प्राकृतिक शक्तियाँ एवं स्थलमण्डल – NATURAL POWERS AND LITHOSPHERE/ TERRESTRIAL IN HINDI

प्राकृतिक शक्तियों का मानव जीवन पर प्रभाव (IMPACT OF NATURAL POWERS ON HUMAN LIFE)

दिन-रात होने के कारण

हमारी पृथ्वी अपनी धुरी पर लगातार घूमती रहती है। और सूर्य का चक्कर लगाती है। पृथ्वी सूर्य का एक चक्कर पूरे 24 घण्टे में पूरा करती है और जब पृथ्वी यह यक्कर लगाती है तो पृथ्वी के जिस हिस्से पर सूर्य की किरण सीधे पड़ती है उस हिस्से पर दिन और जहाँ सूर्य की किरणें नहीं पहुँचती है उस हिस्से पर रात होती है

अतः रात व दिन होने का कारण है पृथ्वी का अपने अक्ष पर घूमना ।

प्राकृतिक शक्तियाँ एवं स्थलमण्डल - NATURAL POWERS AND LITHOSPHERE/ TERRESTRIAL IN HINDI

वनों से होने वाले लाभ निम्नलिखित हैं- 

(1) वनों से प्राकृतिक सौन्दर्य तथा सन्तुलन बना रहता है। 

(2) वनों से फूल व फल मिलते हैं।

(3) वनों के कारण भूक्षरण नहीं होता है। 

(4) वनों में ही वन्य जीव निवास करते हैं, जैसे- शेर, चीता, भालू आदि ।

चन्द्रमा की विशिष्ट गतियाँ (Specific Motions of Moon) 

पृथ्वी के समान चन्द्रमा की भी अपनी विशिष्ट गतियाँ होती हैं जिनका संक्षिप्त विवरण निम्नवत् है-

(1) घूर्णन-चन्द्रमा अपने अक्ष के चारों ओर लगभग 29 दिनों से कुछ अधिक समय में एक घूर्णन / परिभ्रमण पूर्ण करता है। इस अवधि को चन्द्रमास के नाम से भी जाना जाता है। कुल 12 चन्द्रमास होते हैं, इन 12 चन्द्रमासों का समूह ‘चन्द्रवर्ष’ कहलाता है।

चन्द्रदिवस – 24 घण्टे 50 मिनट का वह समय जिस अवधि में चन्द्रमा की सीध में पृथ्वी पर स्थित बिन्दु पुनः एक बार घूमकर चन्द्रमा के ठीक नीचे उस बिन्दु पर पहुँचता है, ‘चन्द्रदिवस’ कहलाता है।

(2) परिक्रमण – चन्द्रमा दीर्घवृत्ताकार पथ पर पृथ्वी के परितः चक्कर लगाता है। यह अवधि 27 दिन 7 घण्टे 43 मिनट की होती है। इसे नक्षत्रमाह’ के नाम से भी जाना जाता है। यह चन्द्रमा की परिक्रमण अवधि है। इस प्रकार चन्द्रमा की परिभ्रमण एवं परिक्रमण अवधि लगभग समान है। यही कारण है कि चन्द्रमा का केवल आधा भाग ही पृथ्वी से देखा जा सकता है।

(3) सूर्य के सापेक्षिक गति – पृथ्वी की परिक्रमा के साथ ही साथ, चन्द्रमा सूर्य के सापेक्ष भी गति करता है।

चन्द्रमा की कलाएँ (Phases of Moon) –  चन्द्रमा पर अन्य आकाशीय पिण्डों की भाँति अपना प्रकाश नहीं है। सूर्य का प्रकाश चन्द्रमा के धरातल से परिवर्तित होकर पृथ्वी से दिखाई पड़ता है जितना प्रकाश चन्द्रमा के धरातल से परावर्तित होता है, उतना ही भाग दिखाई पड़ता है। इसके परिणामस्वरूप ही सूर्य, पृथ्वी तथा चन्द्रमा की सापेक्षिक स्थितियों में परिवर्तन के कारण सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करने वाले चन्द्रमा के धरातल का क्षेत्रफल भी बदल जाता है। दूसरे शब्दों में गोल आकृति के कारण ही आधे भाग पर सूर्य का प्रकाश पड़ता है, शेष आधा भाग अंधकारमय रहता है। यही कारण है कि हम उसके केवल प्रकाशित भाग को ही घटता या बढ़ता हुआ देख सकते हैं। यह आकार कभी हँसिया के समान, कभी अर्द्धवृत्ताकार तो कभी पूर्णतः गोलाकार दिखाई देता है, यही चन्द्रमा की कलाएँ कहलाती हैं।

सूर्यग्रहण एवं चन्द्रग्रहण का महत्व (Importance of Solar Eclipse and Lunar Eclipse)

सूर्यग्रहण एवं चन्द्रग्रहण का अपना विशिष्ट महत्व है। इस घटना को प्राचीन काल से ही ऋषियों, विद्वानों एवं मनीषियों ने अपने अध्ययन का विषय बनाया। खगोलविदों एवं वैज्ञानिकों ने समय-समय पर इस परिघटना के रहस्यों, कारणों एवं उसके प्रभाव पर अपने विचार दिए हैं। भारतीय ज्योतिषशास्त्र इन घटनाओं से प्रत्यक्षतः सम्बन्ध स्थापित करता है। यद्यपि प्राचीन काल में ग्रहण से जुड़े मिथकों के कारण लोग इससे भयभीत हो जाते थे किन्तु आधुनिक समय में भी वैज्ञानिक ज्ञान बढ़ने के साथ-साथ इसके धार्मिक स्वरूप का भी महत्त्व बढ़ा है। इन विशेष तिथियों में जप-तप, दान, पुण्य, तीर्थ स्थानों पर स्नान इत्यादि की परम्पराएँ हैं।

ऐसे अवसरों पर मेलों में विभिन्न देशों प्रदेशों से लोग एकत्र होते हैं जिससे न केवल सामाजिक एवं सांस्कृतिक सम्पर्क में गतिशीलता आती है बल्कि राष्ट्रीय एकता की भावना में अभिवृद्धि होती है। सूर्यग्रहण तथा चन्द्रग्रहण की तिथियों में सागरीय औसत जलतल में भी परिवर्तन होता है जिसे ज्वार-भाटा कहते हैं। इन तिथियों में दीर्घ ज्वार की भी उत्पत्ति होती है जिसका अपना विशिष्ट महत्त्व होता है।

सूर्याभिताप

वायुमण्डल एवं पृथ्वी की ऊष्मा का मुख्य स्रोत सूर्य है। . सौर ऊर्जा को ही सूर्यातप कहते हैं। सूर्य से पृथ्वी के समस्त धरातल पर प्रति मिनट इतनी शक्ति प्राप्त होती है, जितनी मानव जाति द्वारा एक वर्ष में उपयोग में लाई जाती है। सूर्य से प्राप्त होने वाली इसी शक्ति को ही सूर्याभिताप कहा जाता है।

पृथ्वी के प्रमुख परिमण्डल(MAIN SPHERES OF EARTH)

स्थलमण्डल (Lithosphere / Terrestrial) 

पृथ्वी के धरातलीय भाग को स्थलमण्डल कहते हैं। यह विभिन्न प्रकार की चट्टानों से मिलकर बना होता है। पृथ्वी की ऊपरी सतह भूपर्पटी कहलाती है। भूपर्पटी पर उपस्थित मृदा विभिन्न प्रकार के जीवों के लिए पोषक तत्त्व प्रदान करती है। पृथ्वी की सतह को दो भागों में बाँटा जा सकता है। पहले भाग के अन्तर्गत बड़े-बड़े जलाशय एवं महासागर आते हैं एवं दूसरे भाग के अन्तर्गत स्थलीय भूभाग एवं महाद्वीप आते हैं। पृथ्वी के कुल 29% भाग पर ही स्थलमण्डल विद्यमान है और शेष 71% भाग पर जल विद्यमान है। स्थलमण्डल पर ही पर्वत, ज्वालामुखी, पठार, मैदान एवं विभिन्न प्रकार के खनिज तत्त्व, वनस्पति, विद्यमान हैं जिनके कारण जीवन सम्भव है। स्थलमण्डल पर ही सभी महाद्वीप एवं महासागर स्थित हैं।

वायुमण्डल (Atmosphere) 

पृथ्वी के चारों ओर हवा के विस्तृत भण्डार को वायुमण्डल कहते हैं। यह पृथ्वी पर सौर विकिरण की लघु तरंगो को आने देता है। यह सूर्य से निकलने वाली पराबैगनी किरणों को पृथ्वी पर आने से रोकता है जिससे पृथ्वी का औसत तापमान 15 डिग्री सेंटीग्रेड बना रहता है। वायुमण्डल पृथ्वी से लगभग 1600 किमी. तक विद्यमान है। वायुमण्डल पर लगभग 97% वायु धरातल के निकट होती है जैसे-जैसे वायुमण्डल की ऊँचाई बढ़ती जाती है वैसे-वैसे पृथ्वी से इसकी विचलनशीलता (विरलता) बढ़ती जाती है। वायुमण्डल में गैसीय आवरण पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण टिका रहता है। वायुमण्डल अनेक गैसों का मिश्रण है, इसमें सबसे अधिक मात्रा में नाइट्रोजन (N2 – 78%), उसके बाद आक्सीजन (O2 – 21%), आर्गन (Ar −0.93%), कार्बन डाई आक्साइड (Co2 – 0.03%) तत्पश्चात् अन्य गैसें अल्प मात्रा में पाई जाती हैं। इसके अलावा वायुमण्डल में जलवाष्प, धूल के कण आदि पाए जाते हैं। विभिन्न गैसों का लगभग 99% भाग 32 किलोमीटर तक ही सीमित है। वायुमण्डल के निचले भाग में जलवाष्प की मात्रा अधिक होती है जिससे पृथ्वी पर जलवाष्प एवं हिमपात होता है। वायुमण्डल की परतों को मुख्य रूप से पाँच भागों में वर्गीकृत किया गया है जो निम्नलिखित हैं-

1) क्षोभमण्डल

2) समतापमण्डल

3) आयन मण्डल

4) मध्य मण्डल

5) बाह्य मण्डल

पृथ्वी की आन्तरिक संरचना (INTERNAL STRUCTURE OF EARTH)

पृथ्वी के धरातल का स्वरूप पृथ्वी की आन्तरिक अवस्था और संरचना का परिणाम है, अतः पृथ्वी की आन्तरिक संरचना का विशेष स्थान है। वैज्ञानिकों में पृथ्वी की आन्तरिक रचना के बारे में मतभेद है। भूगर्भ में पाई जाने वाली परतों की मोटाई, घनत्व, द्रव्यमान आदि पर सहमति नहीं है। भौतिक तथा रासायनिक गुणों के आधार पर पृथ्वी की आन्तरिक संरचना को तीन परतों में पहचाना जा सकता है-

भूपर्पटी(Crust) 

पृथ्वी की बाहरी सतह भूपटल या भूपर्पटी कहलाती है। यह पर्व अन्य सभी पर्तों से पतली होती है। भूपटल की मोटाई, महाद्वीपीय क्षेत्र में लगभग 35 किलोमीटर तक और महासागरों के नीचे लगभग 5 किलोमीटर तक हो सकती है। यह पत पृथ्वी के सम्पूर्ण द्रव्यमान का करीब 0.5% हिस्सा रखती है। भूपटल मुख्यतः बेसाल्ट और ग्रेनाइट से बना होता है। यह पर्त आन्तरिक पतों की अपेक्षा अधिक ठंडी और कठोर होती है। भूपर्पटी का औसत घनत्व 2.75-2.90 तक है।

मेण्टल (Mantle)

यह पृथ्वी की सतह में भूपर्पटी के बाद लगभग 100 से 2900 कि.मी. नीचे तक विस्तृत है। यह पृथ्वी के आयतन का 16% होता है। इसके ऊपरी भाग में एक अर्द्धतरल परत होती है। जिसे दुर्बलता मण्डल कहा जाता है। इसी परत से मैग्मा धरातल से बाहर निकलता है। मेण्टल को दो भागों में विभाजित किया जाता है- ऊपरी मेण्टल एवं निचला मेण्टल ।

कोर (Core)

यह पृथ्वी की संरचना की सबसे भीतरी परत है। यह पृथ्वी की सतह के नीचे 2900 किमी. से लेकर 6400 किमी. तक विस्तृत है तथा पृथ्वी के घनफल का 83% निर्मित करता है। केन्द्रीय भाग अत्यन्त भारी पदार्थों से बना है जो उच्चतम सघनता में संघटित है। यह भाग निकिल और लौह धातुओं से बना है। भारी मिश्रित धातुओं एवं सिलिका से बने एक संक्रमण क्षेत्र तथा केन्द्र को बाहरी परतों से पृथक् किया जाता है। यह दो भागों में विभाजित है जिसे कोर कहा जाता है।

शैल या चट्टान (ROCK)

आग्नेय चट्टानों की विशेषताएँ (Characteristics of Igneous Rocks) 

आग्नेय चट्टानों की निम्नलिखित विशेषताएँ –

(1) आग्नेय चट्टानें पिघले हुए गर्म पदार्थ से बनती हैं. इसलिए ये अत्यधिक कठोर और ठोस होती है। 

(2) इन चट्टानों में जैविक अवशेष (Fossils) नहीं मिलते हैं। 

(3) आग्नेय चट्टानों में रन्ध या छिद्र नहीं होते जैसे कि परतदार चट्टानों में होते हैं।

(4) ये चट्टाने ज्वालामुखी क्षेत्रों में सतह पर ही मिलती है।

(5) आग्नेय चट्टानें कठोर, रवेदार और परतहीन होती हैं। 

(6)पानी का प्रवेश कम होने से इनमें रासायनिक अपक्षय की किया बहुत ही कम होती है। 

(7)इन चट्टानों में संधियाँ पाई जाती हैं।

(8) इनका वितरण ज्वालामुखी क्षेत्रों में अधिक होता है।

आग्नेय चट्टानों का वर्गीकरण (Classification of Igneous Rocks) 

यद्यपि सभी आग्नेय चट्टानें गर्म एवं पिघले हुए मैग्मा एवं लावा के ठंडे होने से बनी हैं, लेकिन भूपटल की सभी आग्नेय चट्टाने एक जैसी नहीं है। उनकी बनावट, संरचना और स्वरूप में पर्याप्त अन्तर पाया जाता है। सामान्यतः आग्नेय चट्टानें अनेक प्रकारों में प्राप्त होती है। रासायनिक संरचना के आधार पर आग्नेय चट्टानें निम्नलिखित प्रकार की होती है-

(1) अम्लीय आग्नेय चट्टान– जब कभी यह अत्यंत गर्म एवं पिघला पदार्थ (मैग्मा) भूपटल की सतह की ओर गतिशील होता है, तब इस मैग्मा का कुछ भाग भूपटल में स्थित दरारों आदि में ठंडा होकर एकत्र हो जाता है। धरातल के नीचे इस प्रकार से बनने वाली चट्टानों को अम्लीय चट्टानें कहते हैं। इन चट्टानों में सिलिका या बालू की मात्रा 65 से 85% तक होती है। इनका औसत घनत्व 2.75 से 2.8 होता है। जैसे- ग्रेनाइट।

(2) क्षारीय आग्नेय चट्टानें – मैग्मा या लावा के भूपटल पर आकर ठंडे होने से बनने वाली चट्टाने क्षारीय आग्नेय चट्टानें कहलाती है। इस प्रकार की चट्टानें अधिकतर ज्वालामुखी के विस्फोट के समय बनती है, इसलिए इन्हें ज्वालामुखी चट्टानें भी कहते हैं। इन चट्टानों में बालू की मात्रा 45% से 60% तक होती है। इनमें फेरोमैग्नीशियम की अधिकता होती है। इनका रंग गहरा होता है तथा ये भारी होती है। उदाहरण- बेसाल्ट, मैब्रो, डोलेराइट आदि।

कायान्तरित / रूपान्तरित चट्टानें (Metamorphic Rocks)

जब अधिक दाब व ताप से चट्टानों के मूल लक्षण में आशिक अथवा पूर्ण परिवर्तन होता है तो उन्हें रूपांतरित चट्टानें कहते हैं। इस प्रकार की चट्टानों का निर्माण भी प्रायः उन्हीं परिस्थितियों में होता है जिनमें आग्नेय चट्टानों का निर्माण होता है।

जब आग्नेय और रूपांतरित चट्टानों के रंग, स्वरूप और संगठन में अत्यधिक दबाव के कारण परिवर्तन हो जाता है, तो इन नवीन चट्टानों को रूपांतरित चट्टानें कहते हैं। चट्टानों में रूपांतरण शीघ्रता से तथा धीरे-धीरे भी हो सकता है। रूपांतरित चट्टानों के उदाहरणों में चूना पत्थर (Limestone) से संगमरमर (Marble) तथा शेल (Shale) से स्लेट (State) उल्लेखनीय है।

कायान्तरित चट्टानों की विशेषताएँ (Characteristics of Metamorphic Rocks) 

इन चट्टानों की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं- 

(1) इन चट्टानों का निर्माण ताप व दाब से होता है।

(2) इनमें जीवाश्म नहीं पाए जाते हैं।

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