वायुमण्डल एवं जलमण्डल-ATMOSPHERE AND HYDROSPHERE IN HINDI

 वायुमण्डल (ATMOSPHERE)

वायुमण्डल में तापमान की अवस्थाएँ (States of Temprature in Atmosphere) 

वायुमण्डल में तापमान की अवस्थाएं निम्नलिखित है-

(1) उच्चतम तापमान (Maximum Temperature)- यह तापमान जो पूरे दिन में सबसे अधिक होता है उसे उच्चतम तापमान कहते हैं। यह तापमान दोपहर 2 बजे से 3 बजे के बीच मापा जाता है।

(2) न्यूनतम तापमान (Minimum Temperature) – वह तापमान जो पूरे दिन में सबसे कम होता है उसे न्यूनतम तापमान कहते हैं। यह तापमान मुख्यतः 4 बजे से 5 बजे के बीच मापा जाता है।

(3) औसत तापमान (Average Temperature)- पूरे दिन के अधिकतम एवं न्यूनतम तापमान को जोड़कर 2 से भाग देने पर प्राप्त भागफल को हम औसत तापमान कहते हैं।

(4) औसत मासिक तापमान (Average Monthly Temperature)—एक माह के पूरे दैनिक औसत तापमान को जोड़कर माह के दिनों की संख्या से भाग देने पर प्राप्त भागफल को औसत मासिक तापमान कहते हैं।

(5 ) औसत वार्षिक तापमान (Average Yearly Temperature)—वर्ष भर के प्रत्येक माह के औसतन तापमान को जोड़कर 12 से भाग देने पर प्राप्त भागफल को औसत वार्षिक तापमान कहते हैं।

वायुमण्डल की आर्द्रता (Humidity of Atmosphere) – वायुमण्डल में विद्यमान अदृश्य जलवाष्प की मात्रा आर्द्रता कहलाती है। यह आर्द्रता पृथ्वी से वाष्पीकरण के विभिन्न रूपों द्वारा वायुमण्डल में पहुंचती है। आर्द्रता का जलवायु विज्ञान में महत्त्वपूर्ण स्थान होता है क्योंकि इसी पर वर्षा तथा वर्षण के विभिन्न रूप जैसे- वायुमण्डलीय तूफान तथा विक्षोभ (चक्रवात आदि) आधारित होते हैं।

वायुमण्डल एवं जलमण्डल-ATMOSPHERE AND HYDROSPHERE IN HINDI

वर्षा, बादल, कोहरा, ओस, ओला एवं पाला आदि से ज्ञात होता है कि पृथ्वी को घेरे हुए वायुमंडल में जलवाष्प हमेशा न्यूनाधिक मात्रा में विद्यमान रहती है। वायु दाब मापी से जब हम वायुदाब ज्ञात करते हैं तब उसमें जलवाष्प का भी दाब सम्मिलित रहता है।

आर्द्रता के प्रकार (Types of Humidity)-  

किसी स्थान पर वायु मण्डल में गैस के रूप में विद्यमान जलवाष्प को वायु की आर्द्रता कहते हैं। वायु में विद्यमान आर्द्रता को निम्नलिखित दो प्रकार से व्यक्त किया जा सकता है- 

(1) निरपेक्ष आर्द्रता – हवा के प्रति इकाई आयतन में विद्यमान जलवाष्प की मात्रा को निरपेक्ष आर्द्रता कहते हैं। सामान्यतः इसे ग्राम प्रति घन मीटर में व्यक्त किया जाता है। वायुमण्डल की जलवाष्प धारण करने की क्षमता पूर्णरूप से तापमान पर निर्भर होती है। हवा की आर्द्रता विभिन्न स्थानों पर समय-समय पर बदलती रहती है। ठंडी हवा की अपेक्षा गर्म हवा अधिक जलवाष्प धारण कर सकती है।

(2) सापेक्ष आर्द्रता-सापेक्ष आर्द्रता, किसी निश्चित आयतन की वायु में वास्तविक जलवाष्प की मात्रा एवं उसी वायु के दिए गए तापमान पर अधिकतम आर्द्रता धारण करने की क्षमता का अनुपात है ।

पवन (WIND)

एक स्थान से दूसरे स्थान पर चलने वाली वायु को पवन कहते हैं। इनके चलने का मूल कारण धरातल पर वायुदाब में क्षैतिज विषमता का होना है। पवन वायुदाब की इसी क्षैतिज विषमता को संतुलित करने के लिए प्रकृति का प्रयास है। पवन अपने साथ बालू तथा धूलकणों को उड़ाकर ले जाती है। पवन के चट्टानों से टकराने के कारण उन पर खुरचने की प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है जिसके कारण अपरदन की क्रिया होती है।

पवन का प्रवाह हमेशा उच्च वायुदाब से निम्न वायुदाब की ओर होता है। वायुदाब की भिन्नता के कारण पवनों की गति प्रभावित होती है। पवन जिस दिशा से चलती है उस दिशा के अनुसार ही उसका नाम पड़ता है। ऊर्ध्वाधर दिशा में गतिशील हवा को वायुधारा (Air Current) कहते हैं। अगर पृथ्वी स्थिर हो और उसका धरातल समतल हो तो पवन उच्च वायुदाब वाले क्षेत्र से सीधे निम्न वायुदाब वाले क्षेत्र की ओर समदाब रेखाओं पर समकोण बनाती है परन्तु वास्तविकता तो यह है कि पृथ्वी अपने अक्ष पर घूर्णन कर रही है एवं उसका धरातल समतल नहीं है। विभिन्न कारणों से पवन अपनी दिशा में परिवर्तन करती हुई चलती है, ये कारण हैं- दाब प्रवणता बल, कॉरिऑलिस प्रभाव, अभिकेन्द्रीय त्वरण तथा भू-घर्षण ।

स्थानीय पवनें (Local Winds) – जिन हवाओं का जन्म स्थानीय स्तर पर तापमान एवं वायुदाब में अन्तर के कारण होता है उन्हें स्थानीय हवाएँ कहते हैं। भारत में प्रायः मई एवं जून के महीने में दोपहर बाद पश्चिम दिशा में बहने वाली अत्यधिक गर्म एवं शुष्क हवा (लू) बहने लगती है। कुछ स्थानीय पवनों के नाम निम्न हैं-

(1) लू (उत्तरी भारत एवं पाकिस्तान), 

(2) चिनूक (अमेरिका एवं कनाडा),

(3) मिस्ट्रल (ठण्डी ध्रुवीय हवा), 

(4) हरमट्टन (अफ्रीका का सहारा मरूस्थल),

(5) सीमूम (अरब और सहारा रेगिस्तान) 

(6) ब्लिजर्ड या हिम झंझावत-साइबेरिया, कनाडा एवं अमेरिका में बहती हैं।

चक्रवात एवं प्रति-चक्रवात  (ANTICYCLONE AND CYCLONE AND) 

परिधि से केन्द्र की तरफ जाने पर वायुदाब कम होता जाता है, परिणामस्वरूप परिधि से केन्द्र की ओर तेज हवाएँ चलने लगती है। कॉरिऑलिस बल के प्रभाव से ये हवाएँ चक्राकार घूमने लगती है। उत्तरी गोलार्द्ध में चक्रवात की दिशा घड़ी की सुइयों के विपरीत (Anticlockwise) तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में घड़ी की सुइयों के अनुरूप (Clockwise) होती है।

‘चक्रवात निम्नदाब के केन्द्र होते हैं जिनके चारों तरफ संकेन्द्रीय, समदाब रेखाएँ विस्तृत होती है।

सरल शब्दों में चक्रवात चलता फिरता निम्नदाब केन्द्र होता है जिसके चारों तरफ उच्चदाब वाली समदाब रेखाएँ पाई जाती हैं। ये गोलाकार, अण्डाकार या V आकार के होते हैं। ये चक्रवात उत्तरी गोलार्द्ध में केवल शीत ऋतु में आते हैं परन्तु दक्षिणी गोलार्द्ध में जल का भाग अधिक होने के कारण प्रायः वर्ष भर आते रहते हैं।

चक्रवात के प्रभाव

चक्रवात के प्रभाव निम्नलिखित हैं- 

(1) यातायात व संचार- इसमें तीव्र गति की हवाओं व मूसलाधार वर्षा के कारण बिजली व टेलीफोन के खम्मे गिर जाते हैं और यातायात अवरुद्ध हो जाता है तथा संचार प्रणाली ठप हो जाती है।

(2) फसले कृषि फसलों को चक्रवात से अत्यधिक हानि होती है ।

(3) जान तथा माल का नुकसान- चक्रवात के कारण भौतिक एवं जैविक सम्पदा नष्ट हो जाती है।

उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों के स्थानीय नाम

उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों को अलग-अलग अलग-अलग नामों से जाना जाता है जिसमें से कुछ निम्नलिखित हैं-

(1) टारनेडो (Tornadoes)– टारनेडो सामान्यतः मध्य अक्षांशों में उत्पन्न होते हैं। समुद्र पर टारनेडो को जलस्तम्भ (Water spouts) कहते हैं। फुजीटा स्केल का प्रयोग टारनेडो की तीव्रता मापने के लिए किया जाता है।

कैरेबियन सागर और अमेरिकी क्षेत्र टारनेडों के प्रमुख प्रवण क्षेत्र हैं। टारनेडो प्रभावित वृहत मैदानी भाग टारनेडो एली के नाम से प्रसिद्ध है। टारनेडो एली में मुख्यतः मिसीसिपी मिसौरी घाटी के टेक्सास, कंसास, ओकलाहामा और नेब्रास्का राज्य सम्मिलित हैं।

(2) टाइफून- पश्चिमी प्रशांत और दक्षिणी चीन सागर । 

(3) दिली विली-पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया । 

(4) हरिकेन- संयुक्त राज्य अमेरिका । 

(5) चक्रवात-भारत ।

चक्रवातों का नामकरण (Naming Identification of Cyclones)

चक्रवातों के नामकरण की शुरुआत 1935 से मियामी स्थित नेशनल हरीकेन सेन्टर एवं वर्ल्ड मेटीरियोलॉजिकल ऑर्गेनाइजेशन (डब्ल्यू.एम.ओ.) द्वारा की गई। डब्ल्यू. एम. ओ. जेनेवा में स्थित संयुक्त राष्ट्र संघ की एजेन्सी है।

उत्तरी हिन्द महासागर में उठने वाले चक्रवातों का कोई नाम नहीं रखा गया था क्योंकि यह काफी विवादास्पद काम था। परन्तु वर्ष 2004 में यह स्थिति तब बदल गई जब डब्ल्यू. एम. ओ. के नेतृत्व में अंतर्राष्ट्रीय पैनल भंग कर दिया गया एवं सम्बन्धित देशों से अपने-अपने क्षेत्र में आने वाले चक्रवात का नाम स्वयं रखने को कहा गया। इसके पश्चात् भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, मालदीव, म्यांमार, ओमान, श्रीलंका एवं थाईलैण्ड को मिलाकर कुल आठ देशों ने एक बैठक में भाग लिया। इन देशों में अपनी-अपनी पसन्द के अनुसार नाम सुझाए ।

सन् 2013 में भारत के दक्षिणी-पूर्वी तट पर आए पायलिन चक्रवात’ का नाम थाईलैण्ड द्वारा रखा गया था। इसी इलाके में ‘नीलोफर’ नामक चक्रवात आया था इसका नाम पाकिस्तान द्वारा रखा गया। ‘नानौक’ नामक चक्रवात का नाम म्यांमार द्वारा रखा गया। साल 2014 में आए चक्रवात ‘हुदहुद’ का नाम ओमान की ओर से सुझाया गया था।

समुद्र का तटवर्ती क्षेत्रों पर प्रभाव(OCEANIC EFFECTS PEON COASTAL AREAS )

जलमण्डल (Hydrosphere) – पृथ्वी के लगभग 3/4 भाग पर जलमण्डल का विस्तार पाया जाता है अर्थात् भूमण्डल के 70.8% भाग पर जल तथा 29.2% भाग पर स्थल है। इसमें महासागर, सागर, नदियों, झीलें हिमचोटियाँ, भूमिगत जल एवं जैवमण्डल सम्मिलत हैं। इन सब के समूह को जलमण्डल कहते हैं। जलमण्डल के अधिकांश भागों पर महासागरों का विस्तार है। महासागरों की संख्या चार है जिनमें प्रशान्त महासागर सबसे विशाल है। बाकी तीन इस प्रकार हैं, अन्ध या अटलांटिक महासागर, हिन्द महासागर एवं आर्कटिक महासागर महासागरों की औसत गहराई 4,000 मी. है। पृथ्वी पर प्रचुर मात्रा में जल पाए जाने के कारण इसे ‘नीला ग्रह भी कहा जाता है। पृथ्वी पर उत्तरी गोलार्द्ध में 40% भाग पर जल तथा 19% भाग पर स्थल का विस्तार है ।

अतः यही कारण है कि उत्तरी गोलार्ध को स्थल गोलार्द्ध’ एवं दक्षिणी गोलार्द्ध को ‘जल गोलार्ध’ भी कहा जाता है। समुद्र की मुख्य गतियाँ हैं- लहरें, धाराएँ तथा ज्वार-भाटा।

प्रमुख महासागरीय धाराएँ (Major Oceanic Currents)

महासागर की प्रमुख धाराएँ निम्नलिखित है- 

(1) उत्तरी विषुवतीय गर्म धारा (North Equatoria Warm Current)-अन्ध महासागर में विषुवत रेखा के उत्तर में उत्तर-पूर्वी सन्मार्गी पवनों के द्वारा एक उष्ण जलधारा प्रवाहित होती है जो विषुवत् रेखा के उष्ण जल को पूर्व से पश्चिम को ढकेलती है। यही उत्तरी विषुवतरेखीय गर्म जलधारा कहलाती है।

(2) गल्फस्ट्रीम या खाड़ी की गर्म धारा (Gulf Stream ) – इस धारा की उत्पत्ति मैक्सिको की खाड़ी से होती है, इसलिए इसे खाड़ी की धारा कहा जाता है। यहाँ यह लगभग 49 किलोमीटर चौड़ी होती है एवं इसकी गति लगभग 5 किमी. प्रति घण्टा तथा तापमान 28° सेण्टीग्रेड होता है। यह जलधारा फ्लोरिडा जल सन्धि से निकलकर उत्तरी अमेरिका के पूर्वी तट के साथ-साथ उत्तर की ओर बहती है। हैलीफैक्स के दक्षिण से इस धारा का प्रवाह पूर्ण रूप से पूर्व की ओर हो जाता है। वहाँ से इसे पछुआ पवनें आगे बहा ले जाती हैं। 45° पश्चिमी देशान्तर के निकट इसकी चौड़ाई अत्यधिक बढ़ जाती है जिसके कारण धारा के रूप में इसका स्वरूप बिल्कुल बदल जाता है। फलतः यहाँ उसका नाम उत्तरी अटलाण्टिक प्रवाह (North Atlantic drift) पड जाता है। तत्पश्चात यही प्रवाह पश्चिमी यूरोप में नाव की ओर चला जाता है और उत्तरी ध्रुव सागर में विलीन हो जाता है।

(3) कनारी की ठण्डी धारा (Cold Currents of Canary)- उत्तरी अटलाण्टिक प्रवाह स्पेन के निकट दो शाखाओं में बैट जाता है। एक शाखा उत्तर की ओर चली जाती है एवं दूसरी शाखा दक्षिण की ओर मुड़कर स्पेन, पुर्तगाल राधा अफ्रीका के उत्तरी पश्चिमी तट के सहारे बहती है। यहाँ यह कनारी द्वीप के पास जाकर निकलती है। अतः इसका नाम कनारी धारा पड़ा ।

(4) लैब्राडोर की ठण्डी धारा (Cold Current of Labrador)-ग्रीनलैण्ड के पश्चिमी तट पर बेफिन की खाड़ी से निकलकर लैब्राडोर पठार के सहारे बहती हुई न्यूफाउण्डलैंड गल्फस्ट्रीम में मिल जाती है। सागरों से आने के कारण यह धारा ठण्डी होती है। यहाँ कूड़ा-कचरा एकत्रित होने के कारण उस पर सारगोसा नामक घास उगने से ही इसे सारगैसो सागर कहते हैं।

धाराओं का तटीय क्षेत्र पर प्रभाव (Effects of Currents on Coastal Areas)-  जिन सागरीय तटों से होकर जलधाराएँ बहती हैं, वहाँ के निवासियों पर इनका अत्यधिक प्रभाव पड़ता है। धाराओं का यह प्रभाव कई प्रकार से होता है। जो कि निम्नवत् है-

(1) तापमान पर प्रभाव – धाराओं का जलवायु पर सम (Equable) और विषम (Extreme ) दोनों ही प्रकार का प्रभाव होता है। ठण्डी धाराओं के समीप के तट महीनों तक हिम से जमे रहते हैं किन्तु जिन भागों में गर्म धाराओ का प्रवाह बहता है, यहाँ इनका बहुत ही उत्तम और समप्र भाव होता है। उत्तरी पश्चिमी यूरोप (नार्वे, स्वीडन इंग्लैण्ड, आदि) और पूर्वी जापान की उन्नति का एक प्रमुख कारण ये गर्म धाराएं भी है। 

(2) वर्षा पर प्रभाव-गर्म धाराओं के ऊपर होकर बहने वाली पवनों में काफी मात्रा में नमी पाई जाती है। यही वाष्प भरी पवनें उच्च अक्षांशों में पहुंचने पर अथवा अधिक ऊँचाई पर उठने पर वर्षा कर देती हैं एवं अफ्रीका में कालाहारी दक्षिणी अमेरिका में अटाकामा मरुस्थलों का अस्तित्त्व तटीय ठण्डी धाराओं के कारण कम वर्षा का परिणाम है।

(3) वातावरण पर प्रभाव-जिन स्थानों पर गर्म और शीतल धाराएँ परस्पर मिलती हैं वहाँ घना कोहरा उत्पन्न हो जाता है। न्यूफाउण्डलैण्ड के समीप गल्फस्ट्रीम की गर्म धारा और लैब्राडोर की ठण्डी धारा के मिलने से तथा जापान तट पर क्यूरोसियों और क्यूराइल धाराओं के मिलने से घना कोहरा उत्पन्न हो जाता है।

(4) सामुद्रिक जीव-जन्तुओं पर प्रभाव – धाराएँ सामुद्रिक जीवन का प्राण मानी जाती हैं, सामुद्रिक जीवन को बनाए रखने और उसको प्रश्रय देने में धाराएँ महत्त्वपूर्ण योगदान देती हैं। धाराओं के कारण ही सागरों में आवश्यक जीवन-तंत्र व (ऑक्सीजन) एवं (प्लैक्टन) का सन्तुलित वितरण होता है। ये धाराएँ कई जीवों के लिए भोजन का आधार भी होती है।

(5) व्यापार पर प्रभाव-धाराओं के कारण सागरों की गति निरन्तर बनी रहती है। यह गति सागरों को जमने से बचाती है। जिन तटों पर गरम धाराएँ बहती हैं वहाँ के बन्दरगाह वर्ष भर खुले रहते हैं, जैसे- नार्वे तथा जापान के बन्दरगाह। बन्दरगाहों के खुले रहने से उन प्रदेशों में वर्ष भर व्यापार बना रहता है।

ज्वार-भाटा (Tide) – धरती पर स्थित सागरों के जल स्तर का सामान्य स्तर से ऊपर उठना ज्वार तथा नीचे गिरना भाटा कहलाता है। ज्वार-भाटा की घटना केवल सागर पर ही मान्य नहीं होती अपितु उन सभी चीजों पर मान्य होती है जिन पर समय एवं स्थान के साथ परिवर्तनशील गुरुत्व बल लगता है। जैसे- ठोस जमीन पर भी। पृथ्वी, चन्द्रमा और सूर्य की पारस्परिक गुरुत्वाकर्षण शक्ति की क्रियाशीलता ही ज्वार-भाटा की उत्पत्ति का प्रमुख कारण है।

ज्वार-भाटा के प्रकार (Types of Tide)- ज्वार-भाटा के निम्न प्रकार होते हैं- पूर्णिमा तथा अमावस्या के दिन आते हैं। चूँकि इस दिन सूर्य, पृथ्वी और चन्द्रमा तीनों एक ही सीध में होते हैं, इसलिए सूर्य तथा चन्द्रमा के सम्मिलित आकर्षण बल से पृथ्वी पर ऊँचे ज्वार की उत्पत्ति होती है।

(2) लघु ज्वार– इस प्रकार के ज्वार की उत्पत्ति कृष्ण व शुक्ल पक्ष की अष्टमी को होती है। यह वह समय होता है जब सूर्य, पृथ्वी तथा चन्द्रमा तीनों समकोण की स्थिति में होते है। इससे सूर्य तथा चन्द्रमा की आकर्षण शक्ति अलग-अलग दिशाओं में काम करती है जिसमें ज्वार की उठान कम हो जाती है।

(3) अयनवृत्तीय ज्वार-जिस प्रकार सूर्य उत्तरायण और दक्षिणायन होता है, उसी तरह चन्द्रमा भी उत्तरायण और दक्षिणायन होता है। जब चन्द्रमा का झुकाव उत्तर की ओर अधिक होता है तो कर्क रेखा पर उठने वाले ज्वार ऊँचे होते हैं। ऐसा महीने में दो बार होता है। ठीक इसी समय मकर रेखा पर भी अपकेन्द्रीय बल के कारण इतना ही ऊँचा ज्वार उत्पन्न होता है। इसे अयनवृत्तीय ज्वार कहते हैं।

(4) विषुवतरेखीय ज्वार- प्रत्येक महीने में दो बार चन्द्रमा विषुवत् रेखा पर लंबवत होता है। इस स्थिति में दो उच्च ज्वार तथा दो निम्न ज्वार की ऊँचाई समान होती है जिसे भूमध्य रेखीय ज्वार कहते हैं ।

ज्वार-भाटा के समय में अन्तर 

जैसा कि बताया गया है कि 24 घंटे में दो बार ज्वार आता है। परन्तु यह हर 12 घंटे के बाद नहीं आता बल्कि 12 घंटे 26 मिनट के बाद आता है। ज्वार उत्पन्न होने में 26 मिनट का यह अन्तर पृथ्वी की परिभ्रमण गति के कारण होता है। जब पृथ्वी अपनी धुरी का एक चक्कर पूराकर पहले वाले स्थान तक पहुँचती है तब तक चन्द्रमा भी अपने पथ पर थोड़ा-सा आगे बढ़ जाता है।

ज्ञातव्य है कि चन्द्रमा 28 दिन में पृथ्वी की एक परिक्रमा पूरी कर लेता है। इस प्रकार 24 घंटे में अर्थात् एक दिन में वह अपने वृत्त का 1/28 भाग तय करता है। इसके फलस्वरुप पृथ्वी के उस स्थान को चन्द्रमा के सामने पहुँचने में 52 मिनट का समय लग जाता है। इसलिए प्रत्येक स्थान पर 12 घंटे 26 मिनट के पश्चात् ही दूसरा ज्वार और भाटा उत्पन्न होता है ।

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