विभिन्न धरातलीय कारक – DIFFERENT LAND FACTOR IN HINDI

 अंतर्जात बल आकस्मिक बल (INTERNAL / ENDOGENEOUS FORCE & ACCIDENTAL FORCE)

धरातल पर पाए जाने वाले विभिन्न स्थल रूपों का निर्माण दो प्रकार की शक्तियों के परस्पर क्रिया का परिणाम है। इसके अंतर्गत वलन व भ्रंशन आदि आते हैं, इसे विवर्तनिक हलचल भी कहते हैं। पृथ्वी के आंतरिक भाग में उत्पन्न होने वाली शक्तियों को अंतर्जात शक्तियों कहते हैं। ये शक्तियाँ भूतल पर असमानताएँ लाती हैं। इस बल की उत्पत्ति तापमान में परिवर्तन, चट्टान का फैलाव आदि के द्वारा होती है।

विभिन्न धरातलीय कारक - DIFFERENT LAND FACTOR IN HINDI

अंतर्जात बल के प्रकार (Types of Internal / EndogeneousForce) 

अंतर्जात बलों को कार्य की तीव्रता के आधार पर दो भागों में बाँटा गया है-

1) दीर्घकालिक बल / पटल विरूपणी बल

2) आकस्मिक बल

ज्वालामुखी (Volcano) 

ज्वालामुखी भूपर्पटी में वह छिद्र या द्वार होता है जिसके द्वारा शैल पदार्थ, शैल के टुकड़े, राख, जलवाष्प तथा अन्य गर्म गैसें धीरे-धीरे अथवा तेजी से उद्गार के समय निकलते हैं। ये पदार्थ के आंतरिक गर्म भागों में पाए जाते हैं, जहाँ शैल संस्तर अपेक्षाकृत कमजोर होते हैं।

ज्वालामुखी के प्रकार (Types of Volcanos) 

ज्वालामुखी को उद्गार प्रक्रिया के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है। उद्गार की बारम्बारता, ज्वालामुखी पदार्थों के बाहर निकल कर पृथ्वी के धरातल पर आने के ढंग तथा उद्गार की प्रकृति अथवा तरलता वर्गीकरण के प्रमुख आधार हैं। उद्गार के आधार पर ज्वालामुखी तीन प्रकार के होते हैं-

(1) सक्रिय ज्वालामुखी-वे ज्वालामुखी जिनमें समय-समय पर उद्गार होते रहते हैं अथवा वर्तमान में उद्गार हो रहे है उन्हें सक्रिय ज्वालामुखी कहते हैं।

(2) प्रसुप्त ज्वालामुखी-ऐसे ज्वालामुखी जिनमें वर्तमान काल में उद्गार नहीं हुए हैं या अचानक सक्रिय हो जाते हैं, उन्हें प्रसुप्त ज्वालामुखी कहा जाता है।

(3) शान्त / सुषुप्त ज्वालामुखी-ऐसे ज्वालामुखी जिनमें ऐतिहासिक काल में उद्गार नहीं हुए और ना होने की संभावना है, इन्हें सुप्त ज्वालामुखी कहते हैं।

भूकंप (Earthquake) 

पृथ्वी की बाह्य परत में अचानक हलचल से उत्पन्न ऊर्जा के परिणाम को भूकंप कहते हैं जिसका शाब्दिक अर्थ ‘पृथ्वी का हिलना होता है। यह ऊर्जा पृथ्वी की सतह पर भूकंपी तर उत्पन्न करती है जो भूमि को हिलाकर या विस्थापित करके प्रकट होती है। भूगर्भ में भूकंप के उत्पन्न होने का प्रारम्भिक बिन्दु को केन्द्र या हाइपो सेंटर कहा जाता है। हाइपो सेंटर के ठीक ऊपर जमीन के सतह पर जो बिंदु है उसे अधिकेन्द्र कहा जाता है। इसकी तीव्रता को रिक्टर स्केल में मापा जाता है।

भूकंप के प्रकार (Types of Earthquakes) 

भूकंप के प्रकार निम्नलिखित हैं-

(1) अंतःप्लेट भूकंप-पृथ्वी की प्लेटों की सीमाओं के आस-पास आने वाले भूकंप से करीब 80 प्रतिशत भूकंपीय ऊर्जा निकलती है। इस प्रकार के भूकंपों को अंतःप्लेट भूकंप कहते हैं क्योंकि इस प्रकार के भूकंप का सीधा सम्बन्ध प्लेटों की परस्पर क्रिया सम्बन्धी बल से होता है। इसलिए प्रशांत बेल्ट के चारों तरफ, मध्य-अटलांटिक पर्वत श्रेणी और उच्च हिमालयी बेल्ट अंतःप्लेट भूकंपीय श्रेणी में आते हैं।

(2) विवर्तनिक भूकंप-दो या उससे अधिक स्थलमंडलीय प्लेटों के परस्पर टकराने के कारण तनाव से संचित ऊर्जा निकलने के कारण भूकंप आते हैं। इन्हें विवर्तनिक भूकंप कहते हैं और ये ज्वालामुखीय भूकंप से भिन्न होते हैं।

(3) वितलीय भूकंप-इस तरह के भूकंप धरती के बहुत नीचे केन्द्रित होते हैं। इनका केन्द्र 700 किलोमीटर गहराई पर भी होता है। कुल दर्ज होने वाले भूकंपों में से इस तरह के भूकंप सिर्फ 5-10 प्रतिशत ही होते हैं

भूकंप के प्रभाव (Effects of Earthquakes)

भूकंप के प्रभावों का संक्षिप्त वर्णन निम्न है- सकरात्मक प्रभाव भूकंप के सकारात्मक प्रभाव निम्न हैं-

(1) भूकंप के आने से स्थल भाग में उभार तथा धंसाव हो जाता है जिसके कारण भूमि की उपजाऊ परत का निर्माण होता है, परिणामस्वरूप कृषि योग्य भूमि में वृद्धि होती है।

(2) भूकंप के आने से भू-स्खलन होता है एवं दरारें पड़ जाती हैं जिससे क्षेत्र विशेष की मिट्टी अपने स्थान से खिसक जाती है और पहले से अधिक उपजाऊ हो जाती है।

(3) भूकंप के आने से भूमिगत जल के प्रवाह में परिवर्तन हो जाता है जिसके परिणामस्वरूप सूखाग्रस्त क्षेत्रों में पानी सहजता से उपलब्ध हो जाता है।

(4) भूकंप से नदियों के मार्ग में बाधा पड़ जाती है जिससे जल स्रोतों का उद्भव हो जाता है।

नकारात्मक प्रभाव

भूकंप के नकारात्मक प्रभाव निम्न है- 

(1) नगरों का नष्ट होना,

(2) समुद्र के भीतर भूकंप से या भूकंप के कारण हुए भू-स्खलन से सुनामी आने का खतरा । 

(3) बाँध क्षतिग्रस्त हो जाते हैं।

(4) भूकंप रोग का कारण हो सकता है।

(5) मूलभूत आवश्यकताओं की कमी।

(6) जीवन की हानि, उच्च बीमा प्रीमियम ।

(7) सामान्य सम्पत्ति की क्षति ।

(8) सड़क और पुल का नुकसान और इमारतों को ध्वस्त होना या इमारतों के आधार का कमजोर हो जाना, इन सब का

कारण हो सकता है।

आपदा प्रबन्धन (Disaster Management) 

आपदा प्रबंधन वह प्रक्रिया है जो आपदा के पूर्व की समस्त तैयारियों, चेतावनी पहचान, प्रशासन, बचाव, राहत, पुनर्वास, पुनर्निर्माण एवं आपदा से बचने के लिए अपनायी जाने वाली तत्पर अनुक्रियाशीलता इत्यादि के उपायों को इंगित करती है। आपदा प्रबंधन आकस्मिक विपदाओं से निपटने के लिए संसाधनों का योजनाबद्ध उपयोग तथा इन विपदाओं से होने वाली हानि को न्यूनतम रखने की कुंजी है। आपदा प्रबन्धन की खास विशेषताएँ अग्रलिखित हैं-

(1) आपदा प्रबन्धन आपदा आने की चेतावनी से लेकर उसके पश्चात् पुनर्वास, पुनर्निर्माण एवं भविष्य के लिए आपदा रोकथाम एवं बचाव इत्यादि कृत्यों तक विस्तारित है। 

(2) यह संपूर्ण लोक प्रशासन की एक ऐसी विशेषीकृत शाखा है

(3) आपदा प्रबंधन एक जटिल तथा बहुआयामी प्रक्रिया है अर्थात् केंद्र, राज्य एवं स्थानीय शासन के साथ-साथ बहुत सारे विभाग, संस्थाएं एवं समुदाय इसमें अपना योगदान देते हैं।

(4) यह प्राथमिक रूप से सरकारी दायित्व को इंगित करता है किन्तु सामुदायिक एवं निजी सहयोग के बिना यह कार्य अधूरा है।

(5) आपदाएं सार्वभौमिक एवं सर्वकालिक घटनाएँ हैं इसलिए आपदा प्रबन्धन का कार्य भी अन्तर्राष्ट्रीय समन्वय से जुड़ा हुआ हैं।

(6) इसके अतिरिक्त आपदा प्रबन्धन के कई आयाम हैं जिनके अन्तर्गत जोखिम विश्लेषण, चेतावनी एवं वैकल्पिक व्यवस्था, बचाव एवं राहत कार्य, बहुउद्देशीय निर्णयन, पुनर्वास एवं पुनर्निर्माण इत्यादि आते हैं-

अपक्षय (WEATHERING)

ऐसी सभी प्रक्रियाएँ जिनसे चट्टानें अपने स्थान पर टूटती रहती हैं और टूटा हुआ पदार्थ अपने मूल स्थान पर ही पड़ा रहता है, अपक्षय कहा जाता है। तापमान और वर्षा के प्रभाव से भूपटल की चट्टानों का बहुत अधिक क्षय होता है।

भौतिक क्रियाओं द्वारा चट्टानों का ढीला पड़ना विघटन तथा रासायनिक क्रियाओं द्वारा चट्टानों का कमजोर होना वियोजन कहलाता है। ये टूटी हुई, मुलायम और ढीली चट्टानों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर हटाती रहती है और मार्ग में उनका क्षय करती रहती हैं।

अपक्षय में भाग लेने वाले प्रमुख कारक है- सूर्यताप, वायु, जल, तुषार, वनस्पतियाँ तथा जीव-जंतु ।

अपक्षय के प्रकार (Types of Weathering) 

भूपटल की चट्टाने अनेक कारणों से अपने स्थान पर टूटती फूटती हैं। इनमें से ताप, जल, तुषार (हिम) जैसे भौतिक कारकों, ऑक्सीकरण, पोलीकरण तथा कार्बोनेशन जैसे रासायनिक कारकों तथा जन्तु और वनस्पतियों जैसे जैविक कारकों का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है अतः इस आधार पर अपक्षय तीन प्रकार का होता है-

1) भौतिक अपक्षय (Physical Weathering) 2) रासायनिक अपक्षय (Chemical Weathering)

3) जैविक अपक्षय (Biological Weathering)

अपक्षय को प्रभावित करने वाले कारक (Factors Affecting Weathering) 

अपक्षय को प्रभावित करने वाले निम्नलिखित कारक हैं- 

(1) चट्टानों की प्रकृति-यदि चट्टानें कोमल हैं तो वे कठोर चट्टानों की अपेक्षा शीघ्र टूट जाती हैं।

(2) भूमि का ढाल -जिन भूमियों का ढाल तीव्र होता है वहाँ अपक्षय मन्द ढाल वाली भूमियों की अपेक्षा अधिक होता है ।

(3) चट्टानों में सन्धियाँ-जिन चट्टानों में सन्धियाँ अधिक पाई जाती हैं उनका अपक्षय शीघ्रता से होता है। 

(4) वनस्पति का आवरण-जिन क्षेत्रों में धरातल वनस्पति से ढका होता है, वहाँ निर्जन भूमि की अपेक्षा कम अपक्षय होता है।

अपरदन (EROSION)

हिमनद या हिमानी (Glaciers) – बर्फ के गतिशील ढेर को हिमनद या हिमानी कहा जाता है। हिमनद अथवा हिमानी के कारण भी धरातलीय उच्चावच में परिवर्तन होते हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में पहले से स्थित नदी घाटी में हिमानी के लंबवत अपरदन से ए आकार की घाटी का निर्माण होता है। अपरदन द्वारा पहले से बनी आकार की घाटी U आकार में बदल जाती है। ये लगातार बर्फ जमने से पड़ने वाले दबाव और गुरुत्वबल के कारण हिम के पिघलने से फिर पुनः जमने से बर्फ गतिशील हो जाती है।

हिमानी के मार्ग में जब कोई बड़ा ऊँचा चट्टान अवरोधक के रूप में आता है तो हिमानी उसके ऊपर से बहने लगती है तथा बढ़ते समय अपघर्षण के कारण इसे मंद व चिकना कर देती है। और विपरीत दिशा में अधिक तीव्र ऊबड़-खाबड़ ढाल बना देती है। ऐसे चट्टानी टीले दूर से दिखने में भेड़ की पीठ के समान दिखते हैं जिन्हें भेडशिला कहते हैं। हिमानियों द्वारा अपरदित व् परिवहित पदार्थों का निक्षेप हिमोढ़ कहलाता है। यह प्रायः उन्हीं स्थानों पर होता है जहाँ हिमानियाँ जल में परिवर्तित होने लगती हैं। जब हिमानियों के तलस्थ हिमोढ का थोड़े-थोड़े समय में गुम्बदाकार टीलों के रूप में जमाव होता है तो उसे ड्रमलिन कहते हैं।

समुद्री लहरें (Ocenic Waves) – सागरीय जल की क्रिया द्वारा सागरीय क्लिफ, समुद्री गुफा, वातछिद्र मेहराब, स्टैक तथा पुलिन आदि स्थलाकृतियों का विकास होता है। इस प्रकार अपरदन के प्रकमों के द्वारा विभिन्न प्रकार की स्थलाकृतियों का विकास होता है।

अपरदन के प्रमुख कारकों में भू-आकृति के निर्माण की दृष्टि से व्यापक व प्रभावी दूर बहता हुआ जल है क्योंकि अंत में स्थल के अपरदन से प्राप्त सभी प्रकार के मलबे नदियों के मार्ग से ही समुद्रों में परिवहित होते हैं। लहरों के कटाव से समुद्री तटों या पुलिन का निर्माण होता है। लहरों के बार-बार टकराने से तट का निचला भाग अपरदित हो जाता है किन्तु ऊपरी भाग खड़ा रह जाता है। इस प्रकार निर्मित आकृति को भृगु या क्लिफ कहते हैं ।

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