वाचन की आवश्यकता पर टिप्पणी, प्रकार और महत्व

वाचन की आवश्यकता

प्रत्येक क्रिया की अपनी ही आवश्यकता और अपना ही महत्व होता है। वाचन की आवश्यकता क्यों है— इस प्रश्न पर गम्भीरतापूर्वक विचार करें तो कई बातें सामने आती हैं; ये बाते हैं-

1. मौखिक कथन की अपनी एक सीमा है। हर व्यक्ति को अपनी बात अलग-अलग कहना या अलग-अलग व्यक्तियों को एकत्रित करना और किसी बात को कहना दोनों ही कठिन काम हैं। । 

इस दृष्टि से जो व्यक्ति अपने विचारों को दूसरों तक पहुँचाना चाहता है, उसे उन विचारों को कहीं लिखना पड़ेगा और जिन्हें दूसरों के विचारों को ग्रहण करता है, उन्हें उन विचारों को पढ़ना अर्थात् मौन वाचन करना होगा।

2. जो व्यक्ति अब इस संसार में नहीं रहे, उनके विचारों या उनके विषय में जानकारी पुस्तकों को पढ़कर ही की जा सकती है और पढ़ने के लिए वाचन जरूरी है।

3. अवकाश के क्षणों में कुछ पढ़कर समय का सदुपयोग करने की दृष्टि से भी वाचन की आवश्यकता पड़ती है।

4. जो पढ़े नहीं हैं, लेकिन किसी कहानी, कथा, गीत आदि को जानना चाहते हैं, उन्हें इस बात को सुनाने के लिए भी वाचन की आवश्यकता है।

5. किसी लिखी हुई बात को कक्षा में छात्रों को समझाने हेतु भी वाचन की आवश्यकता पड़ती है। 6. कभी किसी व्यक्ति को संदेश दूसरों तक पहुँचाना हो तो उसका वाचन करके अन्य तक पहुँचाया जा सकता है।

वाचन का महत्व

ऊपर हमने वाचन की आवश्यकता पर जो विचार किया, उसी को ध्यान में रखते हुए हम कह सकते हैं कि वाचन का अपनी ही महत्त्व है और वह इसलिए कि-

1. वाचन के द्वारा व्यक्ति, उन सभी के लिखित विचारों को ग्रहण कर सकता है जो

अब संसार में नहीं हैं अथवा जिनकी उपस्थिति किसी भी कारण से सम्भव नहीं है। 

2. मौन वाचन के द्वारा हर व्यक्ति या विद्यार्थी अपनी क्षमता के अनुरूप लाभान्वित हो सकता है।

3. वाचन के द्वारा उन व्यक्तियों को भी किसी की लिखी हुई बात से अवगत कराया जा सकता है जो लिखना पढ़ना नहीं जानते।

4. अवकाश के क्षणों का उपयोग दूसरों द्वारा सरलता से किया जा सकता है। 

5. वाचन एकाकी और सामूहिक दोनों ही प्रकार से सम्भव है। 

6. समवेत गायन भी वाचन के द्वारा सम्भव है, जो दूसरों को बहुत अधिक प्रभावित करता है।

वाचन के प्रकार

प्रमुखतः वाचन दो प्रकार का होता है-

1. सस्वर वाचन (Loud or Oral Reading),

2. मौन वाचन (Silent Reading)।

लिखित भाषा के ध्वनियुक्त वाचन को सस्वर वाचन तथा ध्वनि-रहित वाचन को मौन वाचन कहते हैं। सस्वर वाचन दो प्रकार से किया जा सकता है। प्रथम, एक ही व्यक्ति किसी लिखित भाग का वाचन करें; जैसे—कथावाचक का वाचन, बालकों द्वारा एक-एक करके किसी लिखित गद्यांश का वाचन या पद्यांश का पाठ। दूसरे प्रकार का सस्वर वाचन वह है कि जिसमें बहुत-से बालक या व्यक्ति किसी भी लिखित भाग को एक साथ पढ़ें या बोले; जैसे प्रार्थना को बालकों द्वारा एक साथ मिलकर बोलना। पहले प्रकार के वाचन को व्यक्तिगत (Individual) तथा दूसरे प्रकार के वाचन को सामूहिक या समवेत वाचन (Collective Reading) कहते हैं। पुनः वैयक्तिक वाचन शिक्षक द्वारा भी किया जा सकता है और छात्रों द्वारा भी।

 शिक्षक द्वारा किये गये हुए व्यक्तिगत वाचन को आदर्श की वाचन (Model Reading) तथा छात्रों द्वारा किये गये व्यक्तिगत वाचन को अनुकरण वाचन (Imitation Reading) कहते हैं। अनुकरण वाचन प्रायः व्यक्तिगत और सस्वर ही होता है। सस्वर इसलिए कि जब तक विद्यार्थी किसी अंश को बोलकर नहीं पढ़ेगा, तब तक उसकी ध्वनि सम्बन्धी कमियों और वाचन सम्बन्धी त्रुटियों का पता नहीं लगा पायेगा। त्रुटियों का पता लगाने पर ही उनका संशोधन सम्भव है, उससे पूर्व नहीं। यहाँ एक शंका का समाधान करना और उपयुक्त रहेगा। प्रार्थना को सामूहिक वाचन कहें या सामूहिक गीत/भजन आदि? शंका उचित है और इसके उत्तर में हम यही कहना चाहेंगे कि जब कोई अंश पढ़ा जा रहा है, तभी उसे वाचन की संज्ञा दी जा सकती है। यह प्रायः गद्य पाठों में ही होता है। पद्य पाठों में उसी को हम वाचन न कहकर पाठ कह देते हैं। प्रार्थना जब गायी जा रही है, तब वह गीत है और चूँकि सभी के द्वारा पढ़ी जा रही है, इसलिए वाचन है; परन्तु साथ ही आरोह-अवरोह और लयपूर्वक पढ़ी जा रही है, इसलिए गीत या पाठ है। महत्व की दृष्टि से त्रुटियों के सुधार में एकल वाचन का ही महत्व अधिक है।

मौन वाचन का अर्थ

अधिक प्रभावित मौन वाचन का अर्थ स्वयं में स्पष्ट है। ‘मौन’ का अर्थ ‘बिना ध्वनि किये’ अर्थात् किसी पाठ को इस प्रकार पढ़ना कि किसी को आवाज या ध्वनि से ज्ञात न होने पाये कि कहीं ओर क्या पढ़ा जा रहा है; ही मौन वाचन है। यह सस्वर वाचन से ठीक उल्टा है। सस्वर वाचन में उच्चारण की शुद्धता-अशुद्धता सब कुछ वाचन के साथ-साथ ही यह ज्ञात होती जाती है, इसमें नहीं। मौन वाचन को हम वैयक्तिक और सामूहिक दोनों प्रकार का बताते अवश्य हैं, परन्तु यथार्थ में यह वैयक्तिक होता है। सामूहिक तो इसलिए कह देते हैं कि कि यह पूरी कक्षा को एक साथ कराया जा सकता है, जिसमें छात्र अपनी-अपनी गति के अनुसार पठित अंश को पढ़ते हैं।

मौन वाचन का महत्व 

मौन वाचन हो या अन्य कोई शिक्षण क्रिया उसकी आवश्यकता और महत्व भाषायी अन्तर से दोनों एक ही हैं। इस दृष्टि से मौन वाचन का महत्व होगा—

(1) मौन वाचन का लाभ सभी ले सकते हैं।

(2) मौन वाचन व्यक्ति दूसरों को किसी भी प्रकार की बाधा पहुँचाए बिना कर सकता है।

(3) मौन वाचन कोई भी बालक, विद्यार्थी या व्यक्ति अपनी इच्छा, गति और आवश्यकतानुसार कहीं भी और कभी भी कर सकता है; अर्थात् मौन वाचन कक्षा में ही किया जा नहीं, रेल या बस की यात्रा में कहीं भी तथा सुबह, दोपहर, शाम, रात्रि कभी भी किया जा सकता है ।

(4) इसमें स्वेच्छा के साथ-साथ स्वगति से वाचन किया जा सकता है। 

(5) अवकाश के क्षणों का उपयोग करने को दृष्टि से मौन वाचन बहुत महत्वपूर्ण है। 

(6) इसके द्वारा किसी भी अंश की गहराई तक पहुँचा जा सकता है। 

(7) इसके द्वारा वाचन, चिन्तन आदि सभी सम्भव है, जो बालक के बौद्धिक विकास में सहायक हैं।

(8) उच्च स्तर पर इसकी आवश्यकता और महत्व दोनों ही अधिक है अर्था प्राथमिक से माध्यमिक तथा उच्च स्तर के लिए इसकी उपयोगिता बढ़ती ही जाती है। 

(9) इसमें व्यक्ति या बालक की क्षमताओं एवं योग्यताओं का पूरा-पूरा उपयोग किया जा सकता है।

मौन वाचन के उद्देश्य

ऊपर मौन वाचन की आवश्यकता और महत्व के विषय में जो कुछ भी कहा गया है. उसके आधार पर मौन वाचन के उद्देश्य सरलता से निश्चित किये जा सकते हैं। ये उद्देश्य होंगे —

(1) विद्यार्थियों को कम-से-कम अधिक-से-अधिक विषय-वस्तु को आत्मसात करना।

(2) विद्यार्थियों द्वारा किसी बात को स्वयं समझने हेतु प्रेरित करना। (3) उनकी चिंतन एवं तर्कशक्ति का विकास करने का प्रयास करना।

(4) कक्षा में अन्य छात्रों को व्यवधान पहुँचाए बिना अपनी ही क्षमता ए योग्यतानुसार छात्रों को पाठ्यांश को समझने हेतु प्रयास कराना ।

(5) छात्रों द्वारा अवकाश के क्षणों का उपयोग किये जाने हेतु प्रेरित करना।

(6) विद्यार्थियों द्वारा विषय-वस्तु को गहराई से समझने हेतु प्रेरित करना।

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