मौलिक अधिकारों का महत्व और अनेक मौलिक अधिकारों का वर्णन

 वे अधिकार जो मानव जीवन के लिए मौलिक तथा आवश्यक हैं त संविधान द्वारा नागरिकों को प्रदान किये जाते हैं, मौलिक अधिकार कहलाते हैं। अधिकारों का व्यवस्थापिका एवं कार्यपालिका द्वारा भी उल्लंघन नहीं किया जा सकता है । यदि इनके द्वारा कोई ऐसा कार्य किया जाता है जिससे संविधान में उल्लिखित अधिकारों का उल्लंघन होता है, तो न्यायपालिका उनके ऐसे कार्यों को असंवैधानिक घोषित कर सकती है।

मौलिक अधिकारों का महत्व और अनेक मौलिक अधिकारों का वर्णन

इन जी. एन. सी. जोशी के अनुसार, “मौलिक अधिकार एक ऐसा साधन है। जिसके द्वारा एक स्वतन्त्र लोक राज्य के नागरिक अपने सामाजिक, धार्मिक तथा नागरिक जीवन का आनन्द ले सकते हैं। इसके अभाव में लोकतान्त्रिक शासन सफलतापूर्वक नहीं चल सकता तथा बहुमत की ओर से ही अत्याचारों का खतरा बना रहता है।”

मौलिक अधिकार

भारतीय नागरिकों को निम्नलिखित मौलिक अधिकार-

1-समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14 से 18 तक) 

समानता का अर्थ यह है कि प्रत्येक भारतीय नाग का अधिकार प्राप्त है तथा किसी भी आधार पर किस जायेगा। भारतीय नागरिकों को निम्नलिखित समानताएँ प्राप्त हैं ।

(i) कानून के क्षेत्र में समानता (अनुच्छेद 14)- सभी नागरिकों को समान अधिकार दिये गये हैं।

(ii) सार्वजनिक स्थानों के उपभोग में समानता (अनुच्छेद 15) – संविधान में यह स्पष्ट लिखा है कि सार्वजनिक स्थानों; जैसे-तालाब, नहरों, पार्कों आदि सभी का नागरिक बिना किसी भेदभाव के उपभोग करने के समान अधिकारी हैं।

(iii) सरकारी नौकरियों में समानता (अनुच्छेद 16)— सरकारी नौकरियों में नियुक्ति के समय किसी के साथ धर्म, लिंग, जाति आदि के आधार पर भेदभाव यहाँ किया जायेगा और नियुक्ति या पदोन्नति का आधार केवल योग्यता को माना जोयगा ।

(iv) अस्पृश्यता का अन्त (अनुच्छेद 17)—पिछड़ी जाति के उत्थान और उनमें स्वाभिमान की भावना जगाने तथा उनका विकास करने के उद्देश्य से अस्पृश्यता को अपराध घोषित किया गया है।

(v) उपाधियों का अन्त (अनुच्छेद 18)– व्यक्तियों में पारस्परिक भेदभाव, ऊँच-नीच की भावना को समाप्त कर समाज में समानता स्थापित करने के उद्देश्य से संविधान में अंग्रेजी शासन द्वारा दी जाने वाली सभी उपाधियों को निरस्त कर दिया गया है, अब केवल शैक्षिक और सैनिक उपाधियाँ ही दी जाती हैं।

अपवाद– उपर्युक्त क्षेत्रों में समानता का अधिकार लागू किया गया है, फिर भी मानव हितों और उनके उत्थान को ध्यान में रखते हुए सरकार कुछ क्षेत्रों में इन नियमों की अवहेलना भी कर सकते हैं। उदाहरणार्थ-अनुच्छेद 16 (4) के द्वारा सरकारी सेवाओं में अनुसूचित जातियों, जनजातियों एवं अन्य पिछड़ी जातियों के लिए पदों के आरक्षण की व्यवस्था की गयी है।

2.स्वतन्त्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19 से 22 तक)

प्रत्येक नागरिक अपनी सामर्थ्य और योग्यता के अनुसार अपना विकास कर सके, इसके लिए स्वतन्त्रता के अधिकार को संविधान में सम्मिलित किया गया है। इस मूल अधिकार के अन्तर्गत प्रत्येक भारतीय नागरिक को निम्न स्वतन्त्रताएँ प्रदान की गयी हैं- 

(अ) अनुच्छेद 19 के अन्तर्गत, इस अधिकार से सम्बन्धित निम्न छह स्वतन्त्रताएँ नागरिकों को प्राप्त हैं-

(i) संविधान द्वारा प्रत्येक व्यक्ति को भाषण के रूप में अपने विचार व्यक्त करने एवं उन्हें पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित कराने की स्वतन्त्रता दी गयी है। 

(ii) नागरिकों को शान्तिपूर्वक सभा आदि करने की भी स्वतन्त्रता प्रदान की गयी है

(iii) प्रत्येक व्यक्ति व्यक्ति अपनी इच्छानुसार व्यवसाय करने के लिए स्वतन्त्र है। 

(iv) नागरिकों को मानव हितों के लिए समुदायों अथवा संघ निर्माण की स्वतन्त्रता है।

(v) नागरिकों को देश की सीमाओं के अंदर स्वतन्त्रतापूर्वक एक स्थान से दूसरे स्थान पर भ्रमण की पूर्ण स्वतन्त्रता प्रदान की गयी है।

(vi) प्रत्येक व्यक्ति को इस बात की स्वतन्त्रता दी गयी है कि वह अपनी स्थिति के अनुसार किसी भी स्थान पर अपनी इच्छानुसार रह सकता है।

(ब) अपराधों की दोषसिद्धि के सम्बन्ध में संरक्षण-अनुच्छेद 20 के अनुसार 

(क) किसी व्यक्ति को उस समय तक दण्ड नहीं दिया जा सकता है, जब तक उसने किसी प्रचलित कानून का उल्लंघन न किया हो 

(ख) उसे अपने विरुद्ध गवाही देने के लिए किसी भी प्रकार से बाध्य नहीं किया जा सकता है।

(स) जीवन और शरीर-रक्षण का अधिकार अनुच्छेद 21 क अनुसार किसी व्यक्ति की प्राण अथवा दैहिक स्वतन्त्रता को केवल विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया को छोड़कर अन्य किसी प्रकार से बाधित नहीं किया जायेगा।

(द) बन्दीकरण के संरक्षण की स्वतन्त्रता – अनुच्छेद 22 के अनुसार-

(क) प्रत्येक बंदी को बंदी होने का कारण जानने का अधिकार दिया गया है तथा 

(ख) किसी को बंदी बनाने के बाद उसे 24 घण्टे के अंदर ही किसी न्यायाधीश के समक्ष उपस्थित करना आवश्यक है।

अपवाद – नागरिकों की विचार अभिव्यक्ति को स्वतन्त्रता पर सरकार राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के मध्य मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों के हित में, लोक-व्यवस्था, शिष्टाचार अथवा सदाचार के हित में, न्यायालय अवमानना, मानहानि, अपराध के लिए उत्तेजित करना, भारत की प्रभुता एवं अखण्डता की दृष्टि में रखते हुए प्रतिबन्ध आरोपित किए जा सकते हैं। राज्यों के द्वारा सार्वजनिक सुरक्षा के हित में सम्मेलन करने के अधिकार को सीमित किया जा सकता है।

3. शोषण के विरुद्ध अधिकार ( अनुच्छेद 23 व 24 )

संविधान में अनुच्छेद 23 व 24 को सम्मिलित करने का उद्देश्य यह था कि कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति का शोषण न कर सके, अतः संविधान में ये घोषणा को गयी है—

(1) किसी व्यक्ति से बेगार और बलपूर्वक काम नहीं लिया जायेगा।

(2) 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों से खानों, कारखानों तथा अन्य ऐसे किन्हीं भी स्थानों पर कार्य नहीं कराया जायेगा, जिनका उनके स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़े।

(3) स्त्रियों व बच्चों का क्रय-विक्रय करना अपराध है। 

अपवाद—राज्य सार्वजनिक उद्देश्य से अनिवार्य श्रम की योजना लागू कर सकता है। लेकिन ऐसा करने में राज्य किसी भी व्यक्ति के साथ भेदभाव नहीं करेगा।

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