प्रारम्भिक शिक्षा के सन्दर्भ में गठित आयोग एवं समितियाँ – COMMISSION AND COMMITTEES IN REFERENCE TO ELEMENTARY EDUCATION IN HINDI

स्वतंत्रता के पूर्व संक्षिप्त जानकारी शिक्षा की (CONCISE KNOWLEDGE ABOUT EDUCATION OF PRE-INDEPENDENCE)

मिशनरियों द्वारा आधुनिक शिक्षा का आरम्भ( Modern education started by missionaries) 

भारत में मिशनरियों द्वारा आधुनिक शिक्षा का आरम्भ हुआ। मिशनरियों का प्रमुख उद्देश्य भारत में कैथोलिक धर्म का प्रसार करना था। इसके अतिरिक्त अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षा संस्थाओं की स्थापना करना इनका प्रमुख उद्देश्य था । इस सम्बन्ध में डॉ. डी.ओ. ऐलेन (D.O. Allen) के अनुसार, शिक्षा संस्थाओं ने मिशनरियों को भारतीयों से सम्पर्क स्थापित करने, उन्हें अपने धार्मिक सिद्धान्तों से अवगत कराने का अवसर प्रदान किया।”

COMMISSION AND COMMITTEES IN REFERENCE TO ELEMENTARY EDUCATION IN HINDI

इसी क्रम में भारत में विदेशी कम्पनियों का आगमन हुआ जिनमें ईस्ट इण्डिया कम्पनी की अपनी भूमिका थी। यद्यपि ईस्ट इण्डिया कम्पनी के भारत आगमन का मुख्य उददेश्य व्यापार और धर्म का प्रचार करना था लेकिन धीरे-धीरे देश के पर्याप्त भू-भाग के शासन की बागडोर कम्पनी के हाथ में आने लगी और उसकी सत्ता ने राजनैतिक रूप धारण कर लिया। अपनी इस सत्ता को चिरस्थाई बनाए रखने के लिए कम्पनी द्वारा भारतीयों की शिक्षा के प्रति ध्यान दिया जाना अनिवार्य हो गया। यहीं से ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा भारतीय शिक्षा का आरम्भ हुआ।

इस सम्बन्ध में टी.एन. सिकेरा के अनुसार, “व्यापार के बाद इस देश में उनका झण्डा लहराया और उसके साथ उनकी शिक्षा का आरम्भ हुआ।”

मिशनरियों में सर्वप्रथम डच मिशनरियों ने चिनसुरा, नागापट्टम तथा विमलीपट्टम में कुछ विद्यालयों की स्थापना की। इन विद्यालयों में डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी के कर्मचारियों एवं अन्य भारतीयों के बालकों को शिक्षा प्रदान की जाती थी। डच मिशनरियों ने धर्म प्रचार को वरीयता नहीं दी । इसके पश्चात् डेन, फ्रांसीसी, पुर्तगाली तथा अंग्रेज मिशनरियों ने अनेक विद्यालयों की स्थापना की जिनमें विभिन्न विषयों के अतिरिक्त दस्तकारी प्रशिक्षण आदि की शिक्षा दी जाती थी ।

अंग्रेज मिशनरियों ने व्यापक स्तर पर विभिन्न विद्यालयों की स्थापना की। इन विद्यालयों में इनके कर्मचारियों के बच्चों को निःशुल्क शिक्षा प्रदान की जाती थी। अंग्रेज मिशनरियों ने बंगाल को ईसाई धर्म के प्रचार का केन्द्र बनाया परन्तु ईस्ट इण्डिया कम्पनी की धर्म विरोधी नीति से मिशनरियों को निराशा हुई।

इस सम्बन्ध में नूरुल्ला व नायक के अनुसार, मिशनरियों और उनके मित्रों ने धर्म-प्रचार कार्य में स्वतन्त्रता प्राप्त करने के उद्देश्य से इंग्लैण्ड में आन्दोलन प्रारम्भ किया। आन्दोलन करने वालों में प्रमुख स्थान चार्ल्स ग्राण्ट का था।”

चार्ल्स ग्राण्ट ईस्ट इण्डिया कम्पनी में कार्यरत था उसने अपनी पुस्तक में हिन्दू-मुस्लिम अज्ञानता को दर्शाया तथा उसके निवारण के लिए पंचमुखी योजना प्रस्तुत की जिसमें भारत में विद्यालयों की स्थापना तथा अंग्रेजों द्वारा शिक्षा की सम्पूर्ण व्यवस्था की योजना प्रस्तुत की।

अपने प्रस्ताव के द्वारा ग्राण्ट ने भारतीयों की शिक्षा हेतु रूपरेखा तैयार की जिसे भविष्य में मान्यता प्राप्त हो गई।

नूरुल्ला व नायक के अनुसार, “ग्राण्ट को कभी-कभी भारत की आधुनिक शिक्षा का जन्मदाता कहा जाता है।”

सन् 1766 तक कम्पनी की शिक्षा नीति प्राथमिक शिक्षा देने तक सीमित रही किन्तु इसके उपरान्त शिक्षा नीति में परिवर्तन हुआ एवं उच्च शिक्षा की संस्थाएँ स्थापित की गई। इसके अन्तर्गत 1781 में कलकत्ता में मदरसा तथा 1791 में बनारस संस्कृत कॉलेज की स्थापना की गई।

इन दोनों कॉलेज की स्थापना का उद्देश्य मुसलमान नवयुवकों को मुस्लिम कानूनों एवं हिन्दू नवयुवकों को हिन्दू कानूनों में विशेष योग्यता प्रदान करके, कम्पनी एवं शासन के कनिष्ठ पदों के लिए तैयार करना था।

तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड वेलेजली द्वारा सन् 1800 में कलकत्ता (अब कोलकाता) नगर में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना की गई। यह कॉलेज, कम्पनी के असैनिक कर्मचारियों के लिए था एवं उनको भारतीय भाषाओं, हिन्दू मुस्लिम कानून एवं भारतीय इतिहास की शिक्षा प्रदान करता था तथा अन्त में सन् 1818 में पूना संस्कृत कॉलेज की स्थापना की गई।

प्राच्य-पाश्चात्य विवाद (Orientalist-Anglicist Controversy)

1813 के आज्ञा-पत्र की धारा 43 में भारतीयों की शिक्षा का उत्तरदायित्व कम्पनी को दिया गया एवं उसे उनकी शिक्षा पर प्रति वर्ष कम से कम एक लाख रूपये की धनराशि व्यय करने का आदेश दिया गया। किन्तु इसमें इस बात का स्पष्टीकरण नहीं किया गया था कि यह धनराशि किस शिक्षा पर व्यय की जाए- प्राच्य शिक्षा या पाश्चात्य शिक्षा पर । फलतः इस प्रश्न को लेकर विवाद उठ खड़ा हुआ। 1813 के आज्ञा-पत्र धारा 43 में विवाद के मुख्य तीन कारण थे-

(1) ₹1 लाख की राशि का व्यय किस प्रकार हो, 

(2) भारतीय विद्वान के अन्तर्गत किन-किन विद्वानों को रखा जाए तथा

(3) साहित्य शब्द का क्या आशय समझा जाए?

शिक्षा जगत में इस विवाद को ‘प्राच्य-पाश्चात्य विवाद के नाम से जाना जाता है। प्राच्यवादियों एवं पाश्चात्यवादियों का विवाद, सन् 1834 तक चलता रहा। अन्त में, 1835 में लोक शिक्षा समिति के मन्त्री ने दोनों दलों के विचारों को तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बैंटिक के सम्मुख निर्णयार्थ प्रस्तुत किया ।

मैकाले का विवरण-पत्र, 1835 (MACAULAY’S MINUTES, 1835)

मैकाले द्वारा धारा 43 की व्याख्या (Explanation of Section-43 by Macaulay)

1813 के आज्ञा-पत्र में विवाद के मुख्य तीन कारण थे- 1 लाख की राशि का व्यय किस प्रकार हो, भारतीय विद्वान के अन्तर्गत किन-किन विद्वानों को रखा जाए तथा साहित्य शब्द का क्या आशय समझा जाए? मैकाले एक कुशल विद्वान होने के साथ-साथ पाश्चात्य साहित्य का भी घोर समर्थक था तथा प्राच्य साहित्य के ज्ञान को निरर्थक मानता था। अतः उसने धारा 43 की व्याख्या जिस चतुराई के साथ की, वह उसकी कुशलता ही कही जाएगी। मैकाले द्वारा की गई धारा 43 की व्याख्या का विवरण इस प्रकार है-

(1) ‘साहित्य’ शब्द से आशय-मैकाले ने धारा 43 की व्याख्या में साहित्य शब्द को स्पष्ट करते हुए लिखा कि साहित्य के अन्तर्गत अंग्रेजी साहित्य भी आएगा न कि केवल अरबी और फारसी साहित्य |

(2) ‘भारतीय विद्वान’ से आशय-भारतीय विद्वानों के अन्तर्गत वे विद्वान आएंगे जो लॉक व मिल्टन के दर्शन तथा कविता से सम्बन्धित हों अर्थात् केवल प्राच्य विद्वान ही नहीं अपितु पाश्चात्य विद्वान भी इस श्रेणी में आएंगे।

(3) एक लाख रुपये व्यय करने के सम्बन्ध में मैकाले ने अपने विवरण- पत्र में लिखा कि एक लाख रुपये की धनराशि पर कम्पनी का अधिकार है और कम्पनी जिस प्रकार चाहे वह धनराशि खर्च कर सकती है। उसे इस धनराशि को खर्च करने में किसी भी प्रकार की कोई बाध्यता नहीं है।

पाश्वात्य साहित्य के विषय में मैकाले का सुझाव (Macaulay’s suggestion about western literature) 

मैकाले प्राध्य साहित्य को या मानता था और उसके स्थान पर भारत में पाश्चात्य साहित्य की व्यवस्था करने के में था। पाश्चात्य साहित्य को महत्वपूर्ण बताने के सम्बन्ध में मैकाले ने जो सुझाव दिए वे इस प्रकार है-

(1) अंग्रेजी साहित्य संसार का सर्वश्रेष्ठ साहित्य है। इसका ज्ञान-विज्ञान अपार है।

(2) अंग्रेजी भाषा में श्रेष्ठ ज्ञान का भण्डार है जिसे विश्व के बुद्धिजीवियों ने बनाया है। इसलिए भारतीयों को इसका ज्ञान अवश्य करना चाहिए।

(3) शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी भाषा को बना दिया जाए क्योंकि भारत में प्रचलित देशी भाषाएँ अविकसित है। इनका शब्दकोष बहुत सीमित है। इनके माध्यम से भारतीयों को अंग्रेजी साहित्य के ज्ञान-विज्ञान से परिचित नहीं कराया जा सकता।

(4) मैकाले ने भारतीय साहित्य को निम्न कोटि का मानत हुए लिखा कि एक अच्छे यूरोपीय पुस्तकालय की मात्र एक अलमारी में रखी गई पुस्तकें सम्पूर्ण भारत और अरबी साहित्य के बराबर है।

(5) भारतीय इतिहास की निन्दा करते हुए उसने लिखा कि भारतीय इतिहास में 60 फीट लम्बे राजाओं का वर्णन है जो निरर्थक है।

(6) भारतीय भूगोल के विषय में मैकाले ने लिखा कि इसमें मक्खन और शीरे के समुद्रों का वर्णन है।

(7) भारतीय चिकित्सा साहित्य के विषय में मैकाले ने लिखा कि यह ऐसा चिकित्सा साहित्य है जिसके ज्ञान से अंग्रेज पशु-चिकित्सकों को भी शर्म आएगी। इनका ज्ञान प्रदान करना बिल्कुल निरर्थक है।

(8) अंग्रेजी भाषा की प्रशंसा करते हुए उसने लिखा कि यह भाषा सभी भाषाओं में श्रेष्ठ है जो इस भाषा का ज्ञान रखते हैं वे बुद्धिजीवी हैं।

मैकाले के विवरण- पत्र के गुण (Merits of Macaulay’s Minutes) 

(1) प्राच्य-पाश्चात्य विवाद के विषय में चतुराईपूर्ण सुझाव- मैकाले भारत में पाश्चात्य साहित्य तथा ज्ञान-विज्ञान का प्रचार व प्रसार करना चाहता था परन्तु उसने जिस चतुराई से धारा 43 की व्याख्या की उसके लिए वह प्रशंसा का पात्र है। उसने अपने तर्क इस प्रकार प्रस्तुत किए कि भारतीय भी उसके शब्दजाल में फँस गए तथा ये भी उसके तर्कों से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके।

(2) पाश्चात्य साहित्य की वकालत – मैकाले ने पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान के पक्ष में इतने ठोस तर्क प्रस्तुत किए कि जिससे यह लगने लगा कि पाश्चात्य साहित्य संसार का सर्वश्रेष्ठ साहित्य है। मैकाले ने भारतीयों को पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान से परिचित कराने के लिए कहा, यह उसके विवरण- पत्र का एक महत्त्वपूर्ण गुण था।

(3) प्रगतिशील शिक्षा की वकालत – उस समय भारत में जो शिक्षा दी जा रही थी, वह रूढिवादी थी। प्राचीन शिक्षा साहित्य प्रधान थी एवं शिक्षण विषयों में भी किसी प्रकार की आधुनिकता नहीं थी। मैकाले ने भारतीय रूढ़िवादी शिक्षा को आधुनिक बनाने पर जोर दिया। उसने भारत में प्रगतिशील शिक्षा की व्यवस्था पर बल दिया जो उसके विवरण-पत्र का एक गुण है।

(4) धार्मिक शिक्षा पर रोक-उस समय वैदिक पाठशालाओं में हिन्दू धर्म की, मकतब और मदरसों में इस्लाम धर्म की, ईसाई मिशनरियों के विद्यालयों में ईसाई धर्म की शिक्षा अनिवार्य रूप से दी जा रही थी।

मैकाले के विवरण-पत्र के दोष (Demerits of Macaulay’s Minutes)

(1) धारा 43 की पक्षपातपूर्ण व्याख्या– मैकाले ने आज्ञा पत्र 1813 की धारा 43 की जिस प्रकार व्याख्या की, वह पक्षपातपूर्ण थी। यह बात दूसरी है कि उसने अपने चतुराईपूर्ण तर्कों से धारा 43 की व्याख्या को उचित सिद्ध कर दिया।

(2) शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी को बनाना निराधार – किसी भी देश की शिक्षा का माध्यम उस देश की मातृभाषा अथवा प्रान्तों की प्रान्तीय भाषाएँ होनी चाहिए | 

(3) भारतीय साहित्य का अपमान- मैकाले ने भारतीय साहित्य को बहुत ही निम्न कोटि का बताया एवं उसका मजाक उड़ाया। 

(4) भारत में एक नए वर्ग का निर्माण – मैकाले भारत में एक ऐसे वर्ग का निर्माण करना चाहता था जो पाश्चात्य राज्या और संस्कृति का समर्थक हो तथा ब्रिटिश शासको की भारत में अपना साम्राज्य स्थापित करने में सहायता प्रदान करे। ये जन्म से तो भारतीय हो परन्तु विचारों, रुचि तथा व्यवहार से अंग्रेज हो।

(5) भारतीय भाषाओं की उपेक्षा – मैकाले ने भारतीय भाषा के सम्बन्ध में लिखा कि ये अविकसित तथा वास भारतीयों को भी इन भाषाओं को सीखने में कोई रुचि नहीं है। 

मैकाले के विवरण-पत्र का भारतीय शिक्षा पर प्रभाव (Impact of Macaulay’s Statement on Indian Education) 

मैकाले के विवरण-पत्र के प्रभाव को हम दो रूपों में समझ सकते हैं- 

मैकाले के विवरण-पत्र का तत्कालीन प्रभाव

(1) भारत में अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय और महाविद्यालय खुलने शुरू हो गए। इनकी नींव इतनी मजबूत थी कि इनका विकास बहुत तेजी से हुआ और यह शिक्षा प्रणाली हमारे देश की मूल शिक्षा प्रणाली बन गई। आज भी हमारी शिक्षा इसी माध्यम पर आधारित है।

(2) अंग्रेजी को राजकाज की भाषा घोषित कर दिया गया। मैकाले ने अंग्रेजी भाषा के पक्ष में इसने ठोस सुझाव दिए थे. कि इनके परिणामस्वरूप अंग्रेजी भाषा का महत्व बढ़ गया। 

(3) सरकार, मैकाले के सुझावों से इतनी प्रभावित हुई कि इन सुझावों के आधार पर उसने अपनी नई शिक्षा नीति की घोषणा कर दी।      

मैकाले के विवरण-पत्र का दीर्घकालीन प्रभाव 

(1) भारतीयों को पाश्चात्य साहित्य तथा अंग्रेजी का ज्ञान हुआ। इसके विषय में जानकारी मिली जिससे वर्तमान सन्दर्भ में अनेक लाभ हुए।

(2) जिस समय मैकाले भारत में आया था उस समय भारत में जो शिक्षा व्यवस्था थी, वह रूढ़िवादी थी। मैकाले ने उसके स्थान पर ऐसी शिक्षा व्यवस्था करने के लिए कहा जिससे बालक तथा राष्ट्र की उन्नति हो सके।

(3) मैकाले के सुझावों से प्रभावित होकर भारतीयों ने पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति के प्रति रुचि दिखाई। अपनी सभ्यता को छोड़कर दूसरी सभ्यता से प्रभावित होना किसी भी प्रकार से देशहित नहीं कहा जा सकता।

मैकाले की इच्छा भारत में अपने धर्म और साहित्य का विकास करने की थी। वह यहाँ पर अपने धर्म और साहित्य के पक्ष में ठोस तर्क लेकर आया था। उसने प्राव्य साहित्य को निम्न बताकर भारत में पाश्चात्य साहित्य एवं अंग्रेजी भाषा को महत्त्वपूर्ण बना दिया। उसके सुझावों के आधार पर भारत में अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली की शुरुआत हुई। इससे हमें लाभ भी हुए। अंग्रेजी की शिक्षा प्राप्त करने के बाद भारतीय देश-विदेश में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। दूसरे देशों में अच्छे पदों पर नियुक्त हो रहे हैं। स्वतन्त्र होने के बाद हमने अपनी शिक्षा का माध्यम अपनी क्षेत्रीय भाषाओं को ही बनाया परन्तु अंग्रेजी भी बराबर शिक्षा का माध्यम बनी हुई है, इसके लिए मैकाले धन्यवाद का पात्र है।

निस्पन्दन सिद्धान्त(Filtration Theory)

अंग्रेजी के फिल्टरेशन (Filtration) शब्द का अर्थ है- निस्पन्दन अर्थात् छानने की क्रिया । ईस्ट इण्डिया कम्पनी एक व्यावसायिक, व्यापारिक कम्पनी थी जिससे वह भारतीयों की शिक्षा पर कम से कम धन व्यय करना चाहती थी, अतः उसने अपने लाभ के लिए यह सिद्धान्त प्रतिपादित किया था। इसके बाद 1835 में लार्ड मैकाले ने अपने विवरण-पत्र में इस सिद्धान्त के पक्ष में यह सुझाव दिया कि शुरूआत में उच्च शिक्षा की व्यवस्था उन उच्च वर्ग के व्यक्तियों के लिए की जाए जो हमारे और उन लाखों व्यक्तियों के बीच में, जिन पर हम शासन करते हैं, दुभाषिए का कार्य करे। इस सबसे शिक्षा जगत में एक सिद्धान्त का उद्भव हुआ। वह यह था कि सरकार को उच्च वर्गों में उच्च शिक्षा का प्रसार करना चाहिए। उच्च वर्ग से निम्न वर्ग तक वह स्वयं ही छन-छन कर पहुँच जाएगी। यही निस्पन्दन सिद्धान्त है।

बैंटिक की शिक्षा नीति, 1835 (Education Policy of Bentinck, 1835)

गवर्नर जनरल विलियम बैंटिक को 2 फरवरी, 1835 में मैकाले का विवरण- पत्र प्राप्त हुआ। इस पर उन्होंने गम्भीरता से विचार किया और इसके सुझावों को स्वीकारते हुए 7 मार्च, 1835 को ब्रिटिश सरकार की नई शिक्षा नीति की घोषणा कर दी। यह नीति इस प्रकार थी-

“शिक्षा के लिए निर्धारित धनराशि का सर्वोत्कृष्ट प्रयोग केवल अंग्रेजी शिक्षा के लिए ही किया जा सकेगा।” अर्थात्-

(1) धन की कमी के कारण सरकार जनशिक्षा की व्यवस्था नहीं कर सकेगी।

(2) धनराशि का व्यय केवल अंग्रेजी शिक्षा पर ही किया जाएगा।

(3) प्राच्य साहित्य के रखरखाव पर किसी भी प्रकार का धन व्यय नहीं किया जाएगा।

(4) उच्च वर्ग के थोड़े व्यक्ति हैं, इन्हें शिक्षित करने के बाद शिक्षा का उत्तरदायित्व इन्हें दिया जा सकता है।

लॉर्ड विलियम बैंटिक द्वारा शिक्षा नीति घोषित करते ही भारत में अंग्रेजी शिक्षा को बल मिल गया और 1813 के आज्ञापत्र की धारा 43 द्वारा उत्पन्न विवाद का स्थायी अन्त हो गया। मैकाले ने इस विवाद को बड़ी ही कुशलता से सुलझाया। अतः हम कह सकते हैं कि अन्त भला तो सब भला ।

भारतीय शिक्षा आयोग, 1882 ( हण्टर आयोग) [INDIAN EDUCATION COMMISSION (HUNTER COMMISSION)]

प्राथमिक शिक्षा के सम्बन्ध में सिफारिशें (Recommendations Regarding Primary Education) 

प्राथमिक शिक्षा के सम्बन्ध में निम्न सिफारिश प्रस्तुत की गई- 

(1) उद्देश्य-प्राथमिक शिक्षा के उद्देश्य इस प्रकार होने चाहिए-

(i) जनसाधारण हेतु शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए। 

(ii) पिछडी जाति तथा प्रान्तों में शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए ठोस कदम उठाए जाने चाहिए।

(2) प्रशासन व वित्त व्यवस्था-प्रशासन व वित्त व्यवस्था के लिए प्राथमिक शिक्षा को नगर पालिका जिला परिषदों को सौंपने का सुझाव दिया गया। इनमें वित्त की व्यवस्था स्थानीय निगम स्वयं करेंगे। प्रान्तीय सरकारें उन्हें इस व्यय का 1/2 या 1/3 आर्थिक सहायता के रूप में प्रदान करेंगी।

(3) शिक्षा का माध्यम-शिक्षा का माध्यम प्रान्तीय भाषाएँ होनी चाहिए और इन भाषाओं का विकास करने के लिए प्रयास किए जाने चाहिए।

(4) पाठ्यक्रम प्राथमिक शिक्षा का पाठ्यक्रम  – तत्कालीन परिस्थिति के अनुसार होना चाहिए। इसमें गणित, कृषि, सामान्य विज्ञान, बहीखाता पशुपालन, बुनाई, कताई आदि की शिक्षा अनिवार्य रूप से दी जाए।

(5) प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति – प्राथमिक शिक्षा में सुधार के लिए यह आवश्यक है कि इन विद्यालयों में प्रशिक्षित व योग्य शिक्षकों की नियुक्ति की जाए जिससे इनके स्तर में सुधार हो सके।

(6) शिक्षक प्रशिक्षण विद्यालय-आयोग ने योग्य शिक्षकों की पूर्ति के लिए नॉर्मल विद्यालयों (शिक्षक प्रशिक्षण केन्द्र) की संख्या को बढ़ाने के लिए कहा। आयोग ने सुझाव दिया कि प्रत्येक विद्यालय निरीक्षक के क्षेत्र में कम से कम एक नार्मल विद्यालय अवश्य होना चाहिए।

माध्यमिक शिक्षा के सम्बन्ध में सिफारिशें (Recommendations Regarding Secondary Education) 

माध्यमिक शिक्षा के सम्बन्ध में निम्नलिखित सिफारिश प्रस्तुत की- 

(1) उद्देश्य- माध्यमिक शिक्षा के उद्देश्य इस प्रकार होने चाहिए-

(i) माध्यमिक शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य बालक को सामान्य जीवन जीने की तैयारी कराना है। 

(ii) माध्यमिक शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य बालक को उच्च शिक्षा हेतु तैयार करना है।

(2) प्रशासन व वित्त व्यवस्था-माध्यमिक शिक्षा का उत्तरदायित्व समाज के प्रबुद्ध व सम्पन्न व्यक्तियों को दिया जाए। जिन क्षेत्रों में ऐसी व्यवस्था न हो सके, वहाँ सरकार द्वारा प्रत्येक जिले में एक माध्यमिक विद्यालय खोला जाए।

(3) शिक्षा का माध्यम-आयोग ने इसके सम्बन्ध में कोई स्पष्ट सुझाव नहीं दिया। इसका तात्पर्य यह है कि वह इस स्तर पर शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी को ही बनाए रखना चाहता था।

(4) पाठ्यक्रम – इस स्तर पर आयोग ने दो प्रकार के पाठ्यक्रमों का सुझाव दिया-अ-पाठ्यक्रम (A – Course) और व-पाठ्यक्रम (B – Course) |

(i) अ-पाठ्यक्रम में साहित्य विषय और अंग्रेजी की शिक्षा अनिवार्य होगी। यह पाठ्यक्रम उन छात्रों के लिए होगा जो माध्यमिक शिक्षा के बाद उच्च शिक्षा में प्रवेश के इच्छुक हो।

(ii) व पाठ्यक्रम में व्यावसायिक विषय शामिल होंगे। यह पाठ्यक्रम उन छात्रों के लिए होगा जो व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त करना चाहते हैं अर्थात् जो जीविका निर्वाह करने के लिए रोजगार प्राप्त करना चाहते हैं।

(5) प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति –  आयोग ने माध्यमिक शिक्षा में सुधार के लिए योग्य व प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति करने का सुझाव दिया जिससे शिक्षा का स्तर ऊँचा उठाया जा सके।

उच्च शिक्षा के सम्बन्ध में सिफारिशें (Recommendations Regarding Higher Education) 

आयोग ने उच्च शिक्षा के सम्बन्ध में निम्नलिखित सिफारिशें प्रस्तुत की है-

(1) उद्देश्य – आयोग के अनुसार उच्च शिक्षा के उद्देश्य इस प्रकार होने चाहिए-

(i) छात्रों को अच्छे नागरिक बनने का ज्ञान, (ii) नैतिक एवं चारित्रिक विकास,

(iii) राष्ट्र सेवा तथा उच्च ज्ञान की प्राप्ति कराना।

(2) प्रशासन एवं वित्त व्यवस्था-आयोग ने सिफारिश की कि उच्च शिक्षा की जिम्मेदारी भारतीयों पर छोड़ देनी चाहिए। सरकार केवल उन्हीं स्थानों पर जहाँ जनता इनकी स्थापना करने में असमर्थ हो. राजकीय महाविद्यालयों की स्थापना करें। सरकार इन महाविद्यालयों को उदारतापूर्वक अनुदान दे।

(3) शिक्षा का माध्यम-आयोग ने उच्च शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी को ही बनाए रखने का समर्थन किया।

(4) पाठ्यक्रम – महाविद्यालयों को अपने पाठ्यक्रम का विस्तार करने हेतु सुझाव दिया जिससे छात्र अपनी रुचि के अनुसार पाठ्य विषय का चयन करके अध्ययन कर सकें।

(5) प्रशिक्षित प्राध्यापकों की नियुक्ति-महाविद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति के समय यूरोप के विश्वविद्यालयों से शिक्षा प्राप्त भारतीयों को वरीयता दी जाए।

भारतीय शिक्षा आयोग के गुण (Merits of India Education Commission)

(1) भारतीय शिक्षा आयोग ने शिक्षा की व्यवस्था का हाई मिशनरियों को नहीं सौंपा। जिससे वे शिक्षा की आव अपने धर्म का प्रचार नहीं कर पाए और यह भारतीयों के लिए अत्यन्त हितकारी सिद्ध हुआ।

(2) आयोग ने वुड के घोषणा-पत्र के केवल उन्हीं सुझाया को स्वीकृति दी जो भारतीय शिक्षा के लिए आवश्यक थे।

(3) प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था स्थानीय निगमों के हाथ म सौंपकर इसका मार्ग प्रशस्त किया।

(4) आयोग ने प्राथमिक स्तर से उच्च स्तर तक की शिक्षा का जो पाठ्यक्रम निश्चित किया उससे इनका विकास हुआ। 

(5) माध्यमिक स्तर पर जो अ- पाठ्यक्रम और ब-पाठ्यक्रम आयोग ने पढ़ाने के लिए कहा, उनसे छात्रों को अपना नैतिक व आर्थिक विकास करने में सहायता प्राप्त हुई। 

(6) भारतीय शिक्षा आयोग ने स्त्री-शिक्षा एवं मुस्लिम शिक्षा के विकास के लिए ठोस सुझाव दिए।

भारतीय शिक्षा आयोग के दोष (Demerits of Indian Education Commission)

(1) आयोग ने संस्कार को शिक्षा के उत्तरदायित्व से मुक्त कर इसका भार व्यक्तिगत हाथों में सौंप दिया जिससे शिक्षा स्तर में गिरावट आ गई।

(2) आयोग ने निःशुल्क शिक्षा के विषय में कोई सुझाव नहीं दिया।

(3) मुस्लिम बच्चों के लिए अलग विद्यालय खोलने का सुझाव दिया जिससे धर्म-निरपेक्षता की भावना को धक्का लगा।

(4) उच्च शिक्षण संस्थाओं में यूरोपीय विश्वविद्यालयों से शिक्षित व्यक्तियों को प्राध्यापक बनाने में वरीयता देने के लिए कहा गया यह भारतीय शिक्षा प्रणाली द्वारा शिक्षित योग्य व्यक्तियों के साथ पक्षपात था।

(5) प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था के लिए दिए जाने वाले सरकारी अनुदान की कोई न्यूनतम सीमा निश्चित नहीं की गई, इससे इस कार्य का ठीक प्रकार से निर्वाह नहीं हो पाया।

(6) सहायता अनुदान की शर्तों को तो सरल कर दिया गया परन्तु इसके साथ शैक्षिक उपलब्धियों को जोड़ने के कारण परीक्षा प्रधान शिक्षा को बढ़ावा मिला।

भारतीय शिक्षा आयोग का भारतीय शिक्षा पर प्रभाव (Indian Education Commission’s impact on Indian education) 

भारतीय शिक्षा आयोग के सुझावों का भारतीय शिक्षा नीति पर जो प्रभाव पडा वह निम्नलिखित हैं-

(1) आयोग के सभी सुझावों को स्वीकार कर उसको भारतीय शिक्षा के अन्तर्गत कार्यान्वित करना शुरू कर दिया गया। 

(2) सहायता अनुदान की आसान शर्तों के कारण शिक्षण संस्थाओं की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई।

(3) प्राथमिक विद्यालयों की संख्या तथा उसमें पढ़ने वाले छात्रों की संख्या में वृद्धि हुई ।

(4) माध्यमिक विद्यालयों की संख्या तथा उनमें पढ़ने वाले छात्रों की संख्या में वृद्धि हुई।

(5) उच्च शिक्षा के क्षेत्र में प्रसार होना शुरू हो गया। 

(6) कलकत्ता, बम्बई तथा मदास विश्वविद्यालयों में विज्ञान की उच्च शिक्षा की व्यवस्था की गई। 

(7) उच्च शिक्षण संस्थाओं तथा इनमें अध्ययन करने वाले छात्रों की संख्या में वृद्धि हुई।

लॉर्ड कर्जन की शिक्षा नीति (LORD CURZON’S EDUCATIONAL POLICY)

शिमला शिक्षा सम्मेलन, 1901 (Shimla Education Conference, 1901)

भारतीय शिक्षा के पुनर्गठन तथा उसे व्यावहारिक रूप प्रदान करने के लिए लॉर्ड कर्जन ने शिमला में 1901 में शिमला शिक्षा सम्मेलन’ का आयोजन किया। इसके अध्यक्ष स्वयं लॉर्ड कर्जन थे।

इन्होंने इसमें भाग लेने के लिए ‘शिक्षा प्रबन्धकों तथा मिशनरियों के कुछ प्रतिनिधियों को आमन्त्रित किया परन्तु उन्होंने इसमें भाग लेने के लिए किसी भी भारतीय को आमन्त्रित नहीं किया और न ही इस सम्मेलन की गतिविधियों के विषय में कुछ भी प्रकाशित कराया जिससे भारतीयों में इस सम्मेलन तथा लॉर्ड कर्जन के प्रति शंका तथा रोष की भावना उत्पन्न हो गई ।

यह सम्मेलन 15 दिन तक चला इसमें शिक्षा से सम्बन्धित 150 प्रस्तावों को पारित किया गया। इसकी कार्यवाही को गोपनीय रखने के कारण भारतीयों को यह विश्वास हो गया कि उनके विरुद्ध कोई न कोई नीति अवश्य तैयार की जा रही है। इसीलिए भारतीयों ने लॉर्ड कर्जन को सन्देह की दृष्टि से देखना प्रारम्भ कर दिया।

लॉर्ड कर्जन ने “शिमला शिक्षा सम्मेलन, 1901 में पारित प्रस्तावों के आधार पर 11 मार्च सन् 1904 को अपनी शिक्षा नीति को एक प्रस्ताव के रूप में अंकित करके प्रकाशित किया। इस प्रस्ताव में उसने तत्कालीन भारतीय शिक्षा के दोषों तथा उनमें सुधार के लिए एक नई शिक्षा नीति प्रस्तुत की।

कर्जन ने प्राथमिक शिक्षा के सम्बन्ध में सुझाव (Curzon’s suggestion regarding primary education) 

कर्जन ने प्राथमिक शिक्षा के सम्बन्ध में निम्नलिखित सुझाव दिए-

(1) प्राथमिक शिक्षकों को दो वर्ष का शिक्षण प्रशिक्षण देने की व्यवस्था की जाए साथ ही इनके वेतन और सेवाशतों में भी सुधार किया जाए।

(2) प्राथमिक शिक्षा का प्रसार करना सरकार का मुख्य उत्तरदायित्व है अतः इस ओर सरकार को ठोस कदम उठाने चाहिए |

(3) क्षेत्रीय आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर प्राथमिक शिक्षा का पाठ्यक्रम तैयार कराया जाए एवं इसमें उपयोगी विषयों को सम्मिलित किया जाए।

(4) प्राथमिक शिक्षा का माध्यम भारतीय भाषाओं को बनाया जाए एवं इसमें अंग्रेजी को स्थान न दिया जाए। 

(5) प्राथमिक स्तर की शिक्षण विधियों का विकास किया जाए तथा किण्डरगार्टन प्रणाली का प्रयोग किया जाए।

कर्जन ने माध्यमिक शिक्षा के सम्बन्ध में सुझाव (Curzon suggested regarding secondary education) 

कर्जन के माध्यमिक शिक्षा सम्बन्धी सुझाव इस प्रकार हैं- 

(1) गैर-सरकारी माध्यमिक विद्यालयों को सरकार से मान्यता प्राप्त करना आवश्यक है। 

(2) माध्यमिक विद्यालयों को मान्यता देने तथा सहायता अनुदान देते समय नियमों का अनिवार्य रूप से पालन किया जाए।

(3) प्रशिक्षित तथा योग्य अध्यापकों की व्यवस्था की जाए। 

(4) सरकारी माध्यमिक विद्यालय, गैर-सरकारी माध्यमिक विद्यालयों के समक्ष आदर्श भूमिका का निर्वाह करें। 

(5) माध्यमिक विद्यालयों के स्तर को ऊँचा उठाने हेतु प्रयास किया जाए।

(6) माध्यमिक विद्यालयों में योग्य अध्यापकों की नियुक्ति की जाए।

(7) पाठ्यक्रम में व्यावसायिक विषय भी सम्मिलित किए जाएं।

कर्जन ने उच्च शिक्षा के सम्बन्ध में सुझाव (Curzon’s suggestion regarding higher education) 

कर्जन ने उच्च शिक्षा के सम्बन्ध में निम्नलिखित सुझाव दिए-

(1) उच्च शिक्षा का विस्तार किया जाए अतः इसके लिए आवश्यक धनराशि को बढ़ाया जाए। 

(2) विश्वविद्यालयों तथा महाविद्यालयों के शिक्षा स्तर में उन्नयन हेतु विशेष प्रयास किए जाएं।

(3) उच्च शिक्षा स्तर पर आन्तरिक परीक्षाओं की अपेक्षा बाह्य परीक्षाओं को कम महत्त्व दिया जाए।

लॉर्ड कर्जन की शिक्षा नीति के गुण (Merits of Lord Curzon’s education policy) 

लॉर्ड कर्जन की शिक्षा नीति के गुण 

(1) प्राथमिक शिक्षा में संख्यात्मक तथा गुणात्मक बढ़ोतरी के लिए आवश्यक धनराशि में बढ़ोत्तरी की गई।

(2) केन्द्र में केन्द्रीय शिक्षा विभाग की स्थापना हो गई और उसने अपना कार्य करना शुरू कर दिया।

(3) माध्यमिक शिक्षा के लिए दी जा रही आर्थिक सहायता की धनराशि को बढाया गया जिससे उसके प्रसार में तेजी आई।

(4) भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम लागू होने से विश्वविद्यालयों के प्रशासन में सुधार हुआ, महाविद्यालयों के शैक्षिक स्तर में सुधार हुआ तथा उच्च शिक्षा के क्षेत्र में सुधार होना शुरू हो गया।

लॉर्ड कर्जन की शिक्षा नीति के दोष)Defects of Lord Curzon’s education policy) 

लॉर्ड कर्जन की शिक्षा नीति के दोष निम्न हैं ।

(1) मान्यता तथा सहायता अनुदान देने की शर्तों को कठोर कर दिए जाने के कारण माध्यमिक शिक्षा का प्रसार उस प्रकार नहीं हो पाया जैसी आशा की गई थी।

(2) महाविद्यालयों की सम्बद्धता सम्बन्धी नियमों की कठोरता के कारण इनके प्रसार में भी बाधा उत्पन्न हुई।

(3) विश्वविद्यालयों की स्वायत्ता कम हो गई और उन पर सरकारी नियन्त्रण अधिक हो गया।

(4) लॉर्ड कर्जन ने नए विश्वविद्यालयों तथा महाविद्यालयों की स्थापना के सम्बन्ध में कोई सुझाव नहीं दिया जिससे नए विश्वविद्यालयों तथा महाविद्यालयों की स्थापना की गति धीमी हो गई।

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