शिक्षा के प्रभावी कारक कौन कौन हैं ? – Shiksha Ke Prabhawi Karak in Hindi

परिवार को शिक्षा का प्रभावशाली साधन बनाने के उपाय भारतीय परिवारों को शिक्षा का प्रभावशाली साधन बनाने के लिए निम्न सुख दिये जा सकते हैं-

शिक्षा के प्रभावी कारक कौन कौन हैं ?

(1) शारीरिक विकास की व्यवस्था 

 घर पर ही मनुष्य के शारीरिक विक की नींव पड़ती है। परिवार को चाहिए कि वह बच्चे के शारीरिक विकास की समति 1 व्यवस्था करे। इसके लिए अग्रलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए-

(i) हवादार घर—बच्चे के स्वास्थ्य के लिए हवादार घर होना बहुत आवश्य है । घर के प्रत्येक कमरे में खिड़कियाँ तथा रोशनदान होने चाहिए। उसमें ताजी हु प्रकाश तथा धूप आने की उत्तम व्यवस्था होनी चाहिए।

(ii) भोजन – बच्चे को नियमित समय पर सन्तुलित एवं पौष्टिक भोजन मिलर चाहिए, क्योंकि यह शारीरिक विकास के लिए आवश्यक है।

(iii) वस्त्र—बालक के वस्त्र स्वच्छ तथा आरामदायक होने चाहिए। वखःबहुत ढीले हों और न ही बहुत तंग ।

(iv) व्यायाम और आराम- बालकों को व्यायाम करने के लिए प्रेरित कर चाहिए । जहाँ तक हो सके माता-पिता को चाहिए कि वे बालकों के लिए उि व्यायाम अथवा खेलकूद एवं आराम की व्यवस्था करें।

(v) व्यक्तिगत स्वच्छता – व्यक्तिगत स्वच्छता शारीरिक विकास के लिए जरूरी है अतः माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों में प्रायः दाँत साफ करने, स करने, नाखून साफ करने तथा शरीर को स्वच्छ रखने की आदत डालें ।

(2) बौद्धिक विकास की व्यवस्था

परिवार को बच्चे के शारीरिक विकास के साथ-साथ उसके बौद्धिक विकास का भी ध्यान रखना चाहिए। बौद्धिक विकास से सम्बन्धित खिलौने, पहेली बॉक्स, चित्र पहेलियाँ, शिक्षाप्रद कहानियों की पुस्तकों आदि की व्यवस्था करनी चाहिए। माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों की कल्पना शक्ति, चिन्तन, एकाग्रता तथा स्मरण शक्ति के विकास के लिए पहेलियाँ तथा कहानियाँ सुनायें।

(3) चारित्रिक विकास 

वास्तव में परिवार ही चरित्र की बुनियाद रखता है । बच्चे के चरित्र का विकास की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए। परिवार को बच्चे में सहानुभूति, सहनशीलता, सदाचार, सच्चाई, ईमानदारी, परिश्रम, परोपकार, कर्तव्यपरायणता और आत्म-त्याग आदि गुणों को विकसित करना चाहिए। घरवालों को चाहिए कि वह बच्चों के सामने सदा आदर्श प्रस्तुत करें जिससे चरित्र का निर्माण हो सके।

(4) सामाजिक विकास

घर वालों को प्रारम्भ से ही बालक को सामाजिक रीति-रिवाजों, उठने-बैठने और अभिवादन करने के ढंगों को सिखाना चाहिए जिससे नये लोगों से मिलने में बालक झिझक अनुभव न करे ।

(5) भावात्मक विकास

माता-पिता को परिवार में मैत्री पूर्ण ढंग से रहना चाहिए। उन्हें बच्चों को उचित स्नेह प्रदान करना चाहिए ताकि उनमें भावात्मक संरक्षण की भावना का विकास हो सके।

(6) सांस्कृतिक विकास

परिवार को बालक के मन में अच्छी सभ्यता और संस्कृति के बीज बोने चाहिए। इसके लिए अच्छे लोगों के उदाहरण प्रस्तुत करने चाहिए।

(7) धार्मिक एवं आध्यात्मिक विकास

परिवार को बच्चों के धार्मिक एवं आध्यात्मिक विकास के लिए धार्मिक नेताओं की जीवनियों तथा धार्मिक मान्यताओं से परिचित करना चाहिए । बच्चों को दैनिक प्रार्थनाओं, धार्मिक स्थानों में पूजा तथा ईश्वर भक्ति के प्रति प्रोत्साहित करना चाहिए। बच्चों में सत्यं शिवं और सुन्दरम् की भावना .को विकसित करना चाहिए।

(8) सौन्दर्यात्मक विकास

प्लेटो का कहना है कि, “यदि आप चाहते हैं कि बालक सुन्दर वस्तुओं की प्रशंसा तथा निर्माण करे तो उसके चारों ओर सुन्दर वस्तुएँ प्रस्तुत कीजिए ।” इसके लिए घर का वातावरण सुन्दर बनाने की आवश्यकता है। यदि बालक से उसके पहनने के कपड़े, रंग, डिजायन पसन्द करायी जाये, उसके कमरे की सजावट, घर की स्वच्छता, बाग अथवा प्रकृति का निरीक्षण कराया जाय तो इन कार्यों द्वारा बालक में सौन्दर्यात्मकता का विकास किया जा सकता है।

(9) नागरिकता का विकास  

घर के सदस्यों को चाहिए कि वे आरम्भ से ही बच्चों को नागरिकों के कर्त्तव्य और अधिकार बतलायें जिससे उनका व्यावहारिक ज्ञान बढ़े।

(10) सर्वांगीण विकास

परिवार को बच्चे का सर्वांगीण विकास करने द लिए ऐसे मनोवैज्ञानिक वातावरण का निर्माण करना चाहिए जिसमें रहते हुए वह खेलन कूदने के साथ-साथ पढ़ने-लिखने तथा सांस्कृतिक कार्यों में भी भाग लेते हुए पूर्ण से विकसित हो सके ।

(11) माता-पिता को शिक्षित करना

घर को शिक्षा का प्रभावशाली साध बनाने के लिए आवश्यक है कि भारतीय परिवारों से निरक्षरता को दूर किया जाये अभिभावकों को भी एक निश्चित स्तर तक शिक्षा दी जाये । पारिवारिक सदस्यों को प्रशिक्षण दिया जाये । थॉमस एवं लैंग के अनुसार इस प्रशिक्षण का आ निम्नलिखित बातें होनी चाहिए-

(i) पैतृकता के नियमों का पालन किया जाये। 

(ii) पैतृक दोषों को दूर करने के उपाय किये जायें।

(iii) संतति-निग्रह के साधन अपनाये जायें। 

(iv) प्रेम और प्रजनन का महत्व ।

(v) बालक के विकास, स्वास्थ्य, रुचियों और दृष्टिकोण आदि की शिक्षा । के घरेलू मामलों की देखभाल ।

(vi) सहयोगी लोकतन्त्रीय आदर्श ।

यहाँ जमीन से जुड़े शिक्षा-विचारक गिजु भाई’ के निम्नांकित शब्द विचारणीय हैं-“हमारे घरों में ऐसी खूंटियाँ कहाँ हैं कि जिन तक बालक के हाथ पहुँच सकें । हमारे घरों में टंगी बढ़िया तस्वीर बहुत ऊँचाई पर टँगी होती है । उनकी तरफ हमारा अपना ध्यान ही बहुत कम जाता है। ऐसी स्थिति में उनका बालकों के लिए क्या उपयोग रह जाता है।”

इस महान् विचारक ने इस तथ्य पर बल दिया कि घर को बालोपयोगी बनाया जाए। ऐसा तभी सम्भव हो सकेगा जब माता-पिता बालक रूपी अतिथि का स्वागत करने के लिए मन से तैयार रहें और अपने निजत्व को छोड़कर स्वयं बालक बन जायें।

समाज का महत्व

व्यक्ति और समाज का परस्पर घनिष्ट सम्बन्ध है। यद्यपि यह सत्य है कि व्यक्ति उत्तर- समाज को प्रभावित करता है किन्तु वह स्वयं भी समाज से प्रभावित होता है। जन्म समाज का महत्व लेते ही वह समाज के प्रभाव से आने लगता है। प्रारम्भ में तो माता-पिता एवं परिवार के सदस्य तत्पश्चात् पास-पड़ोस, इष्ट मित्र, अन्य समूहों, संस्थाओं आदि से वह शिक्षित होता रहता है। ये सभी समाज के अंग हैं जिनका बालक की शिक्षा पर अनौपचारिक प्रभाव रहता है । इन प्रभावों के फलस्वरूप उसके विचारा, मूल्यों अभिवृत्तियों, आदि का विकास इस ढंग से होता है, जो सामाजिक दृष्टि से अनुमोदित होते हैं । इस प्रकार बालक समाज का अच्छा सदस्य हो पाता है। यह समाज में अपनी विभिन्न भूमिकाएँ—पारिवारिक, आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक आदि निभाने के योग्य होता है।

शिक्षा के प्रभावी कारक इस रूप में एक ओर तो समाज के प्रभाव के फलस्वरूप व्यक्ति के व्यवहारों पर नियन्त्रण होता है, साथ ही व्यक्ति समाज के प्रभाव से विकसित अपनी योग्यताओं व क्षमताओं के कारण सामाजिक न्यूनताओं आदि को दूर करने का प्रयास भी करता है । इससे सामाजिक परिवर्तन एवं प्रगति भी होती है । इससे स्पष्ट है कि समाज के एक-सदस्य के विकास में समाज की महत्वपूर्ण भूमिका है जिसका लाभ व्यक्ति के साथ-साथ समाज को भी मिलता है। इससे समाज का शैक्षिक महत्व सिद्ध होता है।

विद्यालय को शिक्षा का प्रभावशाली साधन

विद्यालयों को शिक्षा का प्रभावशाली साधन बनाने के लिए निम्नलिखित सुझाव दिये जा सकते हैं-

1. घर या परिवार से सहयोग — शिक्षा का प्रभावशाली साधन बनने के लिए स्कूल को घर से सहयोग प्राप्त करना चाहिए। यह सहयोग जितना अधिक होगा उतनी अधिक सफलता से स्कूल अपना कर्त्तव्य निभा सकेगा। माता-पिता को अपने बच्चों की आदतों, रुचियों, गुणों और अवगुणों को शिक्षकों को बताकर सहयोग देना चाहिए। इन बातों को जानकर शिक्षक अच्छी प्रकार से छात्रों का पथ-प्रदर्शन कर सकते हैं। Shiksha Ke Prabhawi Karak in Hindi दूसरी ओर माता-पिता भी अपने बच्चों के बारे में शिक्षकों के विचारों से लाभ उठा सकते हैं। शिक्षकों और अभिभावकों में निकट सम्पर्क स्थापित करने के लिए निम्नलिखित उपायों को अपनाया जा सकता है- 

(1) अभिभावक दिवस मनाना ।

(2) अभिभावक अध्यापक संघ का निर्माण करना । 

(3) प्रबन्धक कमेटियों में माता-पिता को प्रतिनिधित्व देना । 

(4) अध्यापकों का विद्यार्थियों के घरों में जाना।

(5) अभिभावकों को स्कूल के उत्सवों तथा कार्यक्रमों में निमन्त्रित करना । 

(6) अभिभावकों को रिपोर्ट भेजना।

(7) अभिभावकों से रिपोर्ट प्राप्त करना ।

(8) शिक्षा-सम्मेलनों का आयोजन करना । लि विशिष्ट मनोरंजन कार्यक्रम का आयोजन करना ।

2. सामाजिक जीवन से सम्पर्क – विद्यालय समाज का छोटा रूप होना चाहिए । विद्यालय का सामाजिक जीवन से घनिष्ठ सम्बन्ध होना चाहिए। इसके लिए निम्नलिखित साधन अपनाये जा सकते हैं —

(i) प्रौढ़ शिक्षा का केन्द्र-विद्यालय को प्रौढ़ शिक्षा का केन्द्र होना चाहिए । इससे हमारे देश की निरक्षरता की समस्या कुछ सीमा तक हल हो सकती है । इसके अतिरिक्त प्रौढ़ व्यक्ति स्कूल के सम्पर्क में रहने के कारण स्कूल की प्रगति में रुचि लेने लगेंगे :-

(ii) समाज सेवा संघों का निर्माण-सैयदेन ने स्कूलों में समाज सेवा संघों के निर्माण पर बहुत जोर दिया है। ये संघ अकाल पड़ने पर, बाढ़ आने पर, छूत को बीमारियाँ फैलने पर, संकट आने पर तथा उत्सवों और जलूसों में लोगों की सहायता करें। संघ के कार्यों को स्काउटिंग के कार्यों के साथ जोड़ें।

(iii) सामाजिक सर्वेक्षण क्लबों का संगठन-सैयदेन का कहना है कि पानी का प्रबन्ध, स्कूल को सामाजिक सर्वेक्षण करने के लिए क्लबों का निर्माण करना चाहिए। इस क्लब के सदस्य स्वास्थ और सफाई की व्यवस्था, नालियों का प्रबन्ध, सड़कों की दशा आदि समस्याओं के बारे में रिपोर्ट तैयार करें तथा अपने सुझाव देकर मुख्य अध्यापक द्वारा म्युनिसिपैलिटी को भिजवायें ।

(iv) समाज सेवा में भाग लेना – विद्यालय को विद्यार्थियों को समाज सेवा में भाग लेने के लिए प्रेरित करना चाहिए। विद्यार्थियों को साथ लेकर अध्यापक समाज में जायें और अशिक्षित व्यक्तियों को शिक्षा देकर, उन्हें पढ़ना, लिखना सिखाकर, सफाई और श्रमदान करके, बीमारों की सेवा करके, समाज सेवा के भाव उत्पन्न करें। इससे समाज का कल्याण होगा। यह कार्य राष्ट्रीय सेवा योजना (NSS) के द्वारा आसानी से किया जा सकता है।

(v) सामाजिक विषयों का शिक्षण-आज का बालक कल का नागरिक होगा । वह आदर्श नागरिक तभी होगा यदि उसको समाज का ज्ञान होगा । अतः विद्यालयों में नागरिकशास्त्र, अर्थशास्त्र, इतिहास, भूगोल आदि विषयों का ज्ञान कराया जाए । इन विषयों का ज्ञान केवल सूचना देकर न किया जाये परन्तु समस्या का समाधान की कराया जाये ।

(vi) समाज के सदस्यों को निमन्त्रण-विद्यालय को चाहिए कि वह समाज के एसे सदस्यों को समय-समय पर निमनत्रण दे जो विभिन्न उपयोगी कार्यों में लगे हुए हैं । एस सदस्यों के स्कूल में भाषण करवाये जायें और वे अपने कायों के बारे में बतायें ऐस करने से विद्यार्थियों का ज्ञान बढेगा ।

3. राज्य का संरक्षण- नैपोलियन ने ठीक ही कहा था शिक्षा सरकार को प्थम कार्ये होना चाहिए'” शिक्षा सरकार का ही कार्य है । अत: शिक्षा का प्रबभ करना सरकार का ही दायित्व है । सरकार अग्रलिखित उपायों का प्रयोग कर सकते हैं  ।

(i) अच्छे विद्यालयों की स्थापना – सरकार को स्थानीय व्यवस्था के अनुकल विभिन्न प्रकार के अच्छे विद्यालयों की स्थापना करनी चाहिए।

(ii) कुशल एवं प्रशिक्षित– अध्यापकों की नियुक्तिसरकार को अध्यापकों के प्रशिक्षण का उचत प्रबन्ध करना चाहिए । अध्यापक राष्ट्र का निर्माता है। शिक्षा ईवें आर चूनों में नहीं बल्कि अध्यापक के सूक्ष्म प्रभाव में निहित हैं । अतः सरकार को कुशल एवं प्रशिक्षित अध्यापकों की व्यवस्था करनी चाहिए । सरकार को सुप्रशिक्षित अध्यापक तैयार करने के लिए प्रशिक्षण कॉलेजों को सुसज्जित करना चाहिए।

(iii) उदार आर्थिक सहायता प्रदान करना- सरकार को शिक्षा के लिए उदार आर्थिक सहायता प्रदान करनी चाहिए। सरकार को प्राइमरी एवं सैकण्डरी स्कूलों, विश्वविद्यालयों और प्रशिक्षण कॉलेजों को सुसज्जित करने के लिए उदार रूप से आर्थिक सहायता प्रदान करनी चाहिए।

(iv) विद्यालयों का नियन्त्रण और निरीक्षण-सरकार को विद्यालयों का भली-भाँति नियन्त्रण और निरीक्षण करना चाहिए। योग्य इन्सपैक्टरों की संख्या को बढ़ाकर स्कूलों को उचित निर्देशन दिया जाये।

(v) ट्रेनिंग कॉलेजों का पुनर्गठन – आज देश के अधिकांश ट्रेनिंग कॉलेज अंग्रेजों के समय की लकीर को पीट रहे हैं। इनमें से कितने ही छात्रों को डिग्री दिलाने की दुकानें बन गये हैं । इनकी ओर ध्यान देने का सरकार को स्वतन्त्रता के इस लम्बे समय में अभी अवकाश ही नहीं मिला है। यह अति आवश्यक है कि भारत की वर्तमान आवश्यकताओं और शिक्षा की आधुनिक प्रवृत्तियों एवं सिद्धान्तों को ध्यान में रखकर सरकार इसका पुनर्गठन करे ।

सैयदेन (Saiyidain) का कथन है कि अपने सर्वोत्तम रूप में ये विद्यालय ऐसे स्थान हैं, जहाँ पढ़ना-लिखना, सीखना आदि में या इतिहास, भूगोल और विज्ञान आदि में औपचारिक शिक्षा दी जाती है। अपने निम्नतम रूप में ये ऐसे स्थान हैं जहाँ बच्चों के उल्लास और कार्य के प्रति प्रेम का गला घोंटा जाता है।

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