन साल पहले हुआ। यह ज्यादातर हाइड्रोजन और हीलियम गैस से बना हुआ है। 

(3) सूर्य के भीतरी भाग का तापमान 14,999.726 डिग्री सेल्सियस और ऊपरी सतह का तापमान 5507 डिग्री सेलिसयस है।

(4) सूर्य का व्यास 1,392,684 किलोमीटर तथा द्रव्यमान लगभग 1.989×10″ 30 किलोग्राम है। 

(5) सूर्य के प्रकाश की गति 3 लाख किलोमीटर प्रति सेकेण्ड है। 

(6) सूर्य पृथ्वी से लगभग 100 गुना अधिक बड़ा ग्रह है और यह पृथ्वी से लगभग 333,400 गुना अधिक भारी है।

(7) हर सेकेण्ड सूर्य में 7 करोड़ टन हाइड्रोजन, 6 करोड़ 95 लाख टन हीलियम में बदलती है और बची 5 लाख टन हाइड्रोजन गामा किरणों में बदल जाती है। 

(8) सूर्य आकाशगंगा का एक चक्कर 225-250 मिलियन वर्ष में पूरा करता है।

(9) पृथ्वी पर हर साल अधिकतम 5 बार सूर्य ग्रहण लगता है। यह ग्रहण 7 मिनट 40 सेकेण्ड से लेकर 20 मिनट तक चल सकता है।

(10) यदि धरती से 17 प्रकाश वर्ष की दूरी के 50 सबसे ज्यादा चमकने वाले तारों से तुलना की जाए तो सूर्य चौथा सबसे ज्यादा चमकने वाला तारा है ।

चन्द्रमा (Moon)

चन्द्रमा वायुमण्डल विहीन पृथ्वी का एकमात्र उपग्रह है, जिसकी पृथ्वी से दूरी 3,84,365 कि.मी. है। यह सौरमण्डल का पाँचवां सबसे विशाल प्राकृतिक उपग्रह है। चन्द्रमा की सतह और उसकी आन्तरिक सतह का अध्ययन करने वाला विज्ञान सेलेनोलॉजी कहलाता है।

चन्द्रमा पृथ्वी की एक परिक्रमा 27 दिन से घण्टे में करता है। इतने ही समय में यह अपनी अक्ष पर भी घूर्णन करता है। यही कारण है कि हमें चन्द्रमा का सदैव एक भाग दिखाई पड़ता है। पन्द्रमा पर न पानी है और न वायु इसके भूल के मैदान को शान्तिसागर कहते है। यह चन्द्रमा का पिछला भाग है जो अन्धकारमय होता है।

चन्द्रमा से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण तथ्य चन्द्रमा से सम्बन्धित महत्वपूर्ण तथ्यों को निम्नयत बताया गया है-

(1) चन्द्रमा गोल नहीं है बल्कि यह अंडे के आकार का है।

(2) चन्द्रमा पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह है।

(3) चन्द्रमा 45 अरब साल पहले पृथ्वी और थीया (मार्स के आकार का तत्त्व) के बीच हुए भीषण टकराव के बाद बचे हुए अवशेषों के मलबे से बना था।

(4) सौर मंडल के 63 उपग्रहों में चाँद का आकार 54 नम्बर पर है।

(5) चंद्रमा की गुरुत्वाकर्षण शक्ति पृथ्वी से कम है। अगर आँकड़ों में बात की जाए तो चांद पर इंसान का वजन 16.59 कम होता है। यही कारण है कि चांद पर अंतरिक्ष यात्री ज्यादा उछल-कूद कर सकते हैं।

(6) चाँद का वजन लगभग 81,00,00,00,000 (81अरब) टन है। 

(7) चाँद 27 दिन, 7 घंटे 43 मिनट, 11.6 सेकण्ड में पृथ्वी का एक चक्कर पूरा करता है।

(8) चन्द्रमा पूर्व में उगता है और पश्चिम में छिपता है। 

(9) रॉकेट से चन्द्रमा तक जाने में 13 घंटे लगते हैं। इतनी दूर कार से जाने में करीब 130 दिन लगेंगे।

ग्रह (Planets)

ग्रह वे खगोलीय पिण्ड है, जो कि निम्न शर्तों को पूरा करते हैं- जो सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करता हो, उसमें पर्याप्त गुरुत्वाकर्षण बल हो, जिससे यह गोल स्वरूप ग्रहण कर सके। ग्रहों के भूमध्य रेखीय व्यास, अपने अक्ष पर परिक्रमण समय, सूर्य के चारों और परिक्रमण समय तथा सूर्य से दूरी के आधार पर सारणी को निम्नवत् प्रदर्शित किया गया है-

उपग्रह (Satellite) 

उपग्रह को अंग्रेजी भाषा में सेटेलाइट (Satellite) कहा जाता है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है- साथी या सहचर । उपग्रह अपने नाम को सार्थक करते है और साथ ही साथ सूर्य की भी परिक्रमा करते है।
दूसरे शब्दों में किसी ग्रह के चारों ओर परिक्रमा करने वाले पिण्ड को उस ग्रह का उपग्रह कहा जाता है, जैसे- चन्द्रमा, पृथ्वी का प्राकृतिक उपग्रह है जबकि INSAT-B, पृथ्वी का कृत्रिम उपग्रह है। उपग्रह की कक्षीय चाल उसकी कक्षीय त्रिज्या पर निर्भर करती है ।
कृत्रिम उपग्रह (Artificial Satellite) – कृत्रिम उपग्रह मानव निर्मित ऐसे उपकरण हैं, जो पृथ्वी की निश्चित कक्षा में परिक्रमा करते हैं। अपने संतुलन को बनाए रखने के लिए ये उपग्रह अपने अक्ष पर भी घूमते रहते हैं। कृत्रिम उपग्रह अंतरिक्ष में कुछ प्रमुख उद्देश्यों के लिए प्रक्षेपित किए जाते हैं जिनमें दूरसंचार, मौसम विज्ञान सम्बन्धी अध्ययन और अंतर्राष्ट्रीय जासूसी प्रमुख हैं। कृत्रिम उपग्रहों से सम्बन्धित प्रमुख तथ्य निम्नवत है–
(1) वर्ष 1957 में सर्वप्रथम रूस ने एक कृत्रिम उपग्रह ‘स्पुतनिक-1’ अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किया था। ‘स्पुतनिक-1’ के पश्चात हजारों कृत्रिम उपग्रह अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किए। गए।
(2) वर्ष 1975 तक 700 से भी अधिक कृत्रिम उपग्रह पृथ्वी की परिक्रमा कर रहे थे, किंतु आज ये संख्या बहुत ज्यादा हो चुकी है।
(3) भारत ने अपना पहला कृत्रिम उपग्रह 19 अप्रैल, 1975 को रूस से अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किया। भारत के इस कृत्रिम उपग्रह का नाम पाँचवीं शताब्दी के भारतीय खगोलशास्त्री एवं गणितज्ञ आर्यभट्ट के नाम पर ‘आर्यभट्ट रखा। 
(4) उपग्रह आर्यभट्ट का भार 3560 किलोग्राम है। यह 8 किलोमीटर प्रति सेकेण्ड की गति से पृथ्वी की परिक्रमा कर रहा है और 93.41 मिनट में एक परिक्रमा पूरी कर लेता है।
(5) आर्यभट्ट उपग्रह के 26 सिरे हैं, जिन पर 18,500 सौर सेल लगाए गए हैं। अपने प्रक्षेपण काल से लगभग छः महीने तक अंतरिक्ष में वैज्ञानिक प्रयोग एवं शोध करना इसका लक्ष्य था, किंतु कुछ खराबी आ जाने के कारण इसका प्रयोग अधिक समय तक नहीं किया जा सका।

क्षुद्र ग्रह (Asteroids) 

क्षुद्र ग्रह या अवांतर ग्रह पथरीले और धातुओं के ऐसे पिण्ड है जो सूर्य की परिक्रमा करते हैं लेकिन इतने लघु हैं कि इन्हें ग्रह नहीं कहा जा सकता। इन्हें लघु ग्रह या क्षुद्र ग्रह या ग्रहिका कहते हैं। हमारी सौर प्रणाली में लगभग 1,00,000 क्षुद्रग्रह हैं • लेकिन उनमें से अधिकतर इतने छोटे हैं कि उन्हें पृथ्वी से नहीं देखा जा सकता। प्रत्येक क्षुद्र ग्रह की अपनी कक्षा होती है, जिसमें ये सूर्य के आस-पास घूमते रहते हैं। इनमें से सबसे बड़ा क्षुद्र ग्रह है ‘सेरेस’ ।
खगोलवेत्ता पियाजी (Piazzi) ने इस क्षुद्र ग्रह को जनवरी 1801 में खोजा था।

तारा (Star)

ऐसे खगोलीय पिंड, जो लगातार प्रकाश उत्सर्जित करते हैं, तारे कहलाते हैं। सूर्य भी एक तारा है, अन्य तारे हमें बिन्दु के रूप में दिखाई देते हैं क्योंकि ये पृथ्वी से बहुत अधिक दूरी पर स्थित हैं। तारे दिन व रात दोनों ही समय आकाश में उपस्थित रहते हैं। दिन में सूर्य के प्रकाश के कारण ये हमें दिखाई नहीं देते हैं। ध्रुव तारा सदैव उत्तर दिशा में चमकता है। इसकी किरणें उत्तरी ध्रुव पर 90 डिग्री का कोण बनाती है।
तारा एक ऐसा खगोलीय पिंड है, जो स्वयं के प्रकाश से दीप्तिमान होता है। तारे में संलयन और विखंडन की प्रक्रिया. निरंतर चलती रहती है। फलस्वरूप तारे का अपना प्रकाश होता है। तारे मुख्य रूप से हाइड्रोजन और हीलियम गैस से बने होते हैं। एक समय के बाद तारे में संलयन और विखंडन की प्रक्रिया समाप्त हो जाती है। क्योंकि तारे की सम्पूर्ण हाइड्रोजन गैस हीलियम में परिवर्तित हो जाती है।

नवतारा(Nova)

नवतारा अथवा नोवा (Nova) उस तारे को कहते हैं जो एकाएक चमक उठता है और पुनः धीरे-धीरे अपनी पहले जैसी धूमिल अथवा अदृश्य दशा में पहुँच जाता है। ऐसे तारे को ‘अस्थायी तारा’ भी कहते हैं। नवतारे की चमक बड़ी तेजी से बढ़ती है, यहाँ तक कि दो तीन दिन में अथवा इससे भी कम समय में कई हजार गुना बढ़ जाती है, परंतु चमक के घटने में काफी समय लगता है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि नवतारे को आच्छादित करने वाली गैसें तारे के अन्दर होने वाले विस्फोट से उत्पन्न होती हैं।

ध्रुव तारा (Pole Star) 

आसमान में उत्तर की ओर देखने पर जो सबसे चमकता हुआ तारा नजर आता है, उसे ध्रुवतारा कहा जाता है। ध्रुव तारे की पृथ्वी से दूरी 390 प्रकाश वर्ष है। आकाश में उत्तर की ओर चमकता हुआ यह तारा हर किसी को आकर्षित कर लेता है। वैज्ञानिक – उसे ध्रुव तारा इसलिए कहते हैं, क्योंकि वह उत्तरी ध्रुव से हमेशा एक जगह चमकता हुआ नजर आता है, लेकिन धर्मग्रंथों में उसे बालक ध्रुव का तारा कहा गया है।
इसे अंग्रेजी में ‘पोल स्टार’ भी कहा जाता है। इस कारण समुद्र व रेगिस्तान में सफर करने वाले लोग दिशा के ज्ञान के लिए भी इस तारे का सहारा लेते हैं। आकार में बहुत बड़ा होने के कारण खगोलशास्त्री इसे अत्यंत रोशनी वाला महादानव तारा भी कहते हैं।

ग्रहण (Eclipse) 

जब किसी पिंड के परिप्रेक्ष्य (प्रेक्षक) किसी दूसरे पिंड के अवलोकन (देखने पर) में किसी अन्य तीसरे पिंड के कारण बाधा उत्पन्न होती है तो उस परिप्रेक्ष्य पिंड के सापेक्ष ऐसी घटना को ग्रहण होना कहते हैं।
ग्रहण के कई कारण हो सकते हैं। जैसे- जब दो पिंडों के बीच कोई दूसरा पिंड आ जाए या उस पिंड से आने वाला प्रकाश स्रोत बंद हो जाए।

सूर्य ग्रहण (Solar Eclipse) 

सूर्य ग्रहण (सूर्योपराग) तब होता है, जब सूर्य आंशिक अथवा पूर्ण रूप से चन्द्रमा द्वारा आवृत (व्यवधान / बाधा) हो जाए। इस प्रकार के ग्रहण के लिए चन्द्रमा का पृथ्वी और सूर्य के बीच आना आवश्यक है। इससे पृथ्वी पर रहने वाले लोगों को सूर्य का आवृत भाग नहीं दिखाई देता है।
अक्सर चन्द्रमा, सूर्य के सिर्फ कुछ हिस्से को ही ढकता है। यह स्थिति खण्ड-ग्रहण कहलाती है। पूर्ण ग्रहण के समय चन्द्रमा को सूर्य के सामने से गुजरने में दो घंटे लगते हैं । चन्द्रमा, सूर्य को पूरी तरह से ज्यादा से ज्यादा सात मिनट तक ढँकता है। इन कुछ क्षणों के लिए आसमान में अंधेरा हो जाता है, या यूँ कहें कि दिन में रात हो जाती है ।

आकाशगंगा (Galaxy) 

करोड़ों तारामण्डल मिलकर एक आकाशगंगा (गैलेक्सी) का निर्माण करते हैं। हमारा सौरमण्डल मन्दाकिनी आकाशगंगा में स्थित है। यह सर्पिलाकार है। इसमें रात्रि के समय आकाश में तारों के समूह की एक दूधिया पतली सी दिखाई देने वाली मेखला “मिल्की वे’ कहलाती है। लाखों आकाशगंगाएँ मिलकर ब्रह्माण्ड (Universe) का निर्माण करती हैं।
आकाशगंगा, मिल्की वे, क्षीरमार्ग या मन्दाकिनी गैलेक्सी को ही कहते हैं, जिसमें पृथ्वी और सौर मण्डल स्थित है। आकाशगंगा आकृति में एक सर्पिल (स्पाइरल) गैलेक्सी है, जिसका एक बड़ा केन्द्र है और उससे निकलती हुई कई वक्र भुजाएँ। हमारा सौर मण्डल इसकी शिकारी- हन्स भुजा (ओरायन – सिग्नस भुजा) पर स्थित है।
आकाशगंगा में 100 अरब से 400 अरब के बीच तारे हैं और अनुमान लगाया जाता है कि लगभग 50 अरब ग्रह होंगे, जिनमें से 50 करोड़ अपने तारों से जीवन-योग्य तापमान रखने की दूरी पर हैं। सन् 2011 में होने वाले एक सर्वेक्षण में यह सम्भावना पाई गई कि इस अनुमान से अधिक ग्रह हैं। इस अध्ययन के अनुसार आकाशगंगा में तारों की संख्या से दुगने ग्रह हो सकते हैं। हमारा सौरमण्डल आकाशगंगा के बाहरी हिस्से में स्थित है और आकाशगंगा के केन्द्र की परिक्रमा कर रहा है। इसे एक पूरी परिक्रमा करने में लगभग 22.5 से 25 करोड़ वर्ष लग जाते हैं।
सूर्य, चन्द्रमा और रात के समय आकाश में जगमगाते लाखो तारों को आकाशीय पिण्ड कहते है। निहारिका अत्याधिक प्रकाशमान आकाशीय पिण्ड है, जो गैस और धूल के कणों से मिलकर बना है। आकाशीय पिण्ड का अध्ययन जिस शास्त्रों में किया जाता है उसे खगोल शास्त्र कहते है।

धूमकेतु / पुच्छल तारा (Comet)

सौरमण्डल के छोर पर बहुत ही छोटे-छोटे अरबों पिण्ड विद्यमान हैं, जो धूमकेतु (Comet) या पुच्छल तारा कहलाते हैं। कमेट (Comet) शब्द, ग्रीक शब्द Kometes से बना है जिसका अर्थ होता है, हेयरी वन (Hairy one) अर्थात् बालों वाला। यह इसी तरह दिखते हैं इसलिए यह नाम पड़ा।
धूमकेतु या पुच्छल तारे (Comet), चट्टान (Rock), धूल (Dust) और जमी हुई गैसों (Gases) के बने होते हैं। सूर्य के समीप आने पर गर्मी के कारण जमी हुई गैसें और धूल के कण सूर्य से विपरीत दिशा में फैल जाते हैं और सूर्य की रोशनी परावर्तित होकर चमकने लगती है।

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