शिक्षा में प्रकृतिवाद से अभिप्राय, अर्थ परिभाषा और विशेषताएँ In Hindi

 प्रकृतिवाद का अर्थ

प्रकृतिवाद का मूल सिद्धान्त है— यथार्थता (Reality) । प्रकृति एक ही वस्तु में प्रकृति से पर कोई यथार्थता नहीं है। यही वह विशेषता है जिसके कारण प्रकृतिवाद आदर्शवाद और प्रयोगवाद से भिन्न है। प्रकृतिवाद सबसे पुरानी विचारधारा है। इस विचारधारा के अनुसार प्रत्येक वस्तु प्रकृति से उत्पन्न होती है। वह वस्तु उसी में विलीन भी हो जाती है। प्रकृतिवाद भौतिक तत्व की प्रधानता देता है। इस प्रकार प्रकृतिवाद को यथार्थवादी विचारधारा भी कहा जा सकता है।

शिक्षा में प्रकृतिवाद से अभिप्राय, अर्थ परिभाषा और विशेषताएँ In Hindi

प्रकृतिवाद की परिभाषा

प्रकृतिवाद की कुछ परिभाषाएँ इस प्रकार हैं-

1. पैरी—“प्रकृतिवादी विज्ञान नहीं है, अपितु विज्ञान के विषय में दावा है। कार्य केवल क अधिक स्पष्ट रूप से, यह इस बात का दावा है कि वैज्ञानिक ज्ञान अन्तिम है जिसमें विज्ञान से बाहर अथवा दार्शनिक ज्ञान का कोई स्थान नहीं है।”

“Naturalism is not science but an assertion about science. More specially it is the assertion that scientific knowledge is final having no room for extra scientific or philosophical knowledge.” –Perry

2. रस्क- “प्रकृतिवादी इच्छा अथवा अनिच्छा से उन व्यक्तियों द्वारा अपनायी गयी स्थिति है दर्शनशास्त्र का अध्ययन शुद्ध वैज्ञानिक दृष्टिकोण से करते हैं।”

3. जेमन एण्ड वार्ड- “प्रकृतिवाद वह सिद्धान्त है जो प्रकृति को ईश्वर से पृथक् करता है, आत्मा को पदार्थ के अधीन करता है और अपरिवर्तनीय नियमों को सर्वोच्चता प्रदान करता है।”

“Naturalism is the doctrine which separates nature from God subordinates spirit to matter and sets up unchangeable laws as supreme, – James and Wad

उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि प्रकृतिवादी दर्शन की वह विचारधारा है जो प्रकृति को मूल तत्व मानती है। इस दर्शन के अनुसार यह भौतिक जगत ही सत्य है। इसके अतिरिक्त और किसी शक्ति का कोई अस्तित्व नहीं है।

प्रकृतिवाद शिक्षा की विशेषताएँ

रूसो (Rousseau) प्रकृतिवादी शिक्षा का प्रबल समर्थक माना जाता है। एडम्स (Adams) ने रूसो के विषय में लिखा है- “कदाचित रूसो सबसे प्रमुख प्रकृतिवादी है जिसने शिक्षा पर जो लिखा है, वह शायद ही किसी ने कभी लिखा हो।” प्रकृतिवादी शिक्षा की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं-

(1) प्रकृति की ओर लौटो (Back of Nature ) — प्रकृतिवादी दार्शनिक के अनुसार, “प्रकृति के पथ का अनुकरण करना चाहिए।” इस दर्शन के अनुसार प्रत्येक वस्तु प्रकृति से उत्पन्न होती है। रूसो का कथन है—“प्रत्येक वस्तु नियन्ता के यहाँ से अच्छे रूप में आती है। केवल मनुष्य के सम्पर्क में वह दूषित हो जाती है।”

अपनी इस विचारधारा के कारण रूसो ने कृत्रिमता के विरुद्ध आन्दोलन चलाया तथा प्रकृति की ओर लौटने का नारा बुलन्द किया। रूसो का कृत्रिमता के विरुद्ध कहना था कि, “प्रचलित व्यवस्था को उलट दो और तुम सदा ठीक करोगे।”

रूसो का प्रकृति के पथ पर चलने से अभिप्राय यह था कि बालक को अपने विकास के लिए स्वतंत्र छोड़ दिया जाए। प्रकृति ही बालक की शिक्षा का प्रबन्ध करेगी। इस दर्शन मानने वालों के अनुसार—शिक्षा वही है जो बालक को प्रकृति की ओर तथा प्राकृतिक परिस्थितियों की ओर लौटाती है। इस विचारधारा के अनुसार शिक्षक का य में दावा है। कार्य केवल कभी-कभी मार्ग-प्रदर्शन करना है। इस प्रकार बालक प्रकृति की देख-रेख है जिसमें तथा सम्पर्क में रहकर अपने स्वयं के अनुभव के द्वारा सर्वोत्तम शिक्षा ग्रहण कर सकता है।

(2) बाल-केन्द्रित शिक्षा (Child-Centred Education)—प्रकृतिवादियों के अनुसार शिक्षा की प्रक्रिया में बालक का केन्द्रीय स्थान है। इस प्रकार वे शिक्षा का केन्द्र बालक को मानते हैं। शिक्षक, पाठ्य-सामग्री तथा पाठ्य-पुस्तक बालक के पूरक हैं। इस विचारधारा के अनुसार—बालक शिक्षा के लिए नहीं है वरन् शिक्षा बालक के लिए है। बालक न तो शिक्षा पर आश्रित होता है और न पाठ्य-पुस्तक पर। एडम्स (Adams) ने इस तथ्य को अपने शब्दों में इस प्रकार व्यक्त किया है, “प्रकृतिवाद वह शब्द है जिसे शिक्षा के सिद्धान्तों में अपनाया गया है। यह एक प्रशिक्षण की पद्धति है जो विद्यालय अथवा पुस्तकों पर आधारित नहीं है, वरन् छात्र के वास्तविक जीवन के संचालन में है।

वर्तमान युग में शिक्षा में प्रगति दिखाई देती है, उसका कारण शिक्षा के क्षेत्र में बालक को प्रधान बनाना ही है।

(3) पुस्तकीय ज्ञान का विरोध (Opposed to Bookish Knowledge)— प्रकृतिवादी बालक को पुस्तकीय ज्ञान के विरोधी हैं। रूसो (Rousseau) के विचार में पुस्तकीय ज्ञान कृत्रिम तथा अपूर्ण होता है। बालकों को शिक्षा शब्दों में न देकर कार्यों में दी जानी चाहिए। रूसो ने इसी तथ्य को अपने शब्दों इस प्रकार व्यक्त किया है— “बालकों को शिक्षा शब्दों में नहीं वरन् कार्यों में दी जानी चाहिए। प्रकृतिवादियों का विचार है कि स्वानुभव पर आधारित ज्ञान स्थायी तथा पूर्ण होता है। पुस्तकीय ज्ञान कृत्रिम तथा अपूर्ण होता है।”

(4) मानसिक शक्तियों के अनुसार शिक्षा (Education according to Mental Capacitics)— प्रकृतिवादियों के अनुसार बालक की शिक्षा का प्रबन्ध रुचि, अभिरुचि तथा आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। बालक का विकास उसकी विभिन्न अवस्थाओं (Stages) के अनुसार होता है। छोटी आयु के बालकों को गम्भीर विषयों की शिक्षा नहीं दी जानी चाहिए। बालक की शिक्षा का प्रबन्ध उसका बौद्धिक स्तर, रुचि, अभिरुचि तथा आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। प्रकृतिवादियों के अनुसार बालक का स्वाभाविक विकास केवल इसी प्रकार से किया जा सकता है। इस सन्दर्भ में रूसो का यह कथन उल्लेखनीय है” प्रकृति कहती है कि वयस्क व्यक्ति के बनने से पहले बालक को बालक ही रहना चाहिए। यदि यह व्यवस्था भंग की जाती है तो इस बिना पके अग्रिम फलों की उत्पत्ति करेंगे जो शीघ्र ही नष्ट हो जायेंगे। हमें तुरन्त युवक सेवक एवं वृद्ध बालक मिलेंगे।” 

(5) सह-शिक्षा (Co-education)— प्रकृतिवादी दर्शन के अनुसार बालक और बालिकाओं को पृथक रूप से शिक्षा देना अनुचित है। इस प्रकार प्रकृतिधापियान सह-शिक्षा के महत्व को स्वीकार किया है। उनके अनुसार बालक तथा बालिकाओं को एक साथ पढ़ाया जाना चाहिए।

प्रकृतिवाद और अनुशासन का अर्थ

प्रकृतिवाद अनुशासन स्थापित करने के लिए किसी बाहरी शक्ति पर बल नहीं देते । इसी कारण वे स्व-अनुशासन पर बल देते हैं। अनुशासन के सम्बन्ध में प्रकृतिवादियों का सिद्धान्त है। ‘प्राकृतिक परिणामों द्वारा अनुशासन’ (Discipline by Natural Consequences) । वे मानते हैं कि प्रकृति के नियमों को तोड़ने पर बालकों को प्रकृति स्वयं दण्ड देगी। वे इसमें विश्वास करते हैं कि प्रकृति के नियम का उल्लंघन करने पर प्रकृति बालक को स्वयं दण्डित करती है। अतः किसी बाहरी शक्ति के द्वारा अनुशासन स्थापित करने का प्रश्न ही नहीं उठता। रूसो के विचार में बालक को कभी दण्ड नहीं मिलना चाहिए। यह सदैव उनको त्रुटियों के फलस्वरूप प्रकृति के द्वारा आना चाहिए।

हरबर्ट स्पेन्सर भी रूसो के विचारों का समर्थक है। उसके अनुसार, अनुशासन स्थापित करने का सबसे अच्छा ढंग बालक को अपनी क्रियाओं के परिणाम स्वयं भुगतने देना है।

परन्तु हक्सले (Huxley) ने रूसो और स्पेन्सर के उपरोक्त विचारों का समर्थन नहीं किया है। उसका कथन है कि प्रकृति की दण्ड व्यवस्था अत्यन्त कठोर होती है। अत: अनुशासन की यह पद्धति उचित नहीं है।

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