वाचन एवं वाक्य शिक्षण – Wachan Avam Wakya Shikshad In Hindi

वाचन( Reading) 

वाचन का अर्थ एवं परिभाषा(Meaning and definition of reading) 

वाचन शब्द ‘वाक धातु से बना है जिसका अर्थ है शब्द, वाणी अथवा कथन। पाचन को हम दो रूपों (संकुचित एवं व्यापक) में बता सकते हैं। संकुचित रूप में लिखे हुए अथवा छपे हुए शब्दों का उच्चारण करना वाचन कहलाता है। वाचन का विस्तृत अर्थ है, ध्वनियों के प्रतीकों, लिपिबद्ध शब्दों को गति के साथ पढ़कर अर्थ ग्रहण की प्रक्रिया वाचन या पठन कहलाती है। भाषा सीखने के लिए चार कौशल पढ़ना लिखना, बोलना तथा सुनने की आवश्यकता होती है। जब इन चार कौशलों का विकास होता है तभी भाषा को पूर्ण माना जाता है। भाषा और साहित्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। भाषा से ही शाब्दिक अन्त किया होती है।

वाचन एवं वाक्य शिक्षण - Wachan Avm Wakya Shikshad In Hindi

कैथरीन ओकानर के अनुसार, ‘चाचन सीखने की वह जटिल प्रक्रिया है जिससे सुनने के गतिवाही माध्यमों का मानसिक पक्षों से सम्बन्ध होता है।

वाचन के प्रमुख उद्देश्य 

वाचन के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित है- 

(1) सरल एवं प्रभावशाली तरीको से वार्तालाप करने की क्षमता प्रदान करना।

(2) स्वाभाविक रूप से बालकों में बोलने की क्षमता उत्पन्न करना।

(3) किसी भी तथ्य या तथ्यों को क्रमानुसार स्पष्ट रूप से समायोजित कर प्रस्तुत करने की क्षमता प्रदान करना। 

(4) बालकों के व्यक्तित्व को विकसित करने के लिए उनकी झिझक व संकोच को दूर करना।

(5) प्रश्नों के उत्तरों को प्रभावोत्पादक स्वर एवं भाषा में देने की क्षमता विकसित करना।

(6) शब्दों के मूलभाव को समझकर उन्हें उचित स्थान पर प्रयोग करने की क्षमता विकसित करना एवं समय पर प्रयोग करना।

मौन वाचन(Silent Reading) 

मौन वाचन के उद्देश्य(Objectives of Silent Reading) 

मौन वाचन के उद्देश्य मौन वाचन के दो उद्देश्य इस प्रकार हैं- 

(1) ज्ञान(Knowledge) 

(i) विद्यार्थियों को लिपि का स्पष्ट ज्ञान कराना और उनके शब्द- – सूक्ति भण्डार में वृद्धि करना ।

(ii) विद्यार्थियों को वाक्य रचना का ज्ञान कराना और विभिन्न लेखन शैलियों से परिचित कराना। 

(iii) विद्यार्थियों को मानव जीवन के विभिन्न पहलुओं का सामान्य ज्ञान कराना।

(2) कौशल (Skill) 

(i) विद्यार्थियों को उचित आसन में बैठकर पूर्ण मनोयोग से पठन करने में प्रशिक्षित करना । 

(ii) विद्यार्थियों को अर्थ ग्रहण करते हुए तीव्र गति से मौन पठन करने का अभ्यास कराना। 

(iii) विद्यार्थियों में लिखित सामग्री का अर्थ एवं भाव समझने की योग्यता का विकास करना । 

(iv) विद्यार्थियों को लिखित सामग्री का विश्लेषण कर उसकी समीक्षा करने में निपुण करना ।

मौन वाचन का महत्त्व (Importance of silent Reading) 

‘भाषा-शिक्षण’ में मौन वाचन का महत्त्व बताते हुए जड़ महोदय ने कहा है, “कि जब बालक पैरों से चलना सीख जाता है घटनों के बल खिसकना छोड़ देता है ।

इस प्रकार भाषा के क्षेत्र में बालक जब मौन वाचन की कुशलता प्राप्त कर लेता है तो सस्वर वाचन का अधिक प्रयोग करना छोड़ देता है। मौन वाचन में निपुणता का आना व्यक्ति के विचारों की प्रौढ़ता का द्योतक है तथा भाषायी दक्षता पर अधिकार का सूचक है। इस परिभाषा के आधार पर मौन वाचन के महत्त्व को निम्नलिखित प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है-

(1) मौन वाचन में समय की भी बचत होती है। श्रीमती में रीस के एक परीक्षण से यह पता चलता है कि कक्षा छह के बालक एक मिनट में सस्वर वाचन में 170 शब्द बोलते हैं। और मौन वाचन में इतने ही समय में 210 शब्द बोलते हैं।

(2) मौन वाचन द्वारा एक छात्र दूसरे छात्र के वाचन में बाधा नहीं उपस्थित करता है। सामूहिक वाचन के लिए मौन ‘ वाचन सर्वोत्तम है।

(3) मौन वाचन के समय छात्र चिन्तन भी करता चलता है। उसका ध्यान केन्द्रित होता है। यह क्रिया सोद्देश्य होती है। सस्वर वाचन में छात्र का ध्यान उच्चारण पर अधिक रहता है। अतः कभी-कभी वह बिना अर्थ समझे ही पढ़ता जाता है।

(4) मौन वाचन द्वारा स्वाध्याय की आदत पड़ती है। स्वाध्याय में रुचि उत्पन्न होती है और छात्र वाचन द्वारा आनन्द प्राप्त करने का प्रयास करता है। आनन्द प्राप्त करने के लिए पढ़ना प्रायः मौन रूप में होता है।

(5) मौन वाचन में मितव्ययिता होने के कारण दैनिक जीवन में व्यक्ति इसी का अधिकाधिक प्रयोग करते हैं, जबकि सस्वर वाचन अधिकतर शालेय (पाठशाला) जीवन तक ही सीमित होता है।

(6) मौन वाचन में होंठ नहीं हिलना चाहिए तथा मुँह से किसी प्रकार की ध्वनि नहीं निकलनी चाहिए। केवल मस्तिष्क और नेत्रों द्वारा ही सम्पूर्ण क्रिया हो जानी चाहिए। कक्षा के मौन वाचन के अवसर पर अध्यापक को छात्रों के पठन का निरीक्षण करना चाहिए और यह देखना चाहिए कि छात्र मौन वाचन के स्थान पर फुसफुसा कर तो नहीं पढ़ रहे हैं, पंक्तियों पर ऊँगलियाँ तो नहीं फेर रहे हैं।

(7) प्रारम्भिक कक्षाओं में सस्वर वाचन जितना लाभकारी है, उच्च कक्षाओं में उससे कहीं लाभप्रद मौन वाचन है। हम शीघ्रतापूर्वक बिना किसी को असुविधा दिए कम समय में किसी वस्तु का भाव ग्रहण मौन वाचन से ही कर सकते हैं। इसमें श्रम करना पड़ता है। भावों की गहरी समझ के लिए गहन अध्ययन एवं मनन के लिए मौन वाचन का सहारा लेना पड़ता है।

मौन वाचन के प्रकार

मौन वाचन के प्रकार मौन वाचन का उद्देश्य एवं गति के आधार पर दो भेद किया जा सकता है- गहन / गम्भीर और द्रुत वाचन  इनका वर्णन निम्न प्रकार से हैं- 

(1) गहन / गम्भीर वाचन – किसी पाठ्य सामग्री को मौन रूप में, पूर्ण मनोयोग से, बड़े धैर्य के साथ, उसके प्रत्येक अंश का अर्थ एवं भाव समझने का प्रयास करते हुए पढ़ने की क्रिया को गहन वाचन कहा जाता है। सामान्यतः गूढ़ भाव एवं विचारों को उच्चस्तरीय भाषा एवं शैली में अभिव्यक्त किया जाता है। ऐसी लिखित सामग्री का अर्थ एवं भाव समझने के लिए पाठक को पूर्ण मनोयोग से, बड़े धैर्य के साथ एवं एक-एक शब्द का अर्थ एवं भाव समझने का प्रयास करते हुए पठन करना होता है।

(2) द्रुत वाचन-किसी पाठ्य सामग्री को मौन रूप में, तीव्र गति से पढ़कर उसके अर्थ एवं भाव को ग्रहण करने की क्रिया को द्रुत वाचन कहा जाता है। दूसरे शब्दों में, द्रुत वाचन का सम्बन्ध विस्तृत अध्ययन से है। विस्तृत अध्ययन तब किया जाता है जब हम अधिक विषयवस्तु कम समय में पढ़ना चाहते हैं। सामान्य पाठ्य सामग्री जैसे- समाचार पत्र एवं पत्रिकाओं तथा मनोरंजन साहित्य आदि के अध्ययन हेतु द्रुत पठन की आवश्यकता होती है। द्रुत पठन के लिए यह आवश्यक है कि पठनकर्ता का अपना विस्तृत शब्द भण्डार हो और उसे जीवन के विभिन्न क्षेत्रों का सामान्य अनुभव हो ।

मौन वाचन शिक्षण के लिए बातों का ध्यान

मौन वाचन शिक्षा के तरीके बताने के साथ-साथ शिक्षक को भी कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए जो इस प्रकार हैं-

(1) कक्षा 3 से पहले मौन वाचन नहीं कराया जाना चाहिए। कक्षा 3 में मौन वाचन की शिक्षा प्रारम्भ की जा सकती है पर इस समय शिक्षक का केवल इतना ही प्रयत्न रहना चाहिए कि विद्यार्थी उचित आसन में बैठकर शान्ति के साथ पढ़ें।

(2) शिक्षक मौन वाचन के बाद छात्रों से पठित सामग्री पर एक या दो प्रश्न पूछें।

(3) भाषा की शिक्षा में पाठ्य पुस्तकों में संकलित गद्य लेखों और सहायक पुस्तकों का मौन पठन कराना चाहिए। कविता शिक्षण में मौन पठन नहीं कराना चाहिए।

(4) कक्षा 4 के विद्यार्थियों को पुस्तकालयों एवं वाचनालयों में भी मौन वाचन के अवसर प्रदान किए जाने चाहिए। वहाँ उनकी रुचि की आकर्षक बाल पत्रिकाएं और पुस्तकें होनी चाहिए। दैनिक समाचार-पत्र भी वहाँ उपलब्ध होने चाहिए जो विद्यार्थी स्वेच्छा से उन्हें पढना चाहें, उन्हें पढ़ने के अवसर सुलभ हो यह सब कार्य शिक्षक की देख-रेख में चलना चाहिए।

(5) मौन वाचन करने के पश्चात उन्हें अपनी बात कहने के स्वतन्त्र अवसर भी दिए जाने चाहिए। इससे उनकी मौखिक भाषा में भी विकास होगा। कक्षा 5 में इस बात पर विशेष बल दिया जाना चाहिए कि विद्यार्थी जो कुछ पढ़ें, कम से कम उसका केन्द्रीय भाव अवश्य समझें।

(6) मौन वाचन की शिक्षा उच्च प्राथमिक स्तर से शुरू होती है। इस स्तर तक आते-आते विद्यार्थी के शब्द भण्डार में काफी वृद्धि हो जाती है। इसके साथ-साथ अब वे उतने चंचल भी नहीं रहते। कक्षा 6 और उससे आगे मौन वाचन के सभी तत्त्वों के विकास का प्रयत्न करना चाहिए।

(7) विद्यार्थियों को मौन वाचन कराने के लिए कक्षा का पर्यावरण शान्त हो और उसमें हवा और प्रकाश का पूरा प्रबन्ध होना चाहिए।

(8) जब विद्यार्थी मौन पठन करना प्रारम्भ कर दें तब उन्हें मौखिक रूप से कोई आदेश न दिया जाए, इससे मौन पठन का वातावरण ही समाप्त हो जाता है। शिक्षकों को चाहिए कि वे मौन पठन से पहले ही विद्यार्थियों को आवश्यक निर्देश दें और जब विद्यार्थी मौन पठन प्रारम्भ कर दें तो उन पर दृष्टि द्वारा नियन्त्रण रखें।

(9) कक्षा के अतिरिक्त पुस्तकालयों एवं वाचनालयों में मौन पठन के समय ऐसा वातावरण होना चाहिए कि विद्यार्थी वहाँ मुँह से ध्वनि नहीं निकालें। सब कार्य नियम से स्वतः चलने चाहिए। 

(10) फर्श पर जूट अथवा सूत के फर्श बिछे हों जिससे चलने-फिरने की आवाज तक न हो। दीवारों पर स्थान-स्थान पर निर्देश लिखकर टोंग दिए जाए और सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि वहाँ के अधिकारी एवं शिक्षक आदि कोई भी बात आपस में न करें।

(11) जब विद्यार्थी यहाँ बैठकर मौन पठन करें तब शिक्षक को चाहिए कि वे उनके पास पहुँच कर इशारों से उनके बैठने के आसन को ठीक कराएं और उन्हें उचित ढंग से पढ़ने के निर्देश दें।

सस्वर वाचन( Recitation) 

स्वर सहित पढ़ते हुए अर्थ ग्रहण करने को सस्वर वाचन कहा जाता है। सस्वर वाचन का अर्थ है लिखित भाषा को मौखिक रूप में पढ़कर उसका अर्थ एवं भाव ग्रहण करना । सस्वर वाचन के अन्तर्गत वर्णमाला के वर्णों को पहचानना, उनको शुद्ध उच्चारण के साथ उचित गति में पढ़ना आदि क्रियाएँ सम्मिलित की जाती हैं। सस्वर पठन, पठन की प्रारम्भिक अवस्था होती है। बालक जब बोलना प्रारम्भ कर देता है तो उसे सर्वप्रथम बोल-बोल कर पढ़ने का अभ्यास कराया जाता है।

सस्वर वाचन के उद्देश्य

सस्वर वाचन के उद्देश्य सस्वर वाचन के उद्देश्यों को निम्नलिखित क्रम से संगठित किया जा सकता है- 

(1) ज्ञान(Knowledge) 

(i) विद्यार्थियों को लिपि का स्पष्ट ज्ञान कराना और उनके शब्द सूक्ति भण्डार में वृद्धि करना। 

(ii) विद्यार्थियों को वाक्य रचना का ज्ञान कराना और विभिन्न लेखन शैलियों से परिचित कराना।

(iii) विद्यार्थियों को मानव जीवन के विभिन्न पहलुओं का सामान्य ज्ञान कराना।

(2) कौशल (Skill) 

(i) विद्यार्थियों को उचित आसन में, उचित भाव मुद्रा के साथ पूर्ण मनोयोग से सरवर पठन करने में प्रशिक्षित करना। 

(ii) विद्यार्थियों को गद्य का स्पष्ट अक्षरोच्चारण, शुद्ध शब्दोच्चारण, उचित ध्वनि-निर्गम एवं भावानुकूल बल तथा प्रवाह के साथ मौखिक पठन करने में प्रशिक्षित करना ।

(iii) विद्यार्थियों को कविता का भाव समझने एवं उचित आरोह-अवरोह के साथ पठन करने में प्रशिक्षित करना। 

(iv) विद्यार्थियों को लिखित सामग्री का केन्द्रीय भाव ग्रहण करने और उसकी समीक्षा करने में प्रशिक्षित करना। 

(3) रुचि(Interest) 

(i) विद्यार्थियों की अध्ययन में रुचि उत्पन्न करना । 

(ii) विद्यार्थियों के पठन सामग्री का विश्लेषण कर उसके मूल्यांकन में रुचि उत्पन्न करना ।

(4) अभिवृत्ति(Attitude) 

(i) विद्यार्थियों में भाषा सीखने एवं विभिन्न ज्ञान प्राप्त करने की प्रवृत्ति का विकास करना ।

(ii) विद्यार्थियों में भाषा, साहित्य, देश, जाति और धर्म के प्रति आदर के स्थाई भाव का निर्माण करना ।

सस्वर वाचन की विशेषताएं

सस्वर वाचन की विशेषताएं निम्न है- 

(1) उच्चारण की शुद्धता-करते समय की शुद्धता को ध्यान में रखना चाहिए। अध्यापक को समय यह ध्यान रखना चाहिए कि बालक शब्दका सही करे क्योंकि गलत उच्चारण से शब्दों का अर्थ बदल जाता है साथ ही गलत उच्चारण एक बार सीख जाने पश्चात् उसको शुद्ध कराने में बहुत परिश्रम करना पड़ता है।

(2) उचित लय एवं गति – सस्वर वाचन के वक्त पढ़ने की लय एवं गति का भी विशेष ध्यान रखना चाहिए। पठन की गति समान होनी चाहिए।

(3) उचित हाव-भाव-पठन करते समय पाठ्य सामग्री के भावों के अनुसार ही पाठक को हाव-भाव का प्रदर्शन करना चाहिए। प्रेम, क्रोध, वीरता, करुणा आदि के अनुसार ही पाठक के हाव-भाव परिवर्तित होने चाहिए।

(4) स्वर माधुर्य-पढ़ते समय पाठक की वाणी में मधुरता होनी चाहिए। भावों एवं विचारों के अनुसार ही उतार-चढ़ाव के साथ मधुरवाणी में पढ़ना चाहिए। उसका प्रत्येक वर्ण स्पष्ट होना चाहिए।

(5) उचित बल व विराम-सस्वर वाचन के समय पाठक को पाठ्य वस्तु के भाव के अनुसार उचित स्वराघात एवं बलाघात का प्रयोग करना चाहिए। पढ़ते समय विराम चिह्नों के प्रयोग का भी ध्यान रखना चाहिए क्योंकि विराम चिह्नों के गलत प्रयोग से वाक्यों का अर्थ उचित रूप में ग्रहण नहीं किया जा सकता है।

(6) अंग-संचालन- पढ़ते समय अंग-संचालन से विषय-वस्तु में सजीवता आ जाती है। अंग संचालन प्रकरण के प्रभाद व प्रवाह दोनों को बढ़ा देता है किन्तु अंग-संचालन के समय यह ध्यान भी रखना चाहिए कि यह अनावश्यक रूप में न प्रयुक्त किया जाए क्योंकि यह अशोभनीय साथ-साथ प्रकरण के प्रभाव को भी कम कर देता है।

(7) उचित वाचन मुद्रा-वाचन के समय पठन मुद्रा का विशेष स्थान होता है। पढ़ते समय पुस्तक को बाएँ हाथ से पकड़ना चाहिए एवं पुस्तक और आँखों के मध्य लगभग 30 सेमी. की दूरी होनी चाहिए। बैठकर या खड़े होकर पढ़ते समय छात्र की रीढ़ की हड्डी सीधी होनी चाहिए।

(8) प्रभावोत्पादकता – सस्वर वाचन एक कला है जिसे केवल अभ्यास के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। कोई विषय-वस्तु तभी प्रभावशाली होती है जब उसे उचित धाराप्रवाह में पढ़ा जाए। उचित धारा प्रवाह में किया गया सस्वर पाठ श्रोताओं को मन्त्र मुग्ध कर देता है।

हिन्दी शिक्षण में सस्वर वाचन का महत्त्व

हिन्दी शिक्षण में सस्वर वाचन का महत्त्व निम्नलिखित प्रकार से है-

(1) हिन्दी शिक्षाविदों का मानना है कि अच्छे सस्वर वाचन से गद्य का आधा और पद्म का पूरा भाव समझ में आ जाता है। कविता का आनन्द तो उसके सस्वर वाचन में ही होता है। भाषा शिक्षण की दृष्टि से भी सस्वर वाचन का बढ़ा महत्त्व हैं।

(2) इससे विद्यार्थी का उच्चारण शुद्ध होता है, उनकी झिझक दूर होती है और वे अच्छे वार्ताकार प्रभावशाली वक्ता और सफल अभिनेता बनते हैं।

(3) उच्चारण शुद्ध होने पर शब्दों को लिखने में वर्तनी की अशुद्धि नहीं होती।

(4) छात्रों की मौखिक एवं लिखित दोनों प्रकार की भाषाओं में सुधार होता है।

(5) कक्षा शिक्षण की दृष्टि से शिक्षक के आदर्श सस्वर वाचन से कक्षा में जीवन्तता बनी रहती है।

(6) जब विद्यार्थी शिक्षक का अनुकरण कर स्वयं सस्वर वाचन करते हैं तो उनके पठन कौशल का विकास होता है। 

(7) सस्वर वाचन से भाषा शिक्षण सरल एवं सहज हो जाता है।

सस्वर पठन के तत्त्व 

सस्वर पठन, चाहे वह व्यक्तिगत रूप में किया जाए और चाहे

सामूहिक रूप से, उसमें निम्नलिखित तत्त्व अवश्य होने चाहिए- 

(1) उचित पठन आसन एवं मुद्रा – सस्वर पठन करते समय सबसे पहली आवश्यकता है, उचित ढंग से बैठना अथवा खड़े होना जिससे थकान न हो और पठनकर्ता का ध्यान पाठ्य सामग्री में केन्द्रित रहे। यदि बैठकर पठन किया जाए तो कुर्सी पर इस प्रकार बैठना चाहिए कि रीढ़ की हड्डी सीधी रहे और पैर 90 डिग्री का कोण बनाते हुए लटके रहें । यदि खड़े होकर पठन किया जाए तो भी बिल्कुल सीधे खड़े होना चाहिए और पुस्तक को बाएं हाथ से पकड़कर पठन करना चाहिए। यदि जमीन पर बैठकर पठन किया जाए तो भी इस प्रकार बैठना चाहिए कि रीढ़ की हड्डी सीधी रहे और पाठ्य सामग्री आँखों से 35 सेन्टीमीटर की दूरी पर रहे। भावानुसार हाथ-पैर, आँख-नाक, सिर भी आदि अंगों का सहज संचालन एवं भाव प्रदर्शन भी आवश्यक होता है।

(2) स्पष्ट अक्षरोच्चारण – शब्द की इकाई अक्षर होते हैं। यदि शब्दोच्चारण में प्रत्येक अक्षर का स्पष्ट उच्चारण नहीं होता तो शब्द का उच्चारण नहीं किया जा सकता है। अतः सस्वर पठन करते समय इसका ध्यान रखना चाहिए।

(3) शुद्ध शब्दोच्चारण-शब्दों के शुद्ध उच्चारण पर ही अर्थ की प्रकृति और शुद्ध लेखन दोनों निर्भर करते हैं। अतः पठनकर्ता को सदैव शुद्ध उच्चारण के साथ पठन करना चाहिए अन्यथा सम्पूर्ण के स्थान पर अंश के भाव की प्राप्ति का भय सदैव बना रहेगा।

(4) उचित ध्वनि – निर्गम स्पष्ट अक्षरोच्चारण और शुद्ध शब्दोच्चारण, इन दोनों के लिए आवश्यक है कि ध्वनियों को उनके अपने स्थान से उच्चारित किया जाए, उन्हें उचित स्वर से मुँह से निकाला जाए। पठन का यह बहुत आवश्यक अंग होता है।

(5) बल-पठन करते समय आवश्यक शब्दों पर बल देना भी आवश्यक होता है। शिक्षक को आदर्श पठन करते समय इस बात पर विशेष ध्यान देना चाहिए। शब्दों पर बल देने से वाक्यों के अर्थ में अन्तर आ जाता है।

(6) धैर्य-धैर्य भी पठन का आवश्यक तत्त्व है। पठनकर्ता को सदैव धैर्य के साथ उचित गति में पठन करना चाहिए। बहुत अधिक गति अथवा धीमी गति से पठन करने में अर्थ की प्राप्ति में बाधा पड़ती है।

(7) सुस्वरता-पठन का यह अन्तिम तत्त्व है। इसका अर्थ है भाव के अनुसार वाक्य के शब्दों में स्वर का उतार-चढ़ाव दिखाना, वाणी में मधुरता प्रदर्शित करना और भावानुसार उचित आरोह-अवरोह के साथ पठन करना। इससे पठनकर्त्ता को भाव की प्रतीति में सहायता मिलती है। श्रोता की दृष्टि से भी यह परम आवश्यक है अन्यथा श्रोता की श्रवण में रुचि ही नहीं रहेगी।

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