प्रयोजनवाद का अर्थ और परिभाषा-Prayojanwaad Ka Arth Aur Paribhasha in Hindi

प्रयोजनवाद का अर्थ (Meaning of Pragmatism) – Pragmatism का शाब्दिक अर्थ व्यावहारिकता है। सामान्य दृष्टि से यह कह सकते हैं कि प्रयोजनवाद विशेषता इस सिद्धान्त को निर्धारित करता है—सब मूल्यों, विचारों और निर्णयों का सत्य उनके व्यावहारिक परिणामों में पाया जाता है यदि उनके परिणाम सन्तोषजनक हैं तो वह सत्य हैं अथवा नहीं।

प्रयोजनवाद का अर्थ और परिभाषा-Prayojanwaad Ka Arth Aur Paribhasha in Hindi

प्रयोजनवाद की परिभाषा (Definition of Pragmatism )—प्रयोजनवाद की परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं-

(i) जेम्स के अनुसार – “प्रयोजनवाद मस्तिष्क का स्वभाव तथा मनोवृत्ति है। यह विचारों की प्रकृति एवं सत्य का भी सिद्धान्त है और अपने अन्तिम रूप में यह वास्तविकता का सिद्धान्त है । “

(ii) प्रैट के अनुसार-“प्रयोजनवाद हमें अर्थ का सिद्धान्त, सत्य का सिद्धान्त, ज्ञान का सिद्धान्त और वास्तविकता का सिद्धान्त देता है ।”” प्रैट ने प्रयोजनवाद में निम्नलिखित तथ्यों को सम्मिलित किया है–

(1) अर्थ का सिद्धान्त (Theory of Meaning),

(2) सत्य का सिद्धान्त (Theory of Truth),

(3) ज्ञान का सिद्धान्त (Theory of Knowledge),

(4) वास्तविकता का सिद्धान्त (Theory of Reality)।” 

(iii) हैण्डरसन के अनुसार – “प्रयोजनवाद के अनुसार यदि कोई बात अनुभव में कार्य करती है तो वह उसको सत्य बनाती है। किसी बात को अन्ततः सत्य नहीं कहा जा सकता है। सत्य परिणामों के अनुसार बदलता रहता है। केवल वही बात सत्य है जो विशेष परिस्थितियों में सत्य सिद्ध हो जाती है। परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं, इसलिए सत्य भी बदलता रहता है। “

(iv) रोजन के अनुसार-“प्रयोजनवाद के अनुसार सत्य को उसके व्यावहारिक परिणामों द्वारा जाना जा सकता है। इस प्रकार सत्य निरपेक्ष न होकर व्यक्तिगत या सामाजिक समस्या है।”

प्रयोजनवाद शिक्षा का उद्देश्य

प्रयोजनवाद शिक्षा के उद्देश्य प्रयोजनवाद के मुख्य समर्थक विलियम जेम्स (William James) तथा चार्ल्स सेण्डर्स पीयर्स (Charles Sanders Perice) हुए हैं। इन दार्शनिकों के अनुसार- शिक्षा उन क्रियाओं का समूह है जिनके द्वारा बालक अपने मूल्यों का निर्माण करता है।

शिक्षा के उद्देश्यों के विषय में जॉन ड्यूवी (John Dewey) लिखा है- “शिक्षा के उद्देश्य नहीं होते, उद्देश्य केवल व्यक्ति के होते हैं और व्यक्तियों के उद्देश्य भिन्न-भिन्न होते हैं, जैसे-जैसे बालकों में परिवर्तन होता है, उसी के साथ उद्देश्य भी बदल जाते हैं।”

उपरोक्त कथन के आधार पर उत्तम उद्देश्य की जॉन ड्यूवी ने निम्नलिखित विशेषताएँ बतायी हैं-

(1) ये छात्रों का सहयोग प्राप्त करते हैं।

(2) उद्देश्य छात्रों की आवश्यकता तथा क्रिया पर निर्भर करते हैं। 

(3) उद्देश्य विशिष्ट तथा तात्कालिक ही होते हैं। प्रयोजनवादियों के अनुसार शिक्षा के उद्देश्य निम्नलिखित प्रकार के होते हैं-

(1) पूर्व निश्चित उद्देश्यों का विरोध-प्रयोजनवाद आदर्शों तथा पूर्व निर्धारित मूल्यों में विश्वास नहीं करता है। चिरतन सत्य तो केवल उसके लिए एकमात्र कोरी कल्पना है। प्रयोजनवाद के अनुसार बालक स्वयं मूल्यों का निर्माता होता है। वह स्वयं जीवन के उद्देश्य निर्धारित करता है। उसके ऊपर मूल्य अथवा उद्देश्य नहीं थोपने चाहिए। इससे स्पष्ट है कि यह वाद पूर्व निश्चित उद्देश्यों का विरोध करता है अपनी आवश्यकतानुसार स्वयं ही उद्देश्यों को निर्मित करता है।

(2) नवीन मूल्यों का निर्धारण-प्रयोजनवादी अपनी आवश्यकतानुसार नवीन मूल्यों को निर्मित करते हैं क्योंकि यह पूर्व निर्धारित किसी सत्य तथा मूल्य पर विश्वास नहीं करते हैं। इस विषय में रॉस (Ross) ने लिखा है-

“प्रयोजनवाद का सामान्य उद्देश्य नवीन मूल्यों की रचना करना है जिसका प्रमुख कर्त्तव्य विद्यार्थी को ऐसे वातावरण में रखना है जिसमें रहकर नवीन मूल्यों का निर्माण कर सके। “

इसी विषय पर अपने विचार देते हुए जॉन ड्यूवी ने लिखा है “जो परिकल्पना व्यावहारिक रूप से कार्य करती है यह सत्य है, सत्य भाववाचक संज्ञा है, जिसका प्रयोग उन वास्तविक, पूर्व अनुमानित और वांछित तथ्यों के संकलन के लिए किया जाता है जिनकी अपने परिणामों द्वारा पुष्टि होती है।”

(3) मूल्य दर्शन प्रयोजनवाद (Pragmatism in Axiolody)— मूल्य दर्शन में प्रयोजनवादियों ने निम्नलिखित तथ्यों का विश्लेषण किया है-

(i) नैतिक मूल्य क्या है ? (What is Morality ? )– मानव एवं समाज के मध्य होने वाली आदान-प्रदान की प्रक्रिया के प्रतिफल है। सद् अथवा अच्छाई (Good) वह है जो सर्वोत्तम ढंग से अनिश्चितकालीन परिस्थितियों का समाधान प्रस्तुत करती है और यह जब ही सम्भव है कि एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से व्यवहार प्रक्रिया को स्वयं अपनाए ।

(ii) सुन्दर क्या है ? (What is Beauty ? )—सुन्दर वह वस्तु, विचार, पदार्थ को मानते हैं जिसे अनुभव के माध्यम से सुन्दर स्वीकार करते हैं। जॉन ड्यूवी ने लिखा है—– “जो कृति अपनी ओर आकृष्ट करती है और गहन रूप से अनुभूति करने के लिए तत्पर बना सकती है, वही सुन्दर है।”

(iii) ईश्वर क्या है ? (What is Good ?) प्रयोजनवादियों का मानना है कि कीजिए। ईश्वर एक ऐसी शक्ति है जो व्यक्ति के आदर्श तथा मूल्यों का वास्तविकता से सम्बन्ध कराती है। इसी को परिभाषित करते हुए जॉन ड्यूवी ने लिखा है- “ईश्वर आदर्श

तथा वास्तविकता के मध्य की कड़ी है।” 

(iv) गतिशील एवं लचीले मस्तिष्क का विकास-प्रयोजनवादी बालक की बालकों आवश्यकता, इच्छा तथा रुचियों को महत्व देता है। इसी सम्बन्ध में रास (Ross) लिखा है—“गतिशील और लचीले मस्तिष्क का विकास जो सभी परिस्थितियों में साधनपूर्ण एवं साहसपूर्ण हो तथा जिसमें अज्ञात भविष्य के लिए मूल्यों का निर्धारण करने की शक्ति हो ।’

(v) गतिशील निर्देशन — प्रयोजनवादियों के अनुसार शिक्षा का एक उद्देश्य छात्रों को गतिशील निर्देशन करना भी है। लेकिन गतिशील निर्देशन किस प्रकार कर सकें। इसलिए छात्र में इस प्रकार की क्षमता का विकास करना भी है जिससे वह अपनी आवश्यकता, इच्छा एवं रुचि के अनुसार स्वयं को निर्देशित करके अपना विकास कर सके।

(vi) सामाजिक कुशलता— प्रयोजनवादियों का मानना है कि शिक्षा के द्वारा बालक में समाज के आदर्श, मूल्यों, परम्पराओं, रीतियों आदि का ज्ञानार्जन कराकर उनका समाज व्यावहारिक रूप से प्रयोग कर सके जिससे बालक अपने आपको समायोजित कर लेता है। इसलिए शिक्षा का उद्देश्य बालक में ऐसी क्षमता को विकसित करना है कि बालक समाज में अपने आपको समायोजित कर ले।

(vii) छात्र का विकास- प्रयोजनवादियों ने स्वीकार किया है कि शिक्षा का उद्देश्य छात्रों का विकास करना है। इसमें छात्रों का अधिक-से-अधिक विकास किया जाए जिससे कि वे राष्ट्र की प्रत्येक समस्या के समाधान में पूर्ण योगदान दे सकें कभी-कभी यह भी देखने को मिलता है कि उसका विकास गलत दिशा में भी हो जाता है।

(viii) व्यावसायिक निर्देशन — बालक को शिक्षा के माध्यम से इस प्रकार की क्षमता का विकास करना है जिसके द्वारा वह अपनी आजीविका स्वयं प्राप्त कर सके, अपने पैरों पर खड़ा हो सके अर्थात् वह किसी दूसरे व्यक्ति पर निर्भर नहीं रहे। इस प्रकार कह सकते हैं कि शिक्षा का उद्देश्य बालक को इस प्रकार व्यावसायिक निर्देशन देना है।

(ix) नागरिक दक्षता-प्रयोजनवादी शिक्षा का उद्देश्य बालक में नागरिकता का विकास करना है। शिक्षा के माध्यम से बालक में इस प्रकार के गुणों का विकास किया जाना चाहिए जिससे बालक राष्ट्रीय समस्या पर विचार कर सके, अपने मतदान की उचित उपयोग कर सके, अवकाश का सदुपयोग कर सके।

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