राष्ट्रकूट कौन थे ? उनका उपलब्धिया का वर्णन

 राष्ट्रकूट वंश के प्रमुख शासकों व उनकी सफलताओं का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है –

(1) दन्तिदुर्ग प्रथम —दन्तिदुर्ग प्रथम राष्ट्रकूट वंश का प्रथम शक्तिशाली सम्राट् था। डा. मजूमदार के अनुसार वह 710 ई. के लगभग शासक बना। एलोरा ताम्रपत्र-लेख में दन्तिदुर्ग की प्रारम्भिक तिथि 741742 ई. दी गयी है। इसके पिता का नाम इन्द्र प्रथम था तथा माता का नाम भवनागा था। उसने काँची के पल्लव राजा – देवराज व कलिंग नरेश श्रीशैव तथा टंक प्रदेश के राजाओं को पराजित किया था।। 

राष्ट्रकूट कौन थे ? उनका उपलब्धिया का वर्णन

चालुक्य सम्राट् कीर्तिवर्मन द्वितीय के पराजित करने के बाद उसने ‘परमभट्टारक पृथ्वी वल्लभ’ की उपाधि धारण की। वह ब्राह्मण धर्म का उपासक था तथा धर्म के प्रसार हेतु बहुत अधिक दान देता था। ऐसा विश्वास है कि दन्तिदुर्ग की मृत्यु 758 के लगभग हुई थी।

(2) कृष्ण प्रथम – दन्तिदुर्ग पुत्रहीन था, अतः उसकी मृत्यु के उपरान्त उसका चाचा कृष्ण प्रथम शासक बना। उसका शासन काल 758 ई. से 773 ई. तक था मत्य हुई। उसन उसने चालुक्य राजा कीर्ति को पराजित करके कर्नाटक से चालुक्य शक्ति का अंत कर दिया था। उसने गंगा राजा श्रीपुरुष, वेंगी के चालुक्य विष्णुवर्धन चतुर्थ तथा राहष्य नामक शासक को पराजित किया। उसने कर्नाटक, कोंकण तथा हैदराबाद आदि का अपने प्रदेश में विलय कर लिया था और एलोरा में एक विशाल कैलाश मन्दिर का निर्माण कराया था।

(3) गोविन्द द्वितीय—कृष्ण प्रथम की मृत्यु के उपरान्त गोविन्द द्वितीय राज अवसर का ल बना। उसने विष्णुवर्द्धन चतुर्थ को पराजित किया किन्तु राज्य का सम्पूर्ण दायित्व ध्रुव पर छोड़कर वह स्वयं भोग-विलास में लिप्त हो गया था, अतः अवसर पाकर ध्रुव ने तक शासन उसे पराजित कर सत्ता पर अधिकार कर लिया। उसका शासन काल (773 ई. से 78) संजन दानप ई.) के लगभग था।

(4) ध्रुव – ध्रुव ने 780 ई. में अपने बड़े भाई गोविन्द द्वितीय को हराकर सिंहासन एक महत्वप प्राप्त करके सर्वप्रथम गंगवाड़ी (मैसूर) के शासक शिवमार द्वितीय को हराकर उसके करते हुए राज्य पर अधिकार कर लिया। उसके उपरान्त उसने कन्नौज के पल्लव शासक साहित्य के दन्तिवर्मन को हराकर उसे अपने अधीन कर लिया।

ध्रुव ने उत्तरी भारत में उज्जैन के प्रतिहारों व बंगाल के पालों के मध्य संघर्षों में भाग लिया और उत्तरी भारत को राजनीति में हस्तक्षेप किया, उसका प्रतिहार राजा वत्स से भी संघर्ष हुआ जिसमें ध्रुव की विजय हुई। इसके उपरांत ध्रुव का पाल नरेश धर्मपाल से युद्ध हुआ तथा उसने धर्मपाल को हराकर उसके राज्य को छीन लिया। उत्तरी भारत की विजय से उसे केवल यश की प्राप्ति हुई, क्योंकि उसने उत्तरी भारत के साम्राज्य को अपने साम्राज्य में मिलाया। 793 ई. के आस-पास ध्रुव की मृत्यु हो गयी थी। ध्रुव राष्ट्रकुट वंश का एक पराक्रमी शासक था, जिसने राष्ट्रकूटों की शक्ति एवं कीर्ति में अभूतपूर्व वृद्धि को थी।

(5) गोविन्द तृतीय– ध्रुव ने अपने चार पुत्रों— स्तम्भ, कर्क, गोविन्द एवं इन में से गोविन्द को ही अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था, अतः ध्रुव की मृत्यु उपरांत उसके बड़े पुत्र स्तम्भ ने उसके विरुद्ध विद्रोह कर दिया। इस युद्ध में गोविन्द की विजय हुई, किन्तु गोविन्द ने अपने भाई को क्षमा करके उसे गंगवाड़ी का शासक नियुक्त कर दिया। गोविन्द तृतीय ने पल्लव नरेश दन्तिवर्मन बेंगी के चालुक्य नरेश विजयादित्य को पराजित किया था उसके उपरांत उत्तर भारत की राजनीति में हस्तक्षेप किया। उसका प्रतिहारों से भी संघर्ष हुआ, जिसमें उसकी विजय हुई थी। प्रतिहारों पर विजय प्राप्त करने के उपरान्त उसने उत्तरी भारत के समस्त राजाओं पर अपनी प्रभुता जमाकर उन्हें कर देने पर विवश कर दिया तथा पुनः दक्षिण की ओर लौट गया। मध्य भारत के समस्त राजाओं को राष्ट्रकूटों की अधीनता स्वीकार करने की विवश किया। भड़ौच के राजा को उसने नतमस्तक किया, 1814 ई. के लगभग गोविन्द तृतीय की मृत्यु हुई। उसने गंगवाड़ी व मालवा के प्रदेश को अपने साम्राज्य में मिलाया व हिमालय से लेकर कन्याकुमारी के मध्य अनेक राज्यों को पराजित किया। दक्षिण व उत्तरी भारत के राजाओं ने उसकी अधीनता स्वीकार कर ली थी। उसका शासन काल 793 से 814 ई. को स्वीकार किया जाता है।

(6) अमोघवर्ष-गोविन्द तृतीय की मृत्यु के उपरान्त उसका पुत्र अमोघवर्ष सिंहासन पर बैठा। अमोघवर्ष जिस समय गद्दी पर बैठा, वह अल्पायु का था, अतः अवसर का लाभ उठाकर उसने दरबार के एक वर्ग जिसका नेता वेंगी था, ने विद्रोह कर दिया। अमोघवर्ष का संघर्ष प्रतिहार शासक भोज से हुआ। यद्यपि अमोघवर्ष ने 64 राजा अवसर का लाभ उठाकर उसने दरबार के एक वर्ग जिसका नेता वेंगी था, ने विद्रोह कर ‘दिया। अमोघवर्ष का संघर्ष प्रतिहार शासक भोज से हुआ। यद्यपि अमोघवर्ष ने 64 वर्ष तक शासन किया, किन्तु सैनिक दृष्टि से उसका शासन कोई सफल शासन नहीं था। संजन दानपत्र अभिलेख में उसे वीर नारायण कहा गया है। उसकी तुलना इतिहास प्रसिद्ध शासक विक्रमादित्य से की गयी है।

सांस्कृतिक उन्नति की दृष्टि से यह काल एक महत्वपूर्ण काल अवश्य था। डॉ. अल्तेकर ने अमोघवर्ष के कार्यों का मूल्यांकन करते हुए लिखा है कि, “राज्य में शान्ति व व्यवस्था के पुनर्संस्थापक, कला एवं साहित्य के प्रेरक अपने सिद्धान्तों पर चलने वाले जनहित के लिए बलिदान में अपने शरीर का अंग देने से भी न चूकने वाले शासक के रूप में अमोघवर्ष का नाम अविस्मरणीय रहेगा।” अमोघवर्ष का शासन-काल 814 से 878 ई. तक था।

(7) कृष्ण द्वितीय -अमोघवर्ष की मृत्यु के उपरान्त इसका पुत्र कृष्ण द्वितीय 878 ई. में गद्दी पर एक बैठा। कृष्ण द्वितीय का प्रथम संघर्ष चालुक्यों से हुआ, इसमें उसे पराजित होना पड़ा। प्रतिहार राजा एक निर्बल शासक था। 914 ई. में कृष्ण द्वितीय की मृत्यु हो गयी।

(8) इन्द्र तृतीय– कृष्ण द्वितीय की मृत्यु के उपरान्त उसका पौत्र इन्द्र तृतीय 914 ई. में राजा बना, इसकी उपाधि नित्यवर्ष थी। उसने परमार वंश के राजा उपेन्द्र को पराजित किया तथा उत्तरी भारत पर आक्रमण करके उसने प्रतिहार वंश के शासक महीपाल को भी पराजित किया। 922 ई. के लगभग इन्द्र तृतीय की मृत्यु हो गयी।

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