मृदा क्या है और मृदा की विशेषताएं (Mrida kya hai aur mrida ki visheshtayen)

राहुल अपने दादा के साथ बगीचे में टहलने गई वहाँ उसने देखा कि पेड़-पौधों के नीचे मिट्टी के छोटे-छोटे ढेर लगे हैं तथा क्यारियों में कोमल मिट्टी है तथा मैदान में कठोर मिट्टी है। मृदा क्या है और मृदा की विशेषताएं (Mrida kya hai aur mrida ki visheshtayen) उसने अपने दादा से उभरी हुई आकृतियों के बारे में चर्चा की, उत्तर देते हुए दादा ने कहा कि यह सब मिट्टी ही है। इस पर मीनू ने बगीचे, तालाब, खेल के मैदान, खेत आदि स्थानों की मिट्टी के बारे में चर्चा की तो उसके दादा ने मिट्टी के बारे में उसकी जिज्ञासा को
मृदा क्या है और मृदा की विशेषताएं (Mrida kya hai aur mrida ki visheshtayen)

जानकर उसे मिट्टी या मृदा के बारे में विस्तार से समझाते हुए बताया कि मृदा (मिट्टी) सबसे महत्वपूर्ण संसाधनों में से एक है। यह पादपों की जड़ों को दृढ़ता से जकड़े रखती है तथा उन्हें जल और पोषक तत्वों की आपूर्ति करके उनकी वृद्धि में सहायता करती हैं। यह अनेक जीवों का आवास है। कृषि के लिये मृदा अनिवार्य है क्योंकि? इससे हमें भोजन, कपड़ा और आवास प्राप्त होता है। अतः मृदा हमारे जीवन का अभिन्न अंग है तथा यह एक ऐसा पदार्थ
है जो पृथ्वी की सतह को बनाता है। “मृदा के अध्ययन को मृदा विज्ञान या पेडोलॉगी कहते हैं।”
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मृदा के स्रोत:-

वर्षा के दिनों में केचुयें को मिट्टी में से बाहर आते देखा होगा। क्या कभी विचार किया कि मिट्टी के अन्दर जीव भी रहते हैं? आइये हम पता लगाते हैं।

मृदा के प्रकार :-

जैसा कि आप जानते हैं, शैलों के अपक्षय से विभिन्न पदार्थों के छोटे-छोटे कण निर्मित होते हैं। इनमें बालू और चिकनी मिट्टी (क्ले) सम्मिलित हैं। किसी मृदा में बालू और चिकनी मिट्टी का अनुपात उस मूल शैल पर निर्भर करता है। जिससे उसके कण बने हैं। शैल कणों और ह्यूमस का मिश्रण, ‘मृदा’ कहलाता है। जीवाणु जैसे-बैक्टीरिया, पादप मूल और केंचुए जैसे जीव भी मृदा के महत्त्वपूर्ण अंग होते हैं।
मृदा को उसमें पाये जाने वाले विभिन्न आमाप (साइज) के कणों के अनुपात के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है। यदि मृदा में बड़े कणों का आकार अधिक होता है तो वह बुलई मृदा कहलाती है । यदि बड़े और छोटे कणों की मात्रा लगभग समान होती है, तो यह दोमट मिट्टी कहलाती है। अतः मृदा का वर्गीकरण बलुई दोमट और मृण्मय के रूप में किया जाता है
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पादपों को उगाने के लिये सबसे अच्छी मृदा दोमट है। दोमट मिट्टी, बालू, चिकनी मिट्टी और गाद आदि अनेक प्रकार के मृदा कणों का मिश्रण होती है। गाद, नदी तलों में निक्षेप के रूप में पायी जाती है। गाद कणों का मृदा क्या है और मृदा की विशेषताएं (Mrida kya hai aur mrida ki visheshtayen)
आमाप बालू और चिकनी मिट्टी के आमापों के बीच का होता है। दोमद मृदा (loam soil) में भी ह्यूमस (Humas) होती है। इस प्रकार की मृदा में पादपों की वृद्धि के लिए उचित मात्रा में जल धारण क्षमता होती है।
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मृदा के गुण

आपने मृदा के कुछ उपयोगों के बारे में जानकारी की है आइये अब हम मृदा के गुणों को जानने के लिए कुछ क्रियाकलाप करें।

मृदा में जल अंत: स्रवणदरः-

आप 50×50से0मी0 के दो वर्ग बनाइये एक वर्ग घर की चिकनी फर्श पर दूसरा घर के बाहर कच्ची सड़क पर। दो समान आमाप वाली बोतलों में समान ऊँचाई तक पानी भरिये, दोनों वर्ग स्थानों पर एक-एक बोतल पानी डालिये। आप देखेंगे कि फर्श पर डाला गया पानी वर्ग की सीमा के बाहर बहकर चला गया और अवशोषित नहीं हो पाया। जबकि कच्ची सड़क पर डाला गया पानी नहीं बह पाया और अवशोषित हो गया। आपने देखा कि दोनों वर्गों में पानी के अवशोषण में अंतर था । ऐसा क्यों हुआ इसे समझने के लिये आइये एक क्रियाकलाप करें।
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मृदा में नमी:-

क्या आप कभी ग्रीष्मकाल में किसी गर्म दिन की दोपहर में किसी खेत या खुले मैदान से होकर गुजरे हैं? आपने देखा होगा कि जमीन के ऊपर की वायु कंपदीप्त हो रही है। अर्थात ऐसा लगता है जैसे गर्म वायु ऊपर उठ रहीं है मानों, आग का अलाव जल रहा हो। ऐसा क्यों होता है? यह जानने के लिये एक क्रियाकलाप
करें।

मृदा अपरदन:-

आपने तेज हवा, वर्षा, बाढ़ के समय मिट्टी को एक स्थान से दूसरे तक जाते हुए देखा होगा। ऐसा क्यों होता है। आइये इसे एक क्रियाकलाप से जानें।
दो छिछले बाक्स लें। प्रत्येक बॉक्स में एक तरफ एक निकास नली लगा दें। एक बक्से को खाली मिट्टी से भरें तथा दूसरे बॉक्स को घास युक्त मिट्टी से भरें। मिट्टी की मात्रा को नली की तरफ ढाल देकर फैलायें। दोनों बॉक्सों में फब्बारों से धीरे-धीरे समान मात्रा में जल डालें। जल निकास नली से बाहर आने लगे तो उसे अलग-अलग बरतनों में इकट्ठा होने दें। दोनों बरतनों में इकट्ठा हुए जल का अवलोकन मृदा क्या है और मृदा की विशेषताएं (Mrida kya hai aur mrida ki visheshtayen)
करिये। दोनों बरतनों के जल में क्या अन्तर दिखाई देता है?
घास विहीन बक्से की निकास नली से निकली जल तथा मिट्टी की मात्रा अधिक है। घास सहित बक्से निकास नली से निकली जल की मात्रा कम है तथा उसमें मिट्टी की मात्रा भी बहुत कम बहकर इकट्ठा है। इस प्रकार स्पष्ट है कि पेड़-पौधों की जड़े मिट्टी को बाँधकर रखती है तथा जल के वेग को भी कम नी हैं। इससे भूमि का कटाव नहीं होता है।
मृदा के एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचने अथवा मूल स्थान से हट जाने को मृदा अपरदन कहते हैं। ” मृदा अपरदन तेज हवा (आँधी/ तूफान ) एवं वर्षा के जल के तेज कटाव के कारण होता है।
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मृदा और फसलें:-

भारत के विभिन्न क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न प्रकार की मृदा पाई। जाती है। कुछ क्षेत्रों में मृण्मय मृदा, कुछ में दोमट मिट्टी तथा कुछ क्षेत्रों में बलुई मिट्टी पाई जाती है।
पवन, वर्षा, ताप, प्रकाश और आर्द्रता द्वारा मृदा प्रभावित होती है। ये कुछ जल वायवी कारक है, जो मृदा परिच्छेदिका को प्रभावित करते हैं और मृदा संरचना में परिवर्तन लाते हैं। जलवायवी कारक तथा मृदा के घटक सम्मिलित रूप से किसी क्षेत्र विशेष में उगने वाली वनस्पति तथा फसलों की किस्मों का निर्धारण करते हैं।
मृण्मय और दुमटी मृदा दोनों ही गेहूँ और चने जैसी फसलों की खेती के लिये उपयुक्त होती है। 
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ऐसी हा गहू आर वन जसा फसला का ता बाकी जल धारण क्षमता अच्छी होती है धान के लिये मृत्तिका एवं जैव पदार्थ से समृद्ध तथा अच्छी जल रण क्षमता वाली मृदा आदर्श होती है। मसूर और अन्य दालों के लिये दोमट मिट्टी की आवश्यकता होती जिनमें से जल की निकासी आसानी से हो जाती है। कपास के लिए, बलुई दोमट या दोमट मिट्टी उपयुक्त है। जिसमें से जल की निकासी आसानी से हो जाती है और जो पर्याप्त परिमाण में वायु को धारण करती गेहूँ जैसी फसलें महीन मृण्मय मिट्टी में उगायी जाती हैं क्योंकि वह ह्यूमस से समृद्ध और अत्यधिक उर्वर है। अपने माता-पिता या आस-पास मौजूद किसानों से चर्चा करके निम्नलिखित सारणी पूर्ण करिये कि किस मिट्टी मे कौन सी फसल उगाई जाती है 

मृदा प्रदूषणः-

क्या आप जानते हैं कि किसान फसलों से अधिक उपज प्राप्त करने के लिए तथा फसल की सुरक्षा करने के लिए क्या करता है?
किसान फसलों की अधिक उपज प्राप्त करने के लिये उवर्रक (खाद ) का प्रयोग करता है तथा फसल की सुरक्षा के लिए कीटनाशकों का प्रयोग करता है।
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हम अपने कपड़े साफ करने के लिए साबुन, डिटरजेन्ट टिकिया, डिटरजेन्ट पाउडर का प्रयोग करते हैं। यह डिटरजेन्ट पाउडर पालीथीन की पतली झिल्ली या पन्नी में बन्द रहते हैं।
आपके पिताजी बाजार से घरेलू सामान या खाद्य पदार्थ भी पालीथीन में ही पैक किये जाते हैं। सब्जियाँ भी पालीथीन में ही लाते हैं तथा बाजार के पैक्ट क्या आपको पता है कि यह उर्वरक, कीटनाशक, डिटरजेंट, पालीथीन कहाँ जाते हैं? इन सभी पदार्थो जमाव निरन्तर मिट्टी में ही होता है और इनका अपघटन भी शीघ्र नहीं होता है। यह मिट्टी में पड़कर सकी उर्वरा शक्ति को नष्ट कर देते हैं। “अतः हम कह सकते हैं कि उर्वरक, कीटनाशक, डिटरजेंट, लीथीन आदि से मृदा प्रदूषित होती है” ।मृदा क्या है और मृदा की विशेषताएं (Mrida kya hai aur mrida ki visheshtayen)
इन पदार्थों का प्रयोग कम से कम करना चाहिये। इसी प्रकार अत्यधिक रासायनिक उर्वरक जैसे – यूरिया, पोटैशियम नाइट्रेट आदि भी मिट्टी को नुकसान पहुँचाते है। इससे भूमि उपजाऊ नहीं होती है। पदार्थों के सड़ने तथा गन्दे पानी के रूकने से भी मृदा प्रदूषण होता है।
मृदा प्रदूषण से बचने के लिए हमें घर के सामने की नालियों में कूड़ा, कचरा एवं सड़े-गले पदार्थ एवं
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छिलके नहीं डालने चाहिये। हमें बाजार से घरेलू सामान, फल एवं सब्जियाँ कपड़े के थैले में लानी चाहिए तथा पालीथीन का प्रयोग नहीं करना चाहिए। किसानों को जैविक कृषि जैसे- पटसन / खली की खाद, केंचुए की खाद का प्रयोग करना चाहिये । कीड़ों से बचने के लिये कीटनाशक का कम से कम प्रयोग करना चाहिये। कपड़ा आदि धोने के लिए कम क्षारीय पाउडर का प्रयोग करना चाहिए।

 ऊसर भूमि:-

आपने अपने आस-पास या खेतों में ऐसी मिट्टी देखी होगी जिसमें फसल नहीं पैदा होती है तथा यह नट्टी ऊपरी परत पर सफेद चूना जैसी या भूरे रंग की दिखायी देती है इसे ऊसर मिट्टी या बंजर भूमि कहते ■ आइये जाने ऊसर या बंजर भूमि क्या है? ऊसर या बंजर भूमि वह भूमि है जिसमें लवणों की अधिकता हो नी भूमि में बहुत कम या बिल्कुल उत्पादन नहीं होता है। ऊसर भूमि बनने के निम्नलिखित कारण हैं- 
1.जल भराव या जल निकास की समुचित व्यवस्था का न होना।
2.कम वर्षा व तापमान का अधिक होना।
3.भूमिगत जल का ऊँचा होना।
4.हरी क्षेत्रों में जल रिसाव होना।
5.वृक्षों की अन्धाधुन्ध कटाई ।
6.भूमि को परती छोड़े रहना।
7.भूमि में आवश्यकता से अधिक रसायनों का प्रयोग करना ।

ऊसर भूमि सुधार के उपाय :-

ऊसर भूमि सुधार करने की क्रमबद्ध एवं समयबद्ध प्रणाली निम्नवत् है:-
1.बेहतर जल प्रबन्ध एवं समुचित जल निकासी की व्यवस्था करनी चाहिए।
2.खेत की मेड़बन्दी करनी चाहिए।
3.खेत की समय-समय पर जुताई करनी चाहिए।
4.खेत को क्यारियों में बाँटकर समतलीकरण करना चाहिए।
5.जिप्सम का प्रयोग करना चाहिए। जिप्सम के अलावा पायराइट, फास्फोजिप्सम, गन्धक के अम्ल का प्रयोग करना चाहिए।
मृदा क्या है और मृदा की विशेषताएं (Mrida kya hai aur mrida ki visheshtayen)
6.कार्बनिक पदार्थ जैसे- शीरा, धान का पुआल, धान की भूसी, बालू जलकुम्भी, कच्चा गोबर कम्पोस्ट की खाद, वर्मी कम्पोस्ट आदि का प्रयोग करना चाहिए।
7.अन्य पदार्थों जैसे ढैचा, धान, चुकन्दर, पालक, गन्ना, देशी बबूल, आँवला आदि बोना चाहिए।

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