भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान एवं मुद्रा-CONTRIBUTION OF AGRICULTURE IN INDIAN ECONOMY & CURRENCYIN HINDI

 भारतीय मे कृषि(AGRICULTIRE IN INDIA) 

भारतीय कृषि की प्रमुख विशेषताएँ (Main Characteristics of Indian Agriculture)

भारतीय कृषि की अपनी विशिष्ट विशेषताएँ हैं। ये विशेषताएँ कृषि की सकारात्मक एवं नकारात्मक प्रवृत्तियों को भी स्पष्ट करती हैं। इन्हीं तथ्यों के आधार पर हम भारतीय कृषि की प्रमुख विशेषताओं का संक्षेप में वर्णन करेंगे-

(1) अर्द्ध-व्यापारिक कृषि-भारत में आज भी कृषि न तो पूर्णतः निर्वाह कृषि (Subsistence Farming) है और न ही पूरी तरह से व्यापारिक / व्यावसायिक (Commercial Farming) है।

(2) परम्परागत कृषि प्रणाली- भारत के अधिकांश कृषक अब भी परम्परागत प्रणाली से कृषि कर रहे हैं। इसका मुख्य कारण अधिकांश कृषको का निरक्षर होना है तथा जो साक्षर हैं वह भी कृषि से सम्बन्धित पुस्तकें अंग्रेजी भाषा में होने के कारण उसका ज्ञान प्राप्त नहीं कर पाते हैं।

भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान एवं मुद्रा-CONTRIBUTION OF AGRICULTURE IN INDIAN ECONOMY & CURRENCYIN HINDI

(3) छोटे भूखण्ड-भारत में छोटे एवं सीमान्त कृषकों की संख्या बहुत अधिक है। इसका कारण छोटे भूखण्डों का होना है। छोटे भूखण्डों के कारण कृषि की उत्पादकता प्रभावित होती है।

(4) कृषि का मानसून पर निर्भर होना- भारतीय कृषि आज भी मानसून पर निर्भर है यद्यपि सरकार एवं व्यक्तिगत स्तर पर सिंचाई के प्रयास किए जा रहे हैं परन्तु सरकारों की उदासीनता एवं भ्रष्टाचार के कारण कई सिंचाई योजनाएँ अधूरी पड़ी हैं।

(5) आधुनिक कृषि ज्ञान का अभाव- भारत के अधिकांश किसानों को आधुनिक कृषि का ज्ञान नहीं है। वे परम्परागत तरीकों से ही कृषि करते हैं। इसका कारण कृषि सम्बन्धी ज्ञान का स्थानीय भाषा में न होना एवं साथ ही कृषि की व्यावसायिक शिक्षा का अत्याधिक महंगा होना भी है।

नकदी अथवा व्यापारिक फसलें (Cash or Commercial Crops)-इन फसलों के उत्पादन का मुख्य उद्देश्य इन्हें बेचकर धन प्राप्त करना होता है। किसान इन फसलों के उत्पादों को या तो सम्पूर्ण रूप से बेच देता है अथवा आंशिक रूप से उपयोग करता है तथा शेष बड़ा भाग बेच देता है। इन फसलों में कपास, जूट या पटसन, चाय, कॉफी, रबड़, गन्ना, तम्बाकू तथा तिलहन (मूंगफली, सरसों, तिल, अलसी, सूर्यमुखी आदि) आदि प्रमुख हैं।

नकदी अथवा व्यापारिक फसलों को निम्न प्रकार से विभाजित किया जा सकता है-

(1) रेशे वाली फसलें (Fibre Crops)-जैसे- कपास, जूट, मेस्टा (Mesta) तथा सनई आदि ।

(2) बागान फसलें (Plantation Crops)– जैसे- चाय,

कॉफी, नारियल, सुपारी, काजू तथा रबर आदि । 3) शर्करा वाली फसलें (Sugar Crops)- जैसे- गन्ना तथा चुकन्दर आदि ।

(4) तिलहन फसलें (Oilseeds Crops)—जैसे- मूंगफली, सरसों, तिल, अलसी, अरण्डी (Castor) तथा सूर्यमुखी आदि ।

(5) उद्दीपक फसलें (Narcotic Crops) जैसे- तम्बाकू, अफीम आदि ।

(6) बागवानी फसलें (Gardening Crops)-जैसे- फल, सब्जियां, मसाले, फूल आदि ।

कृषि का महत्त्व (Importance of Agriculture) 

कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था का मेरुदण्ड है। जहाँ एक ओर यह प्रमुख रोजगार प्रदाता क्षेत्र है। वहीं सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में इसका महत्त्वपूर्ण योगदान है। इसके महत्त्व को निम्नलिखित बिन्दुओं द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है-

(1) रोजगार प्रदाता– देश की लगभग 60% जनसंख्या अपनी आजीविका हेतु कृषि पर ही निर्भर है। कृषि की सकल घरेलू उत्पादन में भागीदारी लगभग 22% है। वस्तुतः ये तथ्य भारत को विकासशील देशों में शामिल करते हैं क्योंकि विकसित राष्ट्रों में जहाँ सकल घरेलू उत्पाद में कृषि की भागीदारी का प्रतिशत कम होता है वहीं वहाँ की अपेक्षाकृत कम जनसंख्या कृषि कार्यों में संलग्न होती है। उदाहरणार्थ ब्रिटेन व अमेरिका की राष्ट्रीय आय में कृषि की भागीदारी क्रमशः 2 तथा 3% है।

(2) उद्योगों के लिए कच्चे माल की पूर्ति – कृषि के माध्यम से खाद्यान्न तो उपलब्ध होता ही है, साथ ही अनेक प्रमुख उद्योगों के लिए कच्चा माल भी उपलब्ध होता है जैसे- सूती वस्त्र उद्योग, जूट उद्योग, चीनी उद्योग, चाय उद्योग, सिगरेट उद्योग और तम्बाकू उद्योग आदि ।

(3) राष्ट्रीय आय में योगदान- भारत में कृषि राष्ट्रीय आय का प्रमुख स्रोत है। स्वतंत्रता के समय सकल घरेलू उत्पाद में कृषि आय का योगदान लगभग 55% था. परन्तु उदारीकरण की नीति अपनाने के पश्चात् अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान निरन्तर कम होता जा रहा है। वर्तमान समय में सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान लगभग 4-4.5% (2016-17 इकोनॉमिक सर्वे) है।

(4) कृषि में पशुओं का प्रयोग – वर्तमान समय में भी कृषि में बड़े पैमाने पर पशुओं का प्रयोग किया जाता है। विश्व में सर्वाधिक पशुओं की संख्या भारत में पाई जाती है। दुग्ध उत्पादन में भी भारत का प्रथम स्थान है। वर्ष 1997 की पशु गणना के अनुसार देश में लगभग 45 करोड़ पशुधन है।

भारतीय कृषि के पिछड़ेपन के कारण (Causes of Backwardness of Indian Agriculture)

भारत एक कृषि प्रधान देश है। कृषि का भारतीय अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण योगदान है। भारत के लोगों का कृषि से बहुत पुराना सम्बन्ध रहा है फिर भी भारतीय कृषि पिछड़ी हुई है। भारतीय कृषि के पिछड़ेपन के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-

(1) किसानों की निर्धनता तथा ऋणग्रस्तता (Poverty and Debt-Riddenness of Farmers)- किसानों की ऋणग्रस्तता एवं निर्धनता कृषि के पिछड़ेपन का कारण होती है। ऋणग्रस्तता के कारण भारतीय कृषक समयानुसार उन्नत बीजों, तकनीकों, सिंचाई इत्यादि के लिए धन का व्यय नहीं कर पाते फलस्वरूप कृषि का उत्पादन दिन-प्रतिदिन घटता जाता है।

(2) उत्पादन की पुरानी तकनीकी (Old Techniques of Production)-भारतीय कृषक रूढिवादिता एवं धनाभाव से ग्रस्त होने के कारण उत्पादन की प्राचीन तकनीक को प्रयुक्त करता है। भारतीय कृषक के द्वारा आधुनिक, सुधरी एवं उन्नतिशील तकनीक का प्रयोग न किए जाने से भारतीय कृषि अभी भी पिछड़ी हुई है।

(3) अपर्याप्त सिंचाई की सुविधाएँ (Insufficient Irrigation Facilities) – भारतीय कृषि सिंचाई के लिए मानसून पर आधारित है। आज भी उपलब्ध कृषि योग्य भूमि के अनुसार सिंचाई के साधन अपर्याप्त हैं। कृषि योग्य भूमि का लगभग 60% भाग मानसून पर ही निर्भर है।

(4) उन्नतशील बीजों, कीटनाशकों तथा रासायनिक खादों का कम प्रयोग (Nominal Use of Upgraded Seeds, Pesticides, and Fertilizers) – भारतीय किसान उन्नतशील बीजों का प्रयोग नहीं करते हैं। धनाभाव के कारण अच्छी एवं पर्याप्त मात्रा में रासायनिक खादों का प्रयोग नहीं करते हैं जिसके कारण उत्पादन की मात्रा घट जाती है।

भारतीय कृषि में हरित क्रान्ति (GREEN REVOLUTION IN INDIAN AGRICULTURE)

हरित क्रान्ति के प्रभाव (Impact of Green Revolution)

भारत में हरितक्रान्ति के परिमाणात्मक एवं रचनात्मक प्रभाव पड़े। नयी तकनीक के कारण कृषि उत्पादन में तीव्र गति से बढ़ोत्तरी तो हो रही परन्तु गुणवत्ता में काफी परिवर्तन भी दिखाई दे रहा है जो कि निम्नलिखित है-

(1) उत्पादन में वृद्धि – जैसे रि उत्पाद हो हा निर्भरता कम की रही थी अर्थात् खद्या में दे महो ।

(2) उत्पादकता में सुधार – फसलों की उत्पादकता में वृद्धि परिणामस्वरूप उत्पादन से इसकी शुरुआत में गेहूँ एवं चामलको उत्पादकता बढ़ी पर धीरे-धीरे अधिकतम फसलों की उत्पादकता में वृद्धि ह लगी।

(3) रोजगार में वृद्धि – कृषि के तकनीकीकरण के माध्यम से किसानों के लिए रोजगार के अवसर प्रशस्त हुए। विपणन, भी एक रोजगार के अवसर के रूप में सामने आया। इससे किसानों की रोजगार की समस्या का कुछ हद तक निदान हो सका

(4) खाद्यान्न की कीमत में स्थिरता –  जैसे-जैसे उत्पादन में बढ़ोतरी हुई वैसे-वैसे व्यापार में खाद्यान्न की अधिक मात्रा आने लगी। इसके परिणामस्वरूप कीमतों में स्थिरता आ गई।

(5) अन्य उद्योगों की स्थापना- कृषि में उपयुक्त यन्त्रों को उपलब्ध कराने के लिए उद्योगों की स्थापना हुई, जैसे ट्रॅक्टर, थ्रेशर, आदि। कृषि विपणन की व्यवस्था के लिए यातायात से लेकर खाद्यान्न भण्डारण तक नए उद्योगों की स्थापना हुई।
आनुवंशिक रूप से संशोधित (जी.एम.सी.) जीन खेती (Genetically Modified (G.M.C.) Gene’s Cultivation) – विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार जी. एम. वह तकनीक है जिसमें जंतुओं तथा पादपों का डी.एन.ए. अप्राकृतिक तरीके से बदला जाता है। जी.एम. तकनीक को इन नामों से भी जाना जाता है- 
1) जीन तकनीक 
2) रिकॉम्बिनेंट डी. एन. ए. तकनीक
3) जनेटिक इंजीनियरिंग
वर्तमान समय में दुनिया के 28 देशों में किसी न किसी स्तर पर जी.एम. फसल उगाई जा रही है लेकिन इसकी ज्यादा पैदावार केवल 6 देशों में हो रही है- अमेरिका, ब्राजील, कनाडा, चीन, भारत एवं अर्जेंटीना। सम्पूर्ण विश्व में कुल 18 करोड़ हेक्टेअर में इसकी खेती हो रही है एवं इसमें 92% हिस्सा इन 6 देशों की कृषि योग्य भूमि का है। इसमें अमेरिका का 40% ब्राजील का 125% हिस्सा है. बाकी बचे हुए 27% हिस्से में भारत, चीन, कनाडा, एवं अर्जेंटीना की कृषि भूमि है। जी. एम. खेती के विवादों से घिरे होने के बाद भी हाल के वर्षों में इसमें अधिक वृद्धि हुई है। भारत में सन 2008 में जी. एम. फसलों के अन्तर्गत 10 मिलियन हेक्टेअर भूमि थी। भारत में जी.एम. खेती के अन्तर्गत केवल (BT-Bacillus thurigiensis) कपास की ही खेती होती है। कपास की खेती में भारत विश्व में चौथे स्थान पर है। दो कम्पनियों द्वारा Bt कपास के बीजों की आपूर्ति की जाती है, ये है की महिको मोसीटो एवं तमिलनाडु की रासी प्राइस लिमिटेड ।
पर्यावरण विशेषज्ञों के विरोध के बाद भी जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी (GTAC) ने 2002 में Bt कपास की वाणिज्यिक बुआई को स्वीकृति प्रदान की।

आर्थिक विकास एवं राष्ट्रीय कृषि नीति (ECONOMIC DEVELOPMENT & NATIONAL AGRICULTURAL POLICY)

आर्थिक विकास में कृषि की भूमिका (Role of Agriculture in Economic Development) – आर्थिक विकास में कृषि की भूमिका को निम्न तथ्यों के माध्यम से स्पष्ट किया जा सकता है-
(1) उद्योगों के लिए कच्चे माल की आपूर्ति आर्थिक विकास के लिए कृषि का विकसित होना आवश्यक है। 
प्रो रोस्टोव के अनुसार, कृषि औद्योगिक विकास की आधारशिला है और कृषि उत्पादन औद्योगीकरण के लिए मूलभूत कार्यशील पूँजी है।” कृषि विभिन्न उद्योगों के लिए कच्चे माल की आपूर्ति करता है। यदि कृषि क्षेत्र पिछड़ा होगा तो औद्योगिक कच्चे माल की आपूर्ति नहीं हो सकेगी जिससे उद्योगों का विकास मन्द होगा तथा आर्थिक विकास की दर निम्न होगी।
(2) पूँजी निर्माण में सहायक कृषि क्षेत्र दो तरह से पूँजी निर्माण में सहायक सिद्ध होता है। प्रथम, कृषि उत्पादकता में वृद्धि के द्वारा कृषि क्षेत्र की आय बढ़ जाने से बचत करने की क्षमता का विस्तार होता है। दूसरा, कृषि कम पूँजी प्रधान उपायों अथवा ‘पूँजी-बचत उपायों’ (capital-saving devices) का प्रयोग करके उत्पादकता में वृद्धि की जा सकती है।

(3) विदेशी विनिमय का स्रोत-पूँजीगत वस्तुओं के आयात के लिए भारी मात्रा में विदेशी विनिमय की आवश्यकता पड़ती है। कृषि का विकास व विस्तार होने से देश की निर्यात क्षमता में बढ़ोत्तरी होती है।

(4) खाद्य-पदार्थों की बढ़ती माँग को पूरा करना- जनसंख्या एवं तीव्र विकास के लिए पर्याप्त मात्रा में खाद्य पदार्थों को उपलब्ध कराने में कृषि का सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान है। अल्पविकसित देशों में इन दो कारणों से खाद्यान्न की माँग विकसित देशों की अपेक्षा अधिक बढ़ जाती है।
कृषि नीति के उद्देश्य (Objectives of Agriculture Policy)- राष्ट्रीय कृषि नीति के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित है- 
(1) कृषि क्षेत्र में 49% प्रतिवर्ष से अधिक संवृद्धि दर प्राप्त करना।
(2) ऐसा कृषि विकास सुनिश्चित करना जो संसाधनों का कुशल प्रयोग कर सके तथा हमारे भूमि, जल एवं जैव-विविधता की रक्षा कर सके।
(3) विकास के साथ-साथ समानता अर्थात् ऐसा विकास जो सभी क्षेत्रों में और सभी किसानों को लाभान्वित कर सके। 
(4) विकास माँग से प्रेरित हो तथा घरेलू बाजारों की आवश्यकता को पूर्ण करने के साथ-साथ आर्थिक उदारीकरण एवं भूमण्डलीकरण से उत्पन्न कृषि निर्यातों के समक्ष आने वाली चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना करते हुए अधिकाधिक लाभ प्राप्त कर सके।
(5) विकास तकनीकी रूप से, पर्यावरण सुधार के रूप से तथा आर्थिक रूप से धारणीय हो।

राष्ट्रीय कृषि विकास योजना

राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के अन्तर्गत निम्नलिखित क्षेत्रों पर विशेष रूप से ध्यान दिया जा रहा है-
(1) प्रमुख खाद्य फसलों जैसे- गेहूँ, धान, मोटे अनाज, दलहन, तिलहन का समेकित विकास, 
(2) कृषि का यंत्रीकरण,
3) मृदा स्वास्थ्य को बढ़ावा देने से सम्बन्धित क्रियाकलाप, 
(4) वर्षा सिंचित कृषि प्रणाली का विकास और पनधारा से बाहर के क्षेत्रों का समेकित विकास,
(5) राज्य बीज फार्मों को सहायता, 
(6) समेकित कृषि प्रबन्धन,
(7) गैर फार्म कार्यकलापों को बढ़ावा,
(8) मण्डी अवसंरचना और विपणन विकास का सुदृढ़ीकरण, 
(9) बागवानी उत्पादन को बढ़ावा देना और लघु सिंचाई प्रणाली को लोकप्रिय बनाने से सम्बंधित क्रियाकलाप, 
(10) पशुपालन और मत्स्य विकास कार्यक्रम,
(11) भूमि सुधार के लाभार्थियों के लिए विशिष्ट योजनाएँ, 
(12) कृषि तथा बागवानी को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकारी संस्थाओं को अनुदान सहायता, 
(13) जैविक और जैव उर्वरक ।

मुद्रा (CURRENCY)

मुद्रा का अर्थ एवं परिभाषाएँ Meaning and Definitions of Currency) – करेंसी शब्द सेटिंग भाषा के रेस से बया है जिसका इसलिए करेन्सी के लिए मुद्दा शब्द का भी उपयोग किया जाता है। प्राचीन समय में नान में एक देवी भी जिसका नाम जूम था। मोनेटा इसकी देवी जूनों का दूसरा नाम है। विश्व सर्व सिक्के दाने का काम इसी देवी के मन्दिर से शुरू हुआ था। दूसरे शब्दों में हम कह सकते है कि. गुवा यह वस्तु है जो मूल्यों का मापन, विनिमय का माध्यम एवं मूल्यों का एवं उसके साधन के रूप में स्वीकार की जाती है तथा जिसे सरकारी संरक्षण प्राप्त होता है। अन्य शब्दों में, वे सभी वस्तुएँ जो केन्द्र सरकार द्वारा मुद्रा घोषित कर दी जाती है, कहलाती है। मुद्रा के अर्थ को और अधिक स्पष्ट करने के लिए मुद्रा की कुछ परिभाषाएं दी जा रही है जो निम्नलिखित है-
बाकर के अनुसार, मुदा यह है जो मुद्रा का कार्य करे।

डॉ. मार्शल के अनुसार, मुद्रा में वे सब वस्तुएँ शामिल हैं जो किसी भी समय एवं स्थान पर बिना संदेह और बिना किसी जाँच के अन्य वस्तुओं एवं सेवाओं को खरीदने और व्यापारिक दायित्वों को चुकाने के साधन के रूप में प्रचलित है।
राबर्दसन के शब्दों में, कोई भी वस्तु जो वस्तुओं के बदले भुगतान के रूप में या अन्य व्यापारिक दायित्वों के लिए स्वीकार की जाए. मुद्रा कहलाती है।”

अच्छी मुदा के प्रचलन से बाहर होने के कारण (Reasons of Good Currency being Out of Circulation) – अच्छी मुद्रा के प्रचलन से बाहर होने के कारण निम्नलिखित 8-
1) लोग अच्छी मुद्रा का संग्रह कर लेते है।
(2) लोग अन्य आभूषण बनाने के लिए मिला लेते हैं।
(3) लोगो का निर्यात कर देते हैं। 
(4) अच्छी मुद्रा का समान होता है इसीलिए लोग इन्हें अपने पास रख लेते हैं।

मुद्रास्फीति (INFLATION) 

मुद्रास्फीति के प्रकार (Types of Inflation) – मुद्रास्फीति कई प्रकार की होती है जो निम्नलिखित है- 

(1) आंशिक मुद्रास्फीति (Partial Inflation)—-जब मुद्रास्फीति की वृद्धि दर इतनी कम हो कि लम्बी अवधि के पश्चात् उसमें थोड़ा परिवर्तन आए तो इस प्रकार की मुद्रास्फीति आंशिक मुद्रास्फीति कहलाती है। ऐसी स्थिति विकसित देशों में होती है।

(2) पूर्ण मुद्रास्फीति (Full Inflation)- जब मुद्रास्फीति की दर इतनी अधिक हो कि वर्तमान में प्रचलित मुद्रा से लोगों का विश्वास उठने लगे तो इस प्रकार की मुद्रास्फीति पूर्ण मुद्रास्फीति कहलाती है।

(3) रेंगती या चलती हुई मुद्रास्फीति (Galloping Inflation)- यह पूर्ण मुद्रास्फीति एवं आशिक मुद्रास्फीति के बीच की स्थिति होती है। ऐसी स्थिति में मुद्रास्फीति की दर मात्र 2-3 अंकीय ही होती है।

(4) स्क्यूफ्लेशन ( Squiflation)– जब अर्थव्यवस्था में मुद्रा संकुचन (Deflation) एवं मुद्रास्फीति (Inflation) की स्थिति एक साथ उत्पन्न होती है तो यह स्थिति स्क्यूफ्लेशन कहलाती है।

मुद्रा अपस्फीति के कारण (Causes of Disinflation) 
मुद्रा अपस्फीति के कारण निम्नलिखित हैं-

(1) माँग प्रेरित स्फीति-मुद्रा अपस्फीति का सबसे बड़ा कारण किसी वस्तु की पूर्ति की तुलना में उसकी माँग में अधिक वृद्धि है। इसे सामान्य स्तर पर लाने के लिए मुद्रा की मात्रा में कमी की जाती है।

(2) पूर्ति में कमी – मुद्रा की पूर्ति में कमी करने से भी मुद्रा अपस्फीति की स्थिति उत्पन्न होती है। इसका सबसे बड़ा कारण प्राकृतिक आपदाएँ हैं।

(3) लागत में वृद्धि-वस्तु लागत में वृद्धि होने से भी मुद्रा अपस्फीति की स्थिति उत्पन्न होती है। इसका कारण मध्यवर्ती वस्तुओं पर अधिक कर आरोपित करके, परोक्ष करारोपण की दरों में वृद्धि, वस्तु की उत्पादन लागत में वृद्धि करता है।

(4) वैश्वीकरण – मुद्रा अपस्फीति का सबसे बड़ा कारण वैश्वीकरण (Globalisation) भी है क्योंकि कोई भी अर्थव्यवस्था जितनी अधिक खुली अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ती है, विश्व के अन्य देशों में होने वाली आर्थिक क्रियाओं तथा आर्थिक विकास सम्बन्धी व्यवहार का प्रभाव उस देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।

मुद्रा का अवमूल्यन एवं भारत की मौद्रिक नीति (DEVALUATION OF CURRENCY & MONETARY POLICY OF INDIA)

मुद्रा अवमूल्यन का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definitions of Devaluation of Currency) – जब कोई देश दूसरे देश की तुलना में अपने देश की मुद्रा का मूल्य कम कर देता है तो इस प्रकार की स्थिति मुद्रा अवमूल्यन कहलाती है। दूसरे शब्दों में जब कोई देश अपनी मुद्रा के बदले देश की पहले से कम मुद्रा मूल्य लेने को तैयार हो जाता है तो इस प्रकार की स्थिति मुद्रा अवमूल्यन कहलाती है। उदाहरण के लिए, माना भारत के 80 रुपए 45 अमरीकी डॉलर के बराबर हैं। यदि किसी कारण से भारत सरकार 80 रुपए की विनिमय दर 55 ऑलर कर दे तो इसे रुपयों का डालर में अवमूल्यन कहते हैं।

डॉ. गांगुली के शब्दों में ‘अवमूल्यन का अभिप्राय देश के मुद्रा के वाह्य मूल्य में कमी कर देना है।

पॉल एजिंग के शब्दों में, ‘अवमूल्यन से अभिप्राय चलन की अधिकृति समताओं में कमी से होता है।”

भारत में मौद्रिक नीति के उद्देश्य (Objectives of Monetary Policy in India) 

भारतीय मौद्रिक नीति का मुख्य उद्देश्य भारत की अर्थ व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाना एवं उसमें स्थायित्व बनाए रखना है जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था सुचारु रूप से चल सके। भारत में पूँजी और तकनीकी के अभाव के कारण आर्थिक साधन निष्क्रिय पसे रहते हैं। इनके सामने समस्या यह है कि किस प्रकार अर्थव्यवस्था में व्याप्त अदृश्य बेरोजगारी को दूर किया जाए। भारत में मौद्रिक नीति के उद्देश्य निम्नलिखित है-

(1) आर्थिक विकास को प्रोत्साहन – भारत में पूँजी निर्माण की स्थिति अच्छी नहीं है। इसके निर्माण एवं आर्थिक विकास को सुधारने के लिए भारत में मौद्रिक नीति बनाई गई। इससे भारत के आर्थिक तन्त्र को प्रोत्साहन मिला और इसके साथ-साथ पूँजी का निर्माण भी हुआ। पूँजी के निर्माण के लिए बचत, वित्तीय क्रियाशीलता एवं विनियोग का होना अत्यन्त आवश्यक है। इसके बिना पूँजी निर्माण सम्भव नहीं है।

(2) वित्तीय प्रबन्ध करना-मौद्रिक नीति बनाए जाने के कारण भारत की आर्थिक स्थिति मजबूत हो गई और देश प्रगति की ओर अग्रसर हो गया। मौद्रिक नीति के कारण ही वित्तीय प्रबन्धन को भी प्रोत्साहन मिला।

(3) आर्थिक असमानताओं को कम करना – भारत में मौद्रिक नीति बनाए जाने से काफी हद तक इसकी आर्थिक असमानताएँ कम हो गई और देश की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो गई।

(4) ऋण प्रबन्धन– भारत में मौद्रिक नीति का सबसे बड़ा कार्य सार्वजनिक ऋण का प्रबन्धन करना था। इससे बड़े-बड़े उद्योगों का विकास हुआ और देश प्रगति की ओर अग्रसर हो गया।

औद्योगीकरण से  लाभ (Benefits of  Industrialisation)

औद्योगीकरण से निम्नलिखित लाभ हैं- 
(1) औद्योगीकरण से उर्वरक मशीनरी आदि की आपूर्ति में सुधार होता है।
(2) इसके द्वारा रोजगार में वृद्धि होती है। कृषि पर जनसंख्या का दबाव कम होता है तथा कृषि उत्पादन एवं उत्पादकता में वृद्धि होती है।
(3) औद्योगीकरण से शहरीकरण को बढ़ावा मिलता है तथा ग्रामीण जनसंख्या का शहरों की ओर प्रस्थान होता है तथा इन्हें रोजगार के अवसर उपलब्ध होते हैं।
(4) औद्योगीकरण से ग्रामीणों की आय में वृद्धि तथा उनके रहन-सहन में वृद्धि होती है साथ ही उनके दृष्टिकोण में परिवर्तन होता है।
(5) वस्तुओं एवं सेवाओं के उत्पादन में वृद्धि से निर्यात में वृद्धि होती है। इसके द्वारा देश की आर्थिक स्थिति में सुधार होता है।

बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से लाभ (Benefits of Multinational Companies) –

बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से निम्नलिखित लाभ है-

(1) औद्योगीकरण में सहायक (Helpful in Industrialisation)- बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अपने देश के साथ-साथ अन्य देशों में उद्योगों की स्थापना करती हैं, इससे औद्योगिक विकास होता है।

(2) साधनों का विदोहन (Exploitation of Resources)- बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अपनी क्रियाओं के सम्पादन के लिए विनियोजित पूँजी की सहायता से संसाधनों का विदोहन करती हैं। उदाहरण के लिए भारत में खनिज तेलों की खोज में इसकी अहम् भूमिका है।

(3) रोजगार का सृजन (Employment Creation)—इन कम्पनियों में कार्य करने के लिए अधिक मानव संसाधनों की आवश्यकता होती है। इस प्रकार ये कम्पनियाँ बहुत से बेरोजगारों को रोजगार प्रदान करती हैं।

(4) सेवाएँ प्रदान करना (Providing Services) – बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ विभिन्न वस्तुएँ एवं सेवाएँ आम नागरिकों को प्रदान करती हैं। इनका उत्पादन कर यह लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति करती हैं।

(5) शोध एवं विकास (Research and Development)- बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अपने उत्पाद एवं सेवाओं पर समय-समय पर शोध करती रहती हैं। इसके द्वारा लोगों को उन्नतिशील एवं सस्ती वस्तुएँ एवं सेवाएं प्रदान करने में सक्षम होती हैं। इसके द्वारा अल्पविकसित देशों के औद्योगीकरण में भी सहायता मिलती है।

(6) विपणन (Marketing) – बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ विपणन के माध्यम से अपने आयात एवं निर्यात में वृद्धि करती हैं। इससे देश की आर्थिक विकास में सहायता मिलती है।

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