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दिल्ली उच्च न्यायालय ने गुरुवार को आईआरएस अधिकारी समीर वानखेड़े को बड़ा झटका देते हुए शाहरुख खान की कंपनी रेड चिलीज एंटरटेनमेंट के खिलाफ उनके मानहानि मुकदमे पर सुनवाई करने से मना कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह मामला उसके ‘न्याय क्षेत्र’ (Jurisdiction) के दायरे में नहीं आता है। न्यायमूर्ति पुरुषैन्द्र कुमार कौरव ने फैसला सुनाते हुए कहा कि वानखेड़े इस याचिका को उस अदालत के समक्ष पेश कर सकते हैं जो इस मामले पर अधिकार क्षेत्र रखती हो। अदालत ने कहा “इस वाद पर सुनवाई करना इस न्यायालय के न्याय क्षेत्र के दायरे में नहीं आता। इसे वादी को वापस लौटाया जा रहा है ताकि वह इसे किसी सक्षम न्यायालय (जैसे मुंबई की अदालत) के समक्ष प्रस्तुत कर सकें।”

‘द बैड्स ऑफ बॉलीवुड’ के खिलाफ याचिका पर सुनवाई करना हमारे न्याय क्षेत्र के बाहर 

समीर वानखेड़े के अनुसार, वेब सीरीज में ‘मानहानिकारक सामग्री’ उनसे व्यक्तिगत दुश्मनी निकालने और 2021 के मादक पदार्थ तस्करी मामले में शाहरुख खान के बेटे आर्यन खान की गिरफ्तारी का बदला लेने के इरादे से डाली गई थी।
वानखेड़े ने आरोप लगाया कि आर्यन खान द्वारा लिखित और निर्देशित यह वेब सीरीज उन्हें निशाना बनाने और बदनाम करने के लिए रची गई थी।

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वानखेड़े ने रेड चिलीज और नेटफ्लिक्स पर मानहानि का मुकदमा दायर करते हुए दो करोड़ रुपये के हर्जाने की मांग की है, जिसे वह कैंसर रोगियों के लिए टाटा मेमोरियल कैंसर अस्पताल को दान करना चाहते हैं।
वानखेड़े ने अपने मुकदमे में दावा किया कि ‘‘सत्यमेव जयते’’ राष्ट्रीय प्रतीक का हिस्सा है और सीरीज में एक पात्र ‘‘सत्यमेव जयते’’ का नारा लगाने के बाद अश्लील इशारा करते दिखता है।

याचिका में कहा गया है कि यह कृत्य राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 के प्रावधानों का गंभीर और संवेदनशील उल्लंघन है, जिसके लिए कानून के तहत दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान है।

राष्ट्रीय प्रतीक के अपमान का दावा

मुकदमे में एक और गंभीर आरोप लगाया गया है। वानखेड़े के अनुसार: सीरीज का एक पात्र “सत्यमेव जयते” का नारा लगाने के बाद एक अश्लील इशारा करता है। “सत्यमेव जयते” राष्ट्रीय प्रतीक का हिस्सा है, और यह कृत्य राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 का गंभीर उल्लंघन है। याचिका में इसके लिए दंडात्मक कार्रवाई की मांग की गई है।

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आगे की राह

दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा याचिका लौटाए जाने के बाद, अब समीर वानखेड़े के पास मुंबई या किसी अन्य संबंधित क्षेत्राधिकार वाली अदालत का दरवाजा खटखटाने का विकल्प है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या वे इस कानूनी लड़ाई को आगे बढ़ाते हैं।



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