शिक्षा और सामाजिक परिवर्तन और सामाजिक परिवर्तन के कारक

सामाजिक परिवर्तन का अर्थ

सामाजिक परिवर्तन से अभिप्राय जीवन के किसी भी पक्ष में किसी भी प्रकार को परिवर्तन होता है। सामाजिक परिवर्तन में दो शब्द है 

(i) सामाजिक 

(ii) परिवर्तन 

सामाजिक शब्द से आशय है-समाज से सम्बन्धित । मैकाइवर (MacIver) ने समाज को सामाजिक सम्बन्धों का जाल बताया है। परिवर्तन से आशय भिन्नता का होना है । प्रत्येक वस्तु का एक ‘पूर्व रूप’ होता है, कुछ समय पश्चात् उसमें भिन्नता आ जाती है ।

शिक्षा और सामाजिक परिवर्तन और सामाजिक परिवर्तन के कारक

हम यहाँ पर पहले परिवर्तन का अर्थ स्पष्ट करेंगे। फिचर (Fitcher) ने परिवर्तन का अर्थ इस प्रकार बताया है- “परिवर्तन को संक्षेप में पहले की अवस्था अथवा अस्तित्व के प्रकार के अन्तर के रूप में परिभाषित किया जाता है।” सामाजिक परिवर्तन समाज से सम्बन्धित होता है। कुछ समाजशास्त्रियों के अनुसार सामाजिक ढाँचे में होने वाला परिवर्तन सामाजिक परिवर्तन कहलाता है। परन्तु इसके विपरीत कुछ अन्य समाजशास्त्री सामाजिक सम्बन्धों में अन्तर को सामाजिक परिवर्तन कहते हैं । समाज सामाजिक संगठन, सामाजिक ढाँचे तथा सामाजिक सम्बन्धों का मिश्रित रूप होता है । अत: समाज में परिवर्तन इन सभी भागों में होने वाला परिवर्तन है ।

सामाजिक परिवर्तन के कारक (Factors of Social Change) 

सामाजिक परिवर्तन के कुछ कारक निम्नांकित हैं-

(1) प्राकृतिक या भौगोलिक कारक (Physical or Geographical Factors)— जैसे जंगल, पहाड़, वर्षा, ऋतुएँ, मौसम, समुद्र, भूकम्प, महामारी, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, आदि, जहाँ प्रकृति का रूप भयंकर होता है, वहाँ मानव प्रायः प्राकृतिक आपदाओं के कारण जीवन व्यापार में परिवर्तन लाने को विवश हो जाता है। साथ ही प्रकृति के शांत रहने पर निर्माण एवं विकास के कार्य अधिक होते हैं जिससे मानव जीवन प्रभावित होता है।

(2) जनसंख्यात्मक कारक (Demographic Factor ) — जनसंख्या वृद्धि से मानव संसाधन पर प्रभाव पड़ता है। एक स्थान से दूसरे स्थान पर जनसंख्या में कम या अधिक दबाव भी परिवर्तन का कारक बनता है। ज्यादा साथ अधिक जनसंख्या के कारण बेरोजगारी एवं सामाजिक विघटन भी बढ़ता है। यह परिवर्तन का विशिष्ट कारक है।

(3) प्रौद्योगिकीय कारक (Technological Factor )—प्रौद्योगिकी कारक के फलस्वरूप सामाजिक परिवर्तन होता है। इसके कारण नयी संस्थाओं की स्थापना के साथ छुआछूत एवं जातिवाद का कमजोर होना तथा नगरीकरण में वृद्धि होती है जिसके कारण समाज में परिवर्तन होता है प्रख्यात समाजशास्त्री आगबर्न के अनुसार रेडियो के आविष्कार के फलस्वरूप समाज में 150 प्रकार के परिवर्तन रेखांकित किये गये। इसी क्रम में औद्योगीकरण की प्रक्रिया, श्रम विभाजन आदि के फलस्वरूप सामाजिक परिवर्तन होते हैं।

(4) सांस्कृतिक कारक (Cultural Factor)– संस्कृति ही निर्धारित करती है कि समाज कैसा होगा। सांस्कृतिक प्रायः तकनीकी एवं उद्योग-धन्धों के विकास के साथ जनसंख्या की स्थिति एवं प्रसार भी सुनिश्चित करती है। भौतिक संस्कृति हमारी आदतों एवं अभौतिक संस्कृति हमारे व्यवहार में परिवर्तन लाती है। सांस्कृतिक प्रसार के कारण भी परिवर्तन होता है जैसे मूल्यों में परिवर्तन के साथ सरकारी एवं प्राइवेट कार्यालयों/कारखानों में ‘कार्य संस्कृति’ में बदलाव का होना।

मूर (Moore) के अनुसार – सांस्कृतिक कारक समाज में तीन प्रकार से परिवर्तन करते हैं-

(i) सांस्कृतिक संघर्ष –शक्तिशाली संस्कृति का कमजोर संस्कृति पर प्रभाव। 

(ii) सांस्कृतिक प्रसार-एक संस्कृति के तत्व दूसरी संस्कृति में फैलकर सामाजिक संरचना को प्रभावित करते हैं।

(iii) पर-संस्कृति ग्रहण— दो संस्कृतियों में सम्पर्क के कारण समाज में परिवर्तन होता है।

(5) राजनीतिक कारक (Political Factor ) — राजनीतिक कारणों के फलस्वरूप ही युद्ध, सन्धि आदि के मार्ग प्रशस्त होते हैं। युद्धों के कारण महाविनाश की स्थिति बनती है तथा समाज में नये समीकरण जन्म लेते हैं। प्राचीनकाल में हुए महाभारत के युद्ध सहित विश्व के दो महायुद्धों के कारण सामाजिक संरचना बुरी तरह प्रभावित हुई। फलतः जबरदस्त रूप से समाज में परिवर्तन हुआ।

(6) धार्मिक कारक (Religious Factor )— चार्ल्स अलवर्ड (Charles Alward) के अनुसार ; धर्म सामाजिक परिवर्तन का एक विशेष कारक है। समाज और व्यक्ति पर सदैव ही धर्म का नियन्त्रण रहा है। भारतीय समाज में धर्म की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण रही है और है भी आर्य समाज, ब्रह्म समाज जैसे धार्मिक आन्दोलनों के फलस्वरूप भारत में हर स्तर पर परिवर्तन हुए हैं।

शिक्षा मे सामाजिक परिवर्तन की भूमिका

सामाजिक परिवर्तन में शिक्षा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण योगदान करती है । सामाजिक परिवर्तन पहले भौतिक सांस्कृतिक परिवर्तन के रूप में होता है । फिर उसका रूप अभौतिक सांस्कृतिक परिवर्तन का हो जाता है । शिक्षा का कार्य यह भी है कि वह वर्तमान में उन परिवर्तनों को लाने का प्रयास करे जो समाज में नवजीवन का संचार कर दे और इस प्रकार समाज प्रगति की ओर बढ़ने लगे ।

समाज सदैव सक्रिय रहता है और इसी कारण उसमें सदैन परिवर्तन आता रहता । कुछ व्यक्ति सामाजिक परिवर्तन लाने का प्रवास करते हैं । सामाजिक ढाँचे में परिवर्तन ही सामाजिक परिवर्तन है । हम अभी बता चुके हैं कि कुछ शिक्षाविद् सामाजिक परिवर्तन को सांस्कृतिक परिवर्तन मानते हैं । ब्राउन (Brown) भी इसी को मानता है । वह कहता है कि सामाजिक परिवर्तन का एक मुख्य रूप सांस्कृतिक परिवर्तन है ।

सामाजिक परिवर्तन में शिक्षा, शिक्षक एवं विद्यालय (Education, Teacher and School for Social Change)

शिक्षा एक उद्देश्यपूर्ण क्रिया है। समाज अपने सदस्यों के लिए शिक्षा के स्वरूप का निर्धारण करता है। समाज के बदलने पर शिक्षा के स्वरूप में भी परिवर्तन हो जाता है। शिक्षा समाज में आवश्यक परिवर्तन लाती है किन्तु यह ध्यान रखती है कि परिवर्तन के कारण समाज के शाश्वत मूल्यों में किसी प्रकार का अन्तर न आने पाये। शिक्षा द्वारा ही समाज के व्यक्ति यह निर्णय कर पाते हैं कि कौन-सा परिवर्तन उचित है और कौन अनुचित है। शिक्षा ही उसके परिवर्तन का महत्व स्पष्ट करती है और बाधक कारकों को दूर करने में सहायक होती है। समाज के शिक्षित व्यक्ति ही अपने में व्याप्त कुरीतियों, अंधविश्वासों को दूर कर वांछित परिवर्तन ला सकते हैं। इस प्रकार सामाजिक परिवर्तन के लिए शिक्षा एक प्रकार से साधन या मार्ग दर्शक की भूमिका अदा करती है जो परिवर्तन को सही राह पर ले जाने में सहायक होता है। इसीलिए विभिन्न विद्वानों ने, शिक्षा में सुधार एवं विकास के लिए गठित समितियों एवं आयोगों ने अपने सुझावों में प्रायः शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का एक शक्तिशाली माध्यम माना है।

शिक्षा और सामाजिक परिवर्तन और सामाजिक परिवर्तन के कारक

जॉन ड्यूवी ने इस सम्बन्ध में विचार व्यक्त किया है कि शिक्षा ही एक ऐसा साधन है जो किसी भी समाज को प्रगति की ओर ले जा सकता है। इस सम्बन्ध में शिक्षाविद् डॉ. राधाकृष्णन का स्पष्ट मत है कि शिक्षा परिवर्तन का साधन है। उनके अनुसार जो कार्य साधारणतया समाज में परिवार, धर्म, सामाजिक और राजनीतिक संस्थाओं द्वारा किया जाता है वही आज शिक्षा संस्थाओं के द्वारा किया जाता है। इस सम्बन्ध में शिक्षा आयोग (1964-66) ने विचार व्यक्ति किया है की  यदि एक विशेष मापक्रम (पैमाने पर बिना किसी हिंसात्मक क्रांति के परिवर्तन लाना है तो केवल एक ही यंत्र या साधन है जिसका उपयोग किया जा सकता है और वह है शिक्षा । शिक्षा सामाजिक परिवर्तन में सहायक है। यह सामाजिक परिवर्तन का एक शक्तिशाली साधन है जो समाज के सदस्यों को परिवर्तन के लिए तैयार करती है। शिक्षा सामाजिक परिवर्तन को एक समुचित दिशा एवं संरक्षण प्रदान करती है। यह समाज में बुद्धिजीवियों एवं समाज सुधारकों का ऐसा वर्ग तैयार करती है तो सजगतापूर्वक समाज में परिवर्तन की भूमिका को सुनिश्चित करती है।

सामाजिक परिवर्तन के संदर्भ में शिक्षा, शिक्षक एवं विद्यालय के विभिन्न कार्य इस प्रकार हैं—

(1) शाश्वत मूल्यों का संरक्षण (Preservationl of Eternal Values)— प्रत्येक समाज में कुछ स्थायी मूल्य होते हैं जो समाज को स्थायित्व प्रदान करते हैं। भारतीय समाज के शाश्वत मूल्य हैं— सहिष्णुता, सत्यं शिवं, दूसरे का कल्याण, अहिंसा आदि। कभी किसी कारणवश सामाजिक परिवर्तन की स्थिति में इनमें दुर्बलता की स्थिति बनती है तो शिक्षा ही इन मूल्यों का संरक्षण करती है।

(2) नवीन परिवर्तन लाने में सहायक (Helpful in New Changes) – समाज में विभिन्न कारकों के फलस्वरूप नवीन विचार जन्म लेते हैं जो सामाजिक परिवर्तन का आधार बनते हैं। शिक्षा इन विचारों एवं परिवर्तनों को स्वीकार करने के लिए अनुकूल वातावरण का सृजन करती है तथा लोगों को इसे स्वीकार करने के लिए मानसिक रूप से तैयार करती है।

(3) सांस्कृतिक हस्तांतरण (Cultural Transfer)–सांस्कृतिक हस्तांतरण की क्रिया समाज को स्थायित्व एक निरन्तरता प्रदान करती है। साथ में आवश्यकतानुसार सुधार के लिए भी मार्ग प्रशस्त करती है। इस प्रकार शिक्षा सामाजिक परिवर्तनों की जन्मदाता, प्रवर्तक एवं निदेशक है।

(4) सामाजिक गतिशीलता (Social Mobility )—समाज एक गतिशील सम्बोध है। स्वतः गतिशीलता के कारण इसमें सदैव परिवर्तन होते रहते हैं। शिक्षा इस सामाजिक गतिशीलता को बनाए रखने में प्रयत्नशील रहती है।

(5) सामाजिक सुधार (Social Reforms) – शिक्षा के द्वारा ही समाज मं सुधार हेतु आंदोलन की पृष्ठभूमि सृजित होती है। इसके द्वारा जन-जागृति होती है और समाज में इन सुधारों के लिए स्वीकृति का वातावरण तैयार होता है।

(6) ज्ञान के क्षेत्र में विकास (Development in Fields of Knowledge)— शिक्षा के द्वारा ही प्रतिदिन ज्ञान के विभिन्न आयामों का विस्तार हो रहा है जो परिवर्तन में मार्गदर्शक बनते हैं। इसी के फलस्वरूप नूतन अनुसंधान हो रहे हैं जिनसे समाज के विभिन्न क्षेत्रों में परिवर्तन होते हैं।

(7) सामाजिक परिवर्तन का नेतृत्व (To Lead the Social Change)- समाज में नवीन परिवर्तन लाने के लिए कुशल नेतृत्व की आवश्यकता होती है। शिक्षा समाज में ऐसे कुशल व्यक्तियों का निर्माण करती है जो सामाजिक आंदोलनों एवं परिवर्तनों का नेतृत्व कर सकें।

(8) परिवर्तनों की समीक्षा (Review of Changes) – सभी सामाजिक या सांस्कृतिक परिवर्तन वांछनीय एवं सकारात्मक नहीं होते हैं। शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका ऐसे परिवर्तनों की सदैव समीक्षा करने की है। शिक्षा के द्वारा ही वांछनीय परिवर्तनों को स्वीकार करने का वातावरण बनता है जबकि अवांछनीय परिवर्तनों के लिए स्वीकारोक्ति नहीं होती है।

सामाजिक परिवर्तन पर शिक्षा का प्रभाव

यदि यह सत्य है कि शिक्षा सामाजिक परिवर्तन लाती है तो यह भी सही है कि सामाजिक परिवर्तन शिक्षा को प्रभावित करता है । प्रत्येक समाज अपनी शिक्षा के स्वरूप का निर्माण स्वयं करता है। समाज की आवश्यकताओं के अनुसार ही शिक्षा की रूपरेखा निर्धारित की जाती । यदि समाज में किसी प्रकार का परिवर्तन आता है तो शिक्षा में भी परिवर्तन अपना स्वाभाविक है। इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता कि यह परिवर्तन वैज्ञानिक आविष्कारों के कारण आया है या राजनीतिक दशाओं के कारण आया है या प्राकृतिक घटनाओं के कारण आया है हमारा इतिहास इसकी पुष्टि करता है । प्राचीन भारत में धर्म प्रधान समाज था। अतः उस समय शिक्षा भी धर्म प्रधान थी। 

मध्यकाल तक समाज में कोई विशेष परिवर्तन नहीं आया हैं, अतः शिक्षा भी लगभग अपरिवर्तित रही । वर्तमान में समाज का रूप बदल गया है। विज्ञान की प्रगति ने प्रत्येक व्यक्ति को भौतिकवादी बना दिया है। इसका प्रभाव यह हुआ है कि मनुष्य का रहन-सहन, खान-पान, आचार-विचार तथा मूल्य बिल्कुल बदल गये हैं तथा व्यक्ति का दृष्टिकोण विस्तृत हो गया है। इसका शिक्षा पर प्रभाव यह हुआ है कि पाठ्यक्रम विस्तृत हो गया है । आज शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षा के उद्देश्य, पाठ्यक्रम तथा शिक्षण- विधियाँ सब कुछ बदल गयी हैं। रेडियो तथा टेलीविजन के द्वारा शिक्षा आधुनिक युग है की देन है ।

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